मध्य प्रदेश

जन्म के बाद मिट्टी में दफनाया, मां ने छह घंटे बाद बचाया: डॉक्टर ने मृत घोषित किया तो दरगाह पहुंचे पिता, गुलाब के फूल से पड़ा नाम; सांपों की चाल से सीखा कालबेलिया नृत्य

बैतूल में पद्मश्री गुलाबो सपेरा ने सुनाई संघर्ष की कहानी, अमेरिका में प्रस्तुति से लेकर समाज की कुरीतियों के खिलाफ लड़ाई तक के अनुभव साझा किए

बैतूल। पद्मश्री से सम्मानित कालबेलिया नृत्यांगना गुलाबो सपेरा की जिंदगी संघर्ष, साहस और कला के प्रति समर्पण की कहानी है। जन्म के तुरंत बाद उन्हें जिंदा मिट्टी में दफना दिया गया था, लेकिन उनकी मां ने समाज की परंपरा के खिलाफ जाकर करीब छह घंटे बाद उन्हें बाहर निकाल लिया। बचपन में गंभीर रूप से बीमार होने पर डॉक्टर ने उन्हें मृत घोषित कर दिया था। इसके बाद पिता उन्हें अजमेर स्थित ख्वाजा गरीब नवाज की दरगाह ले गए। वहां उनके ऊपर गुलाब का फूल गिरने के बाद पिता ने उनका नाम गुलाब रख दिया। आगे चलकर वह गुलाबो सपेरा के नाम से प्रसिद्ध हुईं।

दैनिक भास्कर से खास बातचीत में गुलाबो ने अपने जीवन के कई अनसुने प्रसंग साझा किए। उन्होंने बताया कि किस तरह सांपों की चाल और बीन की धुन से उन्होंने कालबेलिया नृत्य की शैली विकसित की। अमेरिका में प्रस्तुति देने से ठीक एक दिन पहले पिता को खोने के बावजूद उन्होंने अपना सफर जारी रखा। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पहचान बनाने के बाद उन्होंने उस सामाजिक कुप्रथा के खिलाफ भी आवाज उठाई, जिसका सामना उनका परिवार बचपन से करता आया था।

जन्म के बाद मिट्टी में दफनाया, मां ने छह घंटे बाद बचाया

गुलाबो सपेरा का मूल नाम धन्वंतरी है। उनका जन्म 9 नवंबर 1973 को धनतेरस के दिन राजस्थान के अजमेर स्थित कोटड़ा ढाणी की कालबेलिया बस्ती में हुआ था। उस समय उनके समाज में बेटी के जन्म पर उसे जिंदा दफनाने की कुप्रथा प्रचलित थी। इसी के चलते जन्म के बाद उन्हें भी मिट्टी में दबा दिया गया।

करीब छह घंटे बाद उनकी मां अपनी बहन यानी गुलाबो की मौसी के साथ वहां पहुंचीं और बच्ची को मिट्टी से बाहर निकालकर उसकी जान बचाई। जब समाज के लोगों को इसकी जानकारी मिली तो परिवार पर दबाव बनाया गया और बहिष्कार की धमकी दी गई। परिवार को यह भी कहा गया कि लड़की बड़ी होकर बदनामी का कारण बनेगी।

हालांकि, गुलाबो की मां अपने फैसले पर अडिग रहीं। उनके धार्मिक विचारों वाले पिता ने भी उनका साथ दिया। गुलाबो के अनुसार, उनके पिता कहा करते थे कि बेटियां नहीं होंगी तो वंश आगे कैसे बढ़ेगा।

डॉक्टर ने मृत बताया तो पिता दरगाह ले गए

बचपन में गुलाबो गंभीर रूप से बीमार पड़ गईं। उनकी हालत बिगड़ने पर अजमेर के एक डॉक्टर ने उन्हें मृत घोषित कर दिया और परिजनों को बच्ची घर ले जाने के लिए कहा।

इसके बाद उनके पिता उन्हें गोद में लेकर ख्वाजा गरीब नवाज की दरगाह पहुंचे। गुलाबो के मुताबिक, वहां प्रार्थना के दौरान करीब डेढ़ घंटे बाद उनके ऊपर गुलाब का फूल गिरा। इसके बाद उनके हाथ-पैर में हरकत होने लगी।

इस घटना के बाद उनके पिता ने कहा, “जिसे लेकर आया था वह धन्वंतरी थी, जिसे अब लेकर जा रहा हूं वह गुलाब है।” इस तरह धन्वंतरी के साथ गुलाब नाम जुड़ गया और आगे चलकर वह गुलाबो सपेरा के नाम से पहचानी जाने लगीं।

छह महीने की उम्र से सांपों के साथ, उन्हीं को बनाया गुरु

गुलाबो ने कालबेलिया नृत्य का कोई औपचारिक प्रशिक्षण नहीं लिया। उनके पिता सांपों को नचाने के साथ बीन और डफली बजाने का काम करते थे। गुलाबो महज छह महीने की उम्र से ही उनके साथ जाने लगी थीं।

