शराबी टीचर को बच्चों ने स्कूल से निकाला, मरीज को कड़ाही में नदी पार कराने की मजबूरी
दतिया-श्योपुर | मध्य प्रदेश में बदहाल व्यवस्थाओं और सरकारी तंत्र की लापरवाही की तस्वीरें सामने आईं

मध्य प्रदेश में सामने आए अलग-अलग घटनाक्रमों ने सरकारी व्यवस्थाओं पर सवाल खड़े कर दिए हैं। दतिया के भांडेर क्षेत्र में सोनभद्रिका नदी उफान पर आने के बाद गणेशपुरा गांव टापू बन गया, जिससे बीमार महिला को अस्पताल पहुंचाने के लिए ग्रामीणों को अनोखे लेकिन जोखिम भरे जुगाड़ का सहारा लेना पड़ा। महिला को लोहे की बड़ी कड़ाही में बैठाकर ग्रामीणों ने तेज बहाव वाली नदी पार कराई। लगातार बारिश के कारण नदी पर बना रपटा डूब गया था और गांव का संपर्क आसपास के इलाकों से कट गया था। महिला चार दिन से बीमार थी और उसकी हालत को देखते हुए उसे अस्पताल ले जाना जरूरी था, लेकिन रास्ता बंद होने के कारण ग्रामीणों के सामने कोई सुरक्षित विकल्प नहीं था। मजबूरी में ग्रामीण पानी में उतरे और कड़ाही को धक्का देकर महिला को दूसरे किनारे तक पहुंचाया। इस घटना का वीडियो सामने आने के बाद ग्रामीण इलाकों में बुनियादी सुविधाओं और आपातकालीन स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर सवाल उठ रहे हैं। वहीं श्योपुर के एक सरकारी स्कूल में शिक्षक के नशे की हालत में पहुंचने का मामला भी सामने आया। आरोप है कि शिक्षक स्कूल में बच्चों के सामने बीड़ी पी रहा था और अपने साथ शराब की बोतल भी लेकर आया था। शिक्षक की हरकतों का वीडियो सामने आने के बाद मामला शिक्षा विभाग तक पहुंचा, जिसके बाद शिक्षक को निलंबित कर दिया गया। बताया गया कि शिक्षक के व्यवहार से परेशान बच्चों ने उसे स्कूल से बाहर कर दिया। सरकारी स्कूल में शिक्षक के इस तरह के आचरण ने शिक्षा व्यवस्था और बच्चों के प्रति जिम्मेदारी पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। इसी दौरान श्योपुर में मुख्यमंत्री जन विश्वास अभियान के कार्यक्रम में अधिकारियों द्वारा सत्ताधारी नेताओं के स्वागत को लेकर जनपद अध्यक्ष रीना आशीष मीणा ने नाराजगी जताई। उन्होंने अधिकारियों पर नेताओं की आवभगत करने का आरोप लगाते हुए तीखी टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि जनता अपनी समस्याएं लेकर आती है, नेताओं के भाषण सुनने नहीं। जनपद अध्यक्ष ने अधिकारियों को यह भी कहा कि उन्हें नेताओं के दबाव में काम करने के बजाय जनता के हित में काम करना चाहिए। हालांकि उनके बयान के बाद राजनीतिक और प्रशासनिक स्तर पर चर्चा तेज हो गई है। इन तीनों घटनाओं को देखें तो एक तरफ ग्रामीण क्षेत्र में स्वास्थ्य और आवागमन की बुनियादी सुविधाओं की कमी दिखाई देती है, दूसरी तरफ सरकारी स्कूल में शिक्षक के अनुशासनहीन व्यवहार ने व्यवस्था की निगरानी पर सवाल खड़े किए हैं। वहीं जनप्रतिनिधि और अधिकारियों के बीच संबंधों को लेकर सामने आया विवाद सरकारी कार्यक्रमों में प्रोटोकॉल और जनसेवा की प्राथमिकताओं पर बहस को जन्म देता है। बारिश के मौसम में गांवों का संपर्क टूटना और मरीजों को जोखिम उठाकर अस्पताल पहुंचाना बताता है कि आपदा के समय स्थानीय स्तर पर मजबूत व्यवस्था की जरूरत है। इसी तरह विद्यालयों में शिक्षकों की नियमित निगरानी और अनुशासन सुनिश्चित करना भी जरूरी है, ताकि बच्चों के सामने ऐसी घटनाएं दोबारा न हों।




