नंदा देवी पर गायब हुआ खतरनाक परमाणु जासूसी उपकरण
चीन की निगरानी के लिए भारत-अमेरिका का गुप्त मिशन, उपकरण बर्फ में दबा या ग्लेशियर में बहा—आज तक रहस्य बरकरार

1965 में भारत और अमेरिका ने चीन की परमाणु गतिविधियों पर नजर रखने के लिए नंदा देवी पर्वत पर एक बेहद गुप्त जासूसी अभियान शुरू किया था। इस मिशन के तहत एक विशेष परमाणु ऊर्जा से चलने वाला निगरानी उपकरण तैयार किया गया था, जिसे करीब 25 हजार फीट ऊंची नंदा देवी की चोटी पर स्थापित किया जाना था। पहली कोशिश के दौरान टीम करीब 23 हजार फीट की ऊंचाई तक पहुंची, लेकिन अचानक आए भयंकर बर्फीले तूफान ने अभियान रोकने पर मजबूर कर दिया। जान बचाने के लिए टीम को उपकरण को एक चट्टान से बांधकर नीचे लौटना पड़ा और तय किया गया कि मौसम सुधरने पर अगले साल दोबारा जाकर इसे स्थापित किया जाएगा। 1 मई 1966 को भारतीय और अमेरिकी अधिकारियों तथा पर्वतारोहियों की नई टीम दिल्ली से रवाना हुई और ऋषिकेश, श्रीनगर होते हुए जोशीमठ पहुंची। वहां से टीम नंदा देवी बेस कैंप की ओर बढ़ी और कई कठिनाइयों के बाद 15 मई को बेस कैंप पहुंच गई। इसके बाद करीब दस दिनों तक रणनीति बनाई गई और तय हुआ कि केवल चार भारतीय पर्वतारोही शेरपाओं और कुलियों के साथ कैंप-4 तक जाएंगे। 25 मई को टीम ने ऊंचाई की ओर चढ़ाई शुरू की और छह दिन की कठिन यात्रा के बाद 1 जून को कैंप-4 के करीब पहुंची। इसी दौरान फिर से बर्फीला तूफान आया और चारों तरफ घना कोहरा छा गया। मौसम शांत होने के बाद जब टीम उस जगह पहुंची जहां पिछले साल उपकरण सुरक्षित रखकर छोड़ा गया था, तो वहां का नजारा देखकर सभी हैरान रह गए। उपकरण वहां मौजूद नहीं था। आसपास मलबे में तंबू, गैस स्टोव, बर्तन और राशन के अवशेष मिले, लेकिन उपकरण का कोई पता नहीं चला। अधिकारियों को शक हुआ कि भारी बर्फबारी या हिमस्खलन के कारण उपकरण चट्टान से फिसलकर नीचे ग्लेशियर की तरफ चला गया होगा। खोज के दौरान कुछ तार और उपकरणों के हिस्से मिले, लेकिन मुख्य परमाणु ऊर्जा इकाई, जनरेटर और दूसरे महत्वपूर्ण हिस्से गायब थे। टीम ने कई जगह बर्फ और मलबा हटाकर तलाश की, लेकिन सफलता नहीं मिली। मामले की गंभीरता को देखते हुए यह सूचना दिल्ली और फिर अमेरिकी अधिकारियों तक पहुंचाई गई। भारत और अमेरिका के खुफिया अधिकारियों के बीच आपात बैठक हुई और उपकरण की दोबारा तलाश करने का फैसला लिया गया। 3 जून को टीम फिर कैंप-4 पहुंची और आसपास के इलाकों में बड़े पैमाने पर खोज अभियान चलाया गया। अमेरिकी वैज्ञानिक भी बाद में मौके पर पहुंचे और हजारों फीट नीचे संभावित रास्तों में रेडियोएक्टिविटी की जांच की गई। सबसे बड़ी चिंता यह थी कि यदि परमाणु ऊर्जा स्रोत क्षतिग्रस्त होकर किसी ग्लेशियर या जलस्रोत में पहुंच गया, तो इसका असर नीचे बसे इलाकों और नदियों पर पड़ सकता था। हालांकि जांच में तत्काल किसी खतरनाक रेडियोधर्मी रिसाव के संकेत नहीं मिले। इसके बावजूद उपकरण का रहस्यमय तरीके से गायब होना भारत और अमेरिका दोनों के लिए गंभीर चिंता बन गया। अमेरिकी खुफिया अधिकारियों के बीच यह शक भी पैदा हुआ कि कहीं भारतीय पक्ष ने उपकरण को जानबूझकर अपने कब्जे में तो नहीं ले लिया। दूसरी ओर भारतीय अधिकारियों ने भी इस आशंका को खारिज किया और कहा कि उपकरण के गायब होने का कारण प्राकृतिक आपदा हो सकता है। दोनों देशों ने इस पूरे मामले को अत्यंत गोपनीय रखा, क्योंकि अभियान की जानकारी सार्वजनिक होने से चीन के खिलाफ चल रही जासूसी योजना का खुलासा हो सकता था। आखिरकार 1967 में भारत और अमेरिका ने एक नया उपकरण तैयार कर नंदा देवी के बजाय नंदा देवी कोट पर स्थापित करने का फैसला किया। 24 अप्रैल को नई टीम रवाना हुई और तमाम मुश्किलों के बाद मई के अंत तक नया निगरानी उपकरण स्थापित कर दिया गया। इस बार मिशन सफल रहा और उपकरण ने दोनों देशों के लिए चीन की गतिविधियों पर नजर रखने का काम शुरू किया। हालांकि नंदा देवी पर छोड़े गए पहले उपकरण का रहस्य आज भी इस अभियान की सबसे चर्चित कड़ियों में से एक माना जाता है। यह स्पष्ट नहीं हो पाया कि वह उपकरण वास्तव में हिमस्खलन में दब गया, ग्लेशियर में बह गया या किसी अन्य कारण से गायब हुआ। इस गुप्त अभियान की कहानी भारत-अमेरिका के खुफिया सहयोग, हिमालय की कठिन भौगोलिक परिस्थितियों और परमाणु सामग्री से जुड़े संभावित पर्यावरणीय खतरे को एक साथ सामने लाती है।




