सरकार ने निकाय-पंचायत चुनाव में OBC आरक्षण को सही ठहराया: हाईकोर्ट में कहा- आयोग ने डोर-टू-डोर सर्वे किया; कम आरक्षण को लेकर विवाद
जिला प्रमुख के 41 पदों में OBC के लिए 5 सीटें आरक्षित होने पर याचिका; सरकार ने कहा- SC, ST और OBC का कुल आरक्षण 50% की सीमा के भीतर

राजस्थान में आगामी पंचायत और स्थानीय निकाय चुनावों में OBC आरक्षण को लेकर चल रहे विवाद के बीच राज्य सरकार ने हाईकोर्ट में अपने आरक्षण फॉर्मूले का बचाव किया है। सरकार ने अदालत में कहा कि OBC आरक्षण OBC आयोग की रिपोर्ट, डोर-टू-डोर सर्वे और जनाधार डेटा के विश्लेषण के आधार पर तय किया गया है। सरकार के अनुसार SC, ST और OBC को मिलाकर आरक्षण सुप्रीम कोर्ट की 50 प्रतिशत की सीमा के भीतर रखा गया है।
विवाद मुख्य रूप से जिला प्रमुख के पदों पर OBC आरक्षण को लेकर है। याचिकाकर्ता राधेराम गोदारा की ओर से दलील दी गई है कि जिला पुनर्गठन के बाद जिला प्रमुख के पदों की संख्या 33 से बढ़कर 41 हो गई, लेकिन OBC के लिए आरक्षित पदों की संख्या 5 ही रखी गई। याचिका में इसे आनुपातिक आरक्षण के मुद्दे से जोड़ा गया है।
OBC आयोग ने किया था डोर-टू-डोर सर्वे
सरकार ने हाईकोर्ट में कहा कि OBC आयोग ने घर-घर जाकर सर्वे किया और उपलब्ध जनाधार डेटा का विश्लेषण करने के बाद आरक्षण को लेकर अपनी सिफारिशें दीं।
इससे पहले जुलाई 2026 में राजस्थान OBC प्रतिनिधित्व आयोग ने राज्यभर में डिजिटल डोर-टू-डोर सर्वे कराया था। सर्वे में OBC परिवारों की सामाजिक, शैक्षणिक, आर्थिक स्थिति और स्थानीय निकायों में राजनीतिक प्रतिनिधित्व से जुड़ी जानकारी जुटाई गई थी।
41 जिला प्रमुख पदों में OBC के लिए 5 सीटें
13 अगस्त को जिला परिषदों में जिला प्रमुख पदों के लिए आरक्षण की लॉटरी हुई थी। कुल 41 जिला प्रमुख पदों में से 5 पद OBC के लिए आरक्षित किए गए।
इनमें जालोर, बूंदी और खैरथल-तिजारा में OBC तथा ब्यावर और सीकर में OBC महिला के लिए पद आरक्षित किए गए।
सरकार का तर्क है कि 41 जिला प्रमुख पदों में SC के 8, ST के 7 और OBC के 5 पद आरक्षित हैं। यानी कुल 20 पद आरक्षित हैं, जो 48.78 प्रतिशत बैठता है। सरकार के मुताबिक यह 50 प्रतिशत की सीमा के भीतर है।
याचिकाकर्ता ने उठाया OBC सीटों की संख्या का सवाल
याचिकाकर्ता राधेराम गोदारा की ओर से कहा गया है कि पहले जब प्रदेश में जिला प्रमुख के 33 पद थे, तब भी OBC के लिए 5 पद आरक्षित थे। अब पदों की संख्या बढ़कर 41 होने के बावजूद OBC आरक्षण में बढ़ोतरी नहीं की गई।
याचिका में इसी आधार पर OBC के लिए आरक्षित पदों की संख्या आनुपातिक रूप से बढ़ाने की मांग की गई है।
OBC आयोग की रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं होने का मुद्दा
याचिकाकर्ता की ओर से यह भी सवाल उठाया गया है कि OBC आयोग की रिपोर्ट अभी सार्वजनिक नहीं की गई है। याचिकाकर्ता के वकील का तर्क है कि रिपोर्ट के आधार और आंकड़ों को सार्वजनिक किए बिना आरक्षण की प्रक्रिया पर सवाल बने रहेंगे।
सरकार की ओर से दूसरी तरफ यह कहा गया है कि आयोग ने सर्वे और उपलब्ध डेटा के विश्लेषण के आधार पर अपनी सिफारिशें तैयार की हैं।
पंचायत आरक्षण की लॉटरी भी टली
OBC आरक्षण को लेकर विवाद के बीच पंचायत चुनाव के लिए आरक्षण लॉटरी की प्रक्रिया भी आगे खिसकी है। पहले 17 और 18 सितंबर को लॉटरी प्रस्तावित थी। ताजा रिपोर्टों के अनुसार अब इसे 23 सितंबर और 24 सितंबर को कराने की जानकारी सामने आई है।
23 सितंबर को जिला मुख्यालय और 24 सितंबर को उपखंड स्तर पर आरक्षण की प्रक्रिया प्रस्तावित बताई गई है। इसके बाद पंचायत चुनाव की आगे की प्रक्रिया बढ़ेगी।
कांग्रेस ने भी उठाया आरक्षण का मुद्दा
कांग्रेस ने OBC आरक्षण के मुद्दे पर सरकार पर सवाल उठाए हैं। पार्टी का आरोप है कि पंचायत और नगर निकाय चुनावों में OBC आरक्षण के आंकड़ों में कमी की गई है। कांग्रेस ने इस मुद्दे पर आरक्षण बचाओ प्रकोष्ठ गठित करने की भी बात कही है।
ये कांग्रेस के राजनीतिक आरोप हैं; सरकार का पक्ष इसके विपरीत है और वह आरक्षण प्रक्रिया को आयोग की रिपोर्ट तथा निर्धारित संवैधानिक सीमा के अनुरूप बता रही है।
आगे हाईकोर्ट की सुनवाई पर नजर
मामले में अब हाईकोर्ट के सामने सरकार के जवाब और याचिकाकर्ता की आपत्तियों के आधार पर आगे की सुनवाई होगी। फिलहाल उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार विवाद का मुख्य केंद्र OBC आरक्षण के लिए अपनाए गए डेटा, आयोग की रिपोर्ट और जिला प्रमुख के पदों की संख्या बढ़ने के बाद आरक्षण के अनुपात का सवाल है।




