एनपीयू के कुलपति पर वित्तीय अनियमितताओं के आरोप, वित्त शाखा के बजाय अपने कार्यालय में मंगवाते थे फाइलें
पूर्व वित्तीय सलाहकार विनय कुमार वर्मा ने राज्यपाल सचिवालय और उच्च शिक्षा विभाग को भेजा पत्र; समितियों की कार्यवाही और तबादलों को लेकर भी उठाए सवाल

रांची। नीलांबर-पीतांबर विश्वविद्यालय (एनपीयू) में कुप्रबंधन, वित्तीय अनियमितताओं और परीक्षा संचालन से जुड़े मामलों की जांच के बीच पूर्व वित्तीय सलाहकार विनय कुमार वर्मा ने कुलपति डॉ. दिनेश कुमार सिंह की कार्यशैली पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उन्होंने राज्यपाल सचिवालय और उच्च एवं तकनीकी शिक्षा विभाग को पत्र भेजकर विश्वविद्यालय में वित्तीय कार्यों के संचालन और प्रशासनिक निर्णयों पर सवाल उठाए हैं।
वर्मा का आरोप है कि कुलपति के कार्यभार संभालने के बाद वित्तीय संचिकाओं को निर्धारित प्रक्रिया के तहत वित्त शाखा में भेजने के बजाय सीधे कुलपति कार्यालय में मंगवाया जाता था। उनका दावा है कि वित्तीय कामकाज भी कुलपति कक्ष से ही संचालित किया जाता था।
कुलपति कार्यालय में बैठाकर काम कराने का आरोप
पूर्व वित्तीय सलाहकार के अनुसार, पूर्व कुलसचिव और वर्तमान सीसीडीसी को कुलपति कार्यालय में बैठाकर निविदा प्रकाशन सहित अन्य कार्य कराए जाते थे। उन्होंने आरोप लगाया कि वित्तीय संचिकाएं भी कुलपति के निर्देश पर तैयार कराई जाती थीं। इसके अलावा, नियमों और परिनियमों का हवाला देने वाले शिक्षकों तथा शिक्षकेत्तर कर्मचारियों के तबादले का दबाव बनाए जाने का भी उन्होंने दावा किया है।
इस्तीफे और तबादले को लेकर भी उठाए सवाल
विनय कुमार वर्मा ने बताया कि कुलपति की कार्यशैली से परेशान होकर उन्होंने 6 सितंबर 2025 को वित्तीय सलाहकार के पद से इस्तीफा दे दिया था। उन्होंने तत्कालीन परीक्षा नियंत्रक प्रो. रविशंकर के मामले का भी उल्लेख किया। वर्मा के अनुसार, निर्धारित कार्यकाल पूरा होने से पहले ही उन्हें दूरस्थ महाविद्यालय में स्थानांतरित कर दिया गया था।
वित्तीय संचिकाओं और समितियों की कार्यवाही पर भी आरोप
वर्मा ने वित्तीय संचिकाओं में नियमों का उल्लेख करने पर नाराजगी और धमकी मिलने का आरोप लगाया है। उन्होंने कुछ संचिकाओं में छेड़छाड़ की आशंका भी जताई है। इसके अलावा, उनका दावा है कि वैधानिक समितियों की बैठकों में कथित दबाव के कारण सदस्य खुलकर अपनी बात नहीं रख पाते थे। उन्होंने आरोप लगाया कि बैठकों की कार्यवाही कुलपति के निर्देशों के अनुसार तैयार कराई जाती थी और बाद में सदस्यों से उस पर हस्ताक्षर लिए जाते थे।
फिलहाल, ये आरोप पूर्व वित्तीय सलाहकार की ओर से लगाए गए हैं। उपलब्ध जानकारी में इन आरोपों पर कुलपति या विश्वविद्यालय प्रशासन का पक्ष सामने नहीं आया है।




