राजस्थान निकाय चुनाव: भाजपा ने मैनेजमेंट से बदले समीकरण, अल्पमत वाले निकायों में भी बनाया बोर्ड
भाजपा ने कई अल्पमत वाले निकायों में निर्दलीयों का समर्थन जुटाकर बोर्ड बनाए; 35.18% वोट के मुकाबले कांग्रेस को 34.24% वोट

जयपुर। राजस्थान के निकाय चुनावों के बाद अब नगर निकाय प्रमुखों के चुनाव में भी सियासी समीकरण तेजी से बदले हैं। उपलब्ध नतीजों के आधार पर भाजपा ने कई ऐसे निकायों में बोर्ड बनाने में सफलता हासिल की, जहां उसके पास निर्वाचित पार्षदों का स्पष्ट बहुमत नहीं था। निर्दलीयों और दूसरे दलों से जुड़े पार्षदों का समर्थन जुटाना, संगठनात्मक समन्वय और चुनाव के बाद की रणनीति इसके प्रमुख हिस्से रहे।
309 शहरी निकायों में से 305 के परिणाम सामने आने तक भाजपा की ओर से करीब 65 प्रतिशत निकायों में प्रमुख बनाए जाने का दावा किया गया है। वहीं, नगर निगम स्तर पर भी भाजपा को बढ़त मिली है। हालांकि इन आंकड़ों और उनके राजनीतिक अर्थ को लेकर अलग-अलग दलों की अपनी-अपनी व्याख्याएं हैं।
वोट शेयर में अंतर एक फीसदी से भी कम
निकाय चुनाव में भाजपा और कांग्रेस के बीच वोट शेयर का अंतर काफी कम रहा। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार भाजपा को 35.18 प्रतिशत और कांग्रेस को 34.24 प्रतिशत वोट मिले। दोनों के बीच अंतर 0.94 प्रतिशत रहा।
वार्डों की बात करें तो 10,235 वार्डों में भाजपा ने 4,179, कांग्रेस ने 3,613 और निर्दलीयों ने 2,273 वार्ड जीते।
इसके बावजूद बोर्ड गठन के दौरान दोनों दलों के बीच तस्वीर अलग दिखाई दी। कई निकायों में बहुमत का आंकड़ा हासिल करने के लिए भाजपा ने निर्दलीय पार्षदों का समर्थन लिया।
चुनाव से पहले तैयारी पर दिया जोर
राजस्थान में 2023 में भाजपा की सरकार बनने के बाद पार्टी ने ‘वन स्टेट-वन इलेक्शन’ की रणनीति पर जोर दिया। इससे निकाय चुनावों की तैयारी के लिए पार्टी को अतिरिक्त समय मिला।
इस अवधि में संगठन स्तर पर सर्वे और जमीनी फीडबैक के आधार पर रणनीति तैयार करने की बात कही गई। चुनाव प्रचार में मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा सहित भाजपा के कई बड़े नेता सक्रिय रहे।
पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने भी चुनाव परिणामों के बाद मीडिया से बातचीत में माना कि कांग्रेस को रोड शो और आक्रामक प्रचार के स्तर पर भाजपा का जवाब देने की जरूरत थी।
माइक्रो मैनेजमेंट से पार्षदों को जोड़े रखा
निकाय प्रमुखों के चुनाव में पार्टी के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने पार्षदों को एकजुट रखने की रही। भाजपा ने चुनाव परिणाम आने के बाद पार्षदों के साथ लगातार समन्वय बनाए रखा।
लेख में दिए आंकड़ों के अनुसार, भाजपा और कांग्रेस के वार्ड वोट शेयर में सिर्फ 0.94 प्रतिशत का अंतर था, लेकिन बोर्ड गठन में यह अंतर काफी बड़ा दिखाई दिया। पार्टी ने ऐसे निकायों में भी समीकरण बनाए जहां उसके पास अपने दम पर बहुमत नहीं था।
अजमेर में बदला पूरा समीकरण