बीन की धुन पर सांपों की गतिविधियों को देखते हुए उन्होंने उनकी चाल, गर्दन की मटकन और शरीर के घुमाव को समझा। धीरे-धीरे उन्होंने इन गतिविधियों को अपने नृत्य में शामिल कर लिया। गुलाबो कहती हैं, “सांप ही मेरे असली गुरु रहे हैं।” यही अनूठी शैली आगे चलकर उनके कालबेलिया नृत्य की पहचान बनी।

तीन साल की उम्र में किया नृत्य, परिवार का हुआ बहिष्कार

गुलाबो ने महज तीन साल की उम्र में पुष्कर मेले में छिपकर नृत्य करना शुरू कर दिया था। हालांकि, उनके समाज ने इसे परंपरा के खिलाफ माना और परिवार को समाज से बाहर कर दिया गया। उन्हें पुष्कर छोड़ना पड़ा, जिसके बाद परिवार जयपुर में बस गया।

जयपुर में गुलाबो ने ‘गुलाबी एंड पार्टी’ के साथ कार्यक्रम करने शुरू किए। धीरे-धीरे उनके नृत्य को बड़े मंच मिलने लगे और उनकी कला को व्यापक पहचान मिलने लगी।

अमेरिका जाने से एक दिन पहले पिता का निधन

वर्ष 1985 में गुलाबो को अमेरिका में कालबेलिया नृत्य प्रस्तुत करने का अवसर मिला। लेकिन विदेश रवाना होने से ठीक एक दिन पहले उनके पिता का निधन हो गया। इस घटना से परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा।

उनकी मां ने पिता के निधन के बाद उन्हें अमेरिका जाने से मना किया, लेकिन गुलाबो ने अपनी प्रस्तुति के लिए विदेश जाने का फैसला किया। अमेरिका में उनके नृत्य को पहचान मिली और उनकी प्रस्तुतियों की चर्चा होने लगी। उन्हें वहां बसने और नागरिकता लेने का प्रस्ताव भी मिला, लेकिन उन्होंने भारत लौटने का निर्णय लिया।

जिस समाज ने बहिष्कार किया, उसी ने किया स्वागत

अमेरिका से लौटने पर दिल्ली एयरपोर्ट पर गुलाबो का स्वागत करने के लिए उनके समाज के लोग भी पहुंचे। यह वही समाज था, जिसने कभी उनके परिवार को बहिष्कृत कर दिया था।

समाज के पंचों ने उन्हें दोबारा अपनाने की बात कही। इस पर गुलाबो ने शर्त रखी कि बेटियों को जिंदा दफनाने की प्रथा बंद करनी होगी। गुलाबो के मुताबिक, समाज ने उनकी बात स्वीकार की और इस कुप्रथा को समाप्त करने की दिशा में बदलाव आया।

कभी कुएं से पानी भरने नहीं दिया, आज बेटियां कर रहीं नौकरी

गुलाबो ने बताया कि बचपन में उनके परिवार को गांव के कुएं से पानी तक नहीं भरने दिया जाता था। उन्हें छुआछूत और सामाजिक भेदभाव का सामना करना पड़ा। हालांकि, समय के साथ उनके समाज में बदलाव आया है। आज बच्चे पढ़ाई कर रहे हैं और लड़कियां नौकरियां कर रही हैं।

गुलाबो ने लोक कलाकारों के अधिकारों के लिए भी आवाज उठाई है। उन्होंने जयपुर की सड़कों पर करीब 15 किलोमीटर तक नृत्य करते हुए विरोध प्रदर्शन किया। उनका कहना है कि लोक कलाकारों को केवल मंच ही नहीं, बल्कि सम्मान और अधिकार भी मिलने चाहिए।

फिल्मों में काम किया, बिग बॉस में भी आईं नजर

गुलाबो सपेरा ‘बंटवारा’ और ‘फासले’ जैसी फिल्मों में काम कर चुकी हैं। इसके अलावा वह ‘बिग बॉस’ में भी नजर आईं। हालांकि, उनकी प्रमुख पहचान कालबेलिया नृत्य और पारंपरिक वेशभूषा से ही बनी हुई है।

उनका कहना है कि सम्मान मिलने के बाद घर बैठ जाना उनका उद्देश्य नहीं है। वह नई पीढ़ी के लोक कलाकारों को आगे बढ़ाने के लिए हर साल ‘पद्मश्री फेस्टिवल’ आयोजित करती हैं। इसके माध्यम से युवा कलाकारों को अपनी प्रतिभा दिखाने का अवसर मिलता है।

गुलाबो के अनुसार, लोक कला को आगे बढ़ाने के लिए जरूरी है कि अनुभवी कलाकार नई पीढ़ी को मंच दें और उन्हें अपनी कला प्रस्तुत करने के अवसर उपलब्ध कराएं।

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