राजस्थान में निकाय चुनाव से पहले बाड़ाबंदी पर सियासी घमासान
कांग्रेस की बाड़ाबंदी में 50 से ज्यादा पुलिसकर्मी पहुंचे; अपहरण और दबाव के आरोपों के बीच जानिए होटल-रिसॉर्ट में पार्षदों को रखने के कानूनी पहलू

जयपुर। राजस्थान के 273 निकायों में सोमवार को मेयर, सभापति और अध्यक्ष पद के लिए चुनाव होना है। इससे पहले विभिन्न राजनीतिक दलों और निर्दलीय पार्षदों की बाड़ाबंदी को लेकर सियासी गतिविधियां तेज हो गई हैं। चुनाव जीतने के बाद कई पार्षदों को बसों और गाड़ियों के जरिए होटल व रिसॉर्ट में ठहराया गया है।
कांग्रेस ने आरोप लगाया है कि निर्दलीय पार्षदों पर पुलिस और प्रशासन के जरिए दबाव बनाया जा रहा है। पार्टी ने कुछ स्थानों पर होटल में पुलिस के पहुंचने और पार्षदों को प्रभावित करने की कोशिश के आरोप भी लगाए हैं। भाजपा की ओर से कहा गया है कि पुलिस तब कार्रवाई करती है, जब किसी पार्षद के परिजनों की ओर से बंधक बनाने या लापता होने की शिकायत दी जाती है।
क्या पार्षदों की बाड़ाबंदी कानूनी है?
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, चुने हुए पार्षदों का अपनी सहमति से किसी होटल या सुरक्षित स्थान पर ठहरना अपने आप में अपराध नहीं है। राजनीतिक दल इसे प्रशिक्षण, एकजुटता या बोर्ड बनाने की रणनीति के तौर पर करते रहे हैं।
हालांकि, किसी पार्षद को उसकी इच्छा के खिलाफ रोकना, धमकी देना, पैसे या किसी अन्य लाभ का लालच देकर वोट प्रभावित करने का प्रयास करना अलग कानूनी सवाल खड़े कर सकता है। निकाय प्रमुख का चुनाव पार्षदों द्वारा किया जाता है, इसलिए उनके स्वतंत्र मताधिकार का महत्व रहता है।
होटल या रिसॉर्ट में ठहरने पर चुनाव आयोग की भूमिका
स्रोत में दिए कानूनी विश्लेषण के अनुसार, पार्षदों को होटल या रिसॉर्ट में ठहराने पर सामान्य तौर पर कोई स्वत: प्रतिबंध नहीं बताया गया है। हालांकि चुनाव प्रक्रिया के दौरान अनुचित प्रभाव, लालच, धमकी, प्रशासन के दुरुपयोग या खरीद-फरोख्त जैसी शिकायतों पर संबंधित अधिकारी जांच कर सकते हैं।
शिकायत मिलने पर रिटर्निंग ऑफिसर या जिला प्रशासन से रिपोर्ट मांगी जा सकती है और परिस्थितियों के अनुसार आगे की कार्रवाई की जा सकती है।
क्या पुलिस होटल में जबरन प्रवेश कर सकती है?
कानूनी स्थिति परिस्थितियों पर निर्भर करती है। यदि किसी व्यक्ति के बंधक बनाए जाने, लापता होने या किसी अपराध की आशंका की शिकायत हो तो पुलिस जांच कर सकती है। सामान्य परिस्थितियों में निजी होटल या रिसॉर्ट में तलाशी के लिए कानूनी प्रक्रिया का पालन जरूरी होता है।
यदि किसी की जान को तत्काल खतरा हो या होटल के भीतर अपराध हो रहा हो तो पुलिस को तत्काल कार्रवाई की आवश्यकता पड़ सकती है। कार्रवाई के आधार और परिस्थितियों का रिकॉर्ड रखना भी महत्वपूर्ण होता है।
झुंझुनूं में 50 से ज्यादा पुलिसकर्मी होटल पहुंचे
मलसीसर नगर पालिका क्षेत्र में फतेहपुर बाइपास रोड स्थित एक होटल में कांग्रेस समर्थित पार्षदों की बाड़ाबंदी के दौरान 50 से ज्यादा पुलिसकर्मियों के पहुंचने का मामला सामने आया।
कांग्रेस विधायक रीटा चौधरी ने आरोप लगाया कि पुलिस ने दबाव में पार्षदों को होटल से ले जाने की कोशिश की। वहीं डीएसपी नरेंद्र सिंह ने किसी राजनीतिक दबाव से इनकार किया। पुलिस के अनुसार वार्ड नंबर 3 के पार्षद संत कुमार के परिजनों ने उन्हें बंधक बनाए जाने की शिकायत SDM को दी थी। इसी शिकायत के आधार पर होटल में तलाशी की गई।
नागौर में पार्षद के लापता होने की शिकायत
कुचेरा नगर पालिका के वार्ड नंबर 9 से निर्वाचित कांग्रेस पार्षद निंबाराम और उनकी पत्नी के लापता होने की शिकायत उनके साले महेंद्र ने पुलिस को दी। इसके बाद पुलिस बाड़ाबंदी वाले स्थान पर पहुंची।
इसी दौरान निंबाराम का एक वीडियो सामने आया, जिसमें उन्होंने खुद को सुरक्षित बताते हुए किसी खतरे से इनकार किया। इससे पहले कांग्रेस समर्थित चेयरमैन प्रत्याशी तेजपाल मिर्धा ने भी पार्षदों की गाड़ियों का पीछा किए जाने के आरोप लगाए थे।
अलवर में कांग्रेस की बाड़ाबंदी वाले रिसॉर्ट में पहुंचे भाजपा पार्षद
अलवर नगर निगम में बोर्ड गठन को लेकर चल रही खींचतान के बीच भाजपा के कुछ पार्षद जयपुर के तूंगा स्थित एक रिसॉर्ट पहुंचे, जहां कांग्रेस पार्षदों की बाड़ाबंदी होने की जानकारी थी।
रिपोर्ट के अनुसार भाजपा पार्षद वार्ड 22 से निर्दलीय निर्वाचित कुलदीप मीणा को अपने साथ बाहर ले गए। इसके बाद जयपुर, अलवर और दौसा की पुलिस मौके पर पहुंची। कुलदीप मीणा को तुंगा थाने ले जाया गया, जहां उन्होंने तबीयत खराब होने और घर जाने की इच्छा जताई। इसके बाद उन्हें छोड़ दिया गया।
मतदान के दौरान गुप्त मतदान
निकाय प्रमुख के चुनाव में पार्षदों द्वारा मतदान किया जाता है। स्रोत में दिए कानूनी विश्लेषण के अनुसार मतदान गुप्त होता है। हालांकि राजनीतिक दल अपने पार्षदों को मतदान के तरीके को लेकर निर्देश या संकेत दे सकते हैं, जिससे बाद में क्रॉस-वोटिंग का अनुमान लगाने की कोशिश की जाती है।
राजस्थान में निकाय प्रमुख के चुनाव से पहले बाड़ाबंदी, पुलिस शिकायतों और राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप के कारण कई जगहों पर सुरक्षा और पार्षदों के स्वतंत्र मताधिकार को लेकर बहस तेज हो गई है।