अजमेर को इसका प्रमुख उदाहरण बताया गया है। यहां कांग्रेस के 37 और भाजपा के 32 पार्षद चुने गए थे। इसके अलावा 11 निर्दलीय पार्षद थे।
बहुमत के लिए जरूरी समर्थन जुटाने में भाजपा सफल रही और अनामिका मेयर चुनी गईं। इस तरह कांग्रेस से कम सीटें होने के बावजूद भाजपा ने निर्दलीयों के समर्थन से बोर्ड बना लिया।
डूंडलोद में सिर्फ 2 पार्षदों के बावजूद बोर्ड
झुंझुनूं जिले की डूंडलोद नगर पालिका में कुल 20 पार्षद हैं। यहां भाजपा के सिर्फ 2, कांग्रेस के 8 और निर्दलीय 10 पार्षद जीते थे।
इन आंकड़ों के बावजूद भाजपा बोर्ड बनाने में सफल रही। यह उदाहरण बताता है कि निकाय प्रमुख के चुनाव में पार्षदों की संख्या के साथ-साथ बाद के राजनीतिक समीकरण भी महत्वपूर्ण हो सकते हैं।
कांग्रेस के बागियों को भी साथ लेने की रणनीति
चुनाव के दौरान भाजपा और कांग्रेस दोनों ही दलों में बगावत देखने को मिली थी। कुछ बागी उम्मीदवार चुनाव जीतकर पार्षद भी बने।
लेख के अनुसार, भाजपा ने अपने बागियों के साथ-साथ कांग्रेस से जुड़े कुछ बागी पार्षदों को भी अपने साथ जोड़ने की कोशिश की। इससे उन निकायों में संख्या बल बढ़ाने में मदद मिली जहां पार्टी अपने दम पर बहुमत में नहीं थी।
कांग्रेस की रणनीति पर उठे सवाल
निकाय चुनाव के बाद कांग्रेस के भीतर चुनावी रणनीति और संगठनात्मक समन्वय को लेकर सवाल उठे। पाली का उदाहरण भी इसी संदर्भ में दिया गया है, जहां कांग्रेस के 29 पार्षद जीतने के बावजूद बोर्ड गठन के दौरान पार्टी अपेक्षित समर्थन नहीं जुटा सकी।
पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने भी चुनाव प्रचार के तरीके को लेकर पार्टी की रणनीति पर टिप्पणी की थी। उन्होंने कहा था कि कांग्रेस को भाजपा के रोड शो और आक्रामक प्रचार का उसी तरह जवाब देना चाहिए था।
पिछले निकाय चुनाव से बदली तस्वीर
लेख में दिए आंकड़ों के अनुसार, 2019 से 2021 के बीच हुए निकाय चुनावों में कांग्रेस ने 196 निकायों में से 125 में अध्यक्ष बनाए थे, जबकि भाजपा के 64 अध्यक्ष बने थे। 7 निकायों में अन्य या निर्दलीय अध्यक्ष चुने गए थे।
उस दौर में 10 नगर निगमों में कांग्रेस के 6 और भाजपा के 4 बोर्ड थे। मौजूदा निकाय चुनावों में तस्वीर भाजपा के पक्ष में बदली हुई दिखाई दे रही है।
आगे पंचायती राज चुनाव में असर की चर्चा
निकाय प्रमुखों के चुनाव में भाजपा की बढ़त को पार्टी के लिए संगठनात्मक मनोबल बढ़ाने वाला माना जा रहा है। भाजपा नेता इसे ‘ट्रिपल इंजन सरकार’ के संदेश को स्थानीय स्तर तक पहुंचाने के अवसर के तौर पर भी इस्तेमाल कर सकते हैं।
हालांकि, इन नतीजों का आगामी पंचायती राज चुनावों पर वास्तविक असर क्या होगा, यह आगे के चुनाव और स्थानीय राजनीतिक समीकरणों पर निर्भर करेगा।
निष्कर्ष: निकाय चुनावों में वार्ड स्तर पर वोट शेयर का अंतर सीमित रहा, लेकिन बोर्ड गठन के दौरान समर्थन जुटाने और पार्षदों को एकजुट रखने की रणनीतियों ने कई जगह अंतिम परिणाम बदल दिए। अजमेर और डूंडलोद जैसे उदाहरणों में यह अंतर स्पष्ट दिखाई देता है।




