नाबालिगों के अश्लील वीडियो देखने और शेयर करने पर हो सकती है जेल, 10 लाख रुपये तक जुर्माने का प्रावधान
राजस्थान पुलिस की साइबर टीम ने 15,326 मोबाइल नंबर, 7,800 URL और प्रोफाइल तथा 100 डिवाइस ब्लॉक करवाए; चार बार सुधरने का मौका देने की बात

जयपुर। नाबालिगों से संबंधित अश्लील वीडियो देखना, डाउनलोड करना, शेयर करना या मोबाइल में सहेजकर रखना कानूनी कार्रवाई का कारण बन सकता है। ऐसे मामलों में जेल के साथ लाखों रुपये का जुर्माना भी लगाया जा सकता है। राजस्थान पुलिस ने बच्चों से जुड़े अश्लील कंटेंट के प्रसार और इससे संबंधित गतिविधियों के खिलाफ साइबर निगरानी और कार्रवाई तेज कर दी है।
राजस्थान पुलिस के अनुसार, अब तक 15,326 मोबाइल नंबर, 7,800 URL और प्रोफाइल तथा 100 डिवाइस ब्लॉक करवाए गए हैं। इस कार्रवाई में इंस्टाग्राम, फेसबुक, स्नैपचैट और व्हाट्सएप सहित विभिन्न सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म से जुड़े अकाउंट और मोबाइल नंबर शामिल हैं।
चार मौके देने के बाद पांचवीं बार कार्रवाई की बात
एडीजी साइबर क्राइम वीके सिंह के अनुसार, पुलिस मुख्यालय की साइबर टीम लंबे समय से बच्चों से संबंधित अश्लील कंटेंट की निगरानी कर रही है। पुलिस की ओर से ऐसे मामलों में संबंधित लोगों को सुधरने के चार मौके देने की बात कही गई है। इसके बाद पांचवीं बार ऐसी गतिविधि सामने आने पर जेल भेजने की कार्रवाई की जा सकती है।
रिपोर्ट के अनुसार, पॉक्सो एक्ट की धारा 15 और आईटी एक्ट की धारा 67-बी के तहत अपराध की प्रकृति और लागू कानूनी प्रावधानों के अनुसार पांच से दस साल तक की सजा तथा 10 लाख रुपये तक के जुर्माने का प्रावधान बताया गया है। हालांकि, सजा और जुर्माना मामले के तथ्यों तथा संबंधित कानूनी प्रावधानों पर निर्भर करते हैं।
टेलीग्राम और डिस्कॉर्ड पर बनाए जा रहे गुप्त ग्रुप
एडीजी साइबर क्राइम वीके सिंह के मुताबिक, साइबर अपराधी नाबालिगों से संबंधित अश्लील कंटेंट साझा करने के लिए टेलीग्राम और डिस्कॉर्ड जैसे प्लेटफॉर्म पर गुप्त और पेड ग्रुप तथा चैनल बना रहे हैं। इनमें कई लोग फर्जी नामों और गुमनाम पहचान के साथ जुड़ते हैं।
कुछ मामलों में आपत्तिजनक वीडियो सीधे मैसेज के जरिए साझा किए जाते हैं, जबकि अन्य मामलों में गूगल ड्राइव जैसी क्लाउड स्टोरेज सेवाओं पर वीडियो अपलोड करके उनके लिंक भेजे जाते हैं।
पहचान छिपाने के लिए सोशल मीडिया पर कोडेड शब्दों और हैशटैग का इस्तेमाल भी किया जाता है। कई बार संपर्क इंस्टाग्राम या फेसबुक से शुरू होता है और बाद में बातचीत दूसरे मैसेजिंग प्लेटफॉर्म पर पहुंच जाती है।
डिजिटल ट्रेल के आधार पर आरोपियों की पहचान
साइबर क्राइम की डिप्टी एसपी कल्पना वर्मा के अनुसार, तकनीकी विश्लेषण और राष्ट्रीय लापता एवं शोषित बाल केंद्र (NCMEC) से प्राप्त रिपोर्ट साइबर अपराधों की जांच में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं।
इन रिपोर्टों से मिलने वाले डिजिटल संकेतों के आधार पर संबंधित मोबाइल नंबर, सोशल मीडिया अकाउंट और अन्य डिजिटल गतिविधियों का विश्लेषण किया जाता है। इसके बाद सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म और टेलीकॉम कंपनियों को जानकारी देकर आपत्तिजनक लिंक और मोबाइल नंबर ब्लॉक करवाए जाते हैं।
टिपलाइन से प्राप्त रिपोर्ट के आधार पर बार-बार ऐसी गतिविधियों में संलिप्त पाए गए लोगों की पहचान कर उनके खिलाफ मामले दर्ज किए गए हैं। पुलिस डिजिटल साक्ष्यों के आधार पर ऐसे मामलों की जांच कर रही है।
बच्चों से संबंधित अश्लील सामग्री रखना भी गंभीर मामला
बच्चों से संबंधित अश्लील सामग्री का संग्रह, प्रसारण और अन्य प्रतिबंधित गतिविधियां कानून के दायरे में आती हैं। ऐसे मामलों में सामग्री को डाउनलोड करने, साझा करने या अपने डिवाइस में रखने से पहले संबंधित कानूनी प्रावधानों को समझना जरूरी है। पुलिस की साइबर निगरानी का उद्देश्य ऐसी सामग्री के प्रसार पर रोक लगाना और इससे जुड़े अपराधों में कार्रवाई करना है।




