झारखंड के पारंपरिक मांदर को मिला जीआई टैग, 1915 से 1940 तक के ऐतिहासिक दस्तावेज बने आधार
2021 से चल रही थी पंजीकरण की प्रक्रिया, मांदर को मिली भौगोलिक और कानूनी पहचान; पारंपरिक कारीगरों को मिलेगा लाभ

रांची। झारखंड के आदिवासी लोकजीवन, पर्व-त्योहार और अखरा की पहचान माने जाने वाले पारंपरिक मांदर को जियोग्राफिकल इंडिकेशन (जीआई) टैग मिल गया है। भारत सरकार की जीआई रजिस्ट्री, चेन्नई ने इसे भौगोलिक संकेतक के रूप में पंजीकृत किया है। लाल और नगड़ा मिट्टी से पारंपरिक तरीके से तैयार होने वाले इस लोकवाद्य को जीआई टैग मिलने से झारखंड की सांस्कृतिक विरासत को नई पहचान मिली है।
मांदर को जीआई टैग दिलाने की प्रक्रिया वर्ष 2021 में शुरू हुई थी। दूसरे राज्यों में इससे मिलते-जुलते वाद्ययंत्रों की मौजूदगी के कारण पंजीकरण की प्रक्रिया लंबित थी। अब झारखंड के पारंपरिक मांदर को अलग भौगोलिक पहचान मिली है।
मांदर सम्राट मनपूरन नायक ने कहा कि मांदर केवल एक वाद्ययंत्र नहीं, बल्कि झारखंड की सांस्कृतिक धरोहर है। इसके बिना अखरा सूना लगता है। राज्य के 43 पारंपरिक वाद्यों में मांदर को सर्वोपरि माना जाता है।
1915 से 1940 तक के ऐतिहासिक दस्तावेज बने आधार
मांदर को जीआई टैग दिलाने की प्रक्रिया में जीआई विशेषज्ञ और एनयूएसआरएल के विजिटिंग फैकल्टी डॉ. सत्यदीप सिंह ने आवेदन से लेकर अंतिम पैरवी तक प्रमुख भूमिका निभाई।
डॉ. सिंह के अनुसार, पंजीकरण के लिए प्रसिद्ध मानवशास्त्री शरत चंद्र राय की वर्ष 1915 की कृति, तारकचंद्र दास का वर्ष 1931 का शोध और डब्ल्यूजी आर्चर की वर्ष 1940 में प्रकाशित पुस्तक ‘द ब्लू ग्रोव’ के साक्ष्य प्रस्तुत किए गए। इसके अलावा पटना संग्रहालय के वर्ष 1920 के दस्तावेज और बिहार गजेटियर को भी प्रमाण के रूप में पेश किया गया।
डॉ. सिंह ने बताया कि जीआई टैग से पारंपरिक कारीगरों के संरक्षण और झारखंड की लोक परंपरा को व्यापक पहचान दिलाने में मदद मिलेगी। इस प्रक्रिया में एनयूएसआरएल के कुलपति प्रो. अशोक पाटिल, तत्कालीन गुमला उपायुक्त कर्ण सत्यार्थी और मुख्यमंत्री लघु कुटीर उद्यम विकास बोर्ड का भी महत्वपूर्ण योगदान रहा।
जीआई टैग से कारीगरों को मिलेंगे कई फायदे
जीआई टैग मिलने के बाद झारखंड के पारंपरिक मांदर को अलग पहचान के साथ बाजार में प्रस्तुत किया जा सकेगा। पारंपरिक वादक और शिल्पकार अधिकृत जीआई पहचान, ब्रांड और लोगो के साथ अपने उत्पाद बेच सकेंगे।
इससे झारखंड में पारंपरिक तरीके से बनाए जाने वाले मांदर को दूसरे क्षेत्रों में निर्मित मिलते-जुलते उत्पादों से अलग पहचानना आसान होगा। जीआई पहचान से उपभोक्ताओं को भी पारंपरिक मांदर की पहचान करने में मदद मिलेगी।
इसके साथ ही मांदर के निर्माण से जुड़े कारीगरों के पारंपरिक हुनर और पीढ़ियों से चली आ रही शिल्पकला के संरक्षण में भी सहायता मिलने की उम्मीद है।
56 साल से मांदर बजा रहे हैं मनपूरन नायक
मांदर सम्राट के नाम से प्रसिद्ध 69 वर्षीय मनपूरन नायक पिछले 56 वर्षों से मांदर बजा रहे हैं। महज 13 वर्ष की उम्र में वर्ष 1970 में उनका चयन आकाशवाणी में हुआ था। अब महिलाएं भी मांदर बजाने में रुचि दिखा रही हैं। नायक होटवार स्थित कला मंदिर में महिलाओं को इसका प्रशिक्षण देते हैं।
मनपूरन नायक के अनुसार, मांदर का इतिहास गीत-संगीत की परंपरा से जुड़ा हुआ है। मिट्टी से निर्मित होने के कारण यह उनके लिए विशेष महत्व रखता है। उन्होंने मांदर को जीआई टैग मिलने को पुरखों और झारखंड की मिट्टी का सम्मान बताया। उनके अनुसार, मांदर की आवाज ढोल, ढोलकी, नगाड़ा और डफली जैसे वाद्यों से अलग, अधिक खनकदार होती है।
खास मिट्टी और पारंपरिक तकनीक से बनता है मांदर
मांदर की अपनी विशिष्ट बनावट और ध्वनि है। इसे बनाने में पारंपरिक कारीगरों के कौशल की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।
- पारंपरिक बनावट: कुम्हार लाल और नगड़ा मिट्टी से मांदर का खोल तैयार करते हैं। इसे पकाने के बाद चमड़े की बद्धियों से कसा जाता है। इनमें चाटी, कावा और खरण शामिल हैं।
- सात प्रमुख प्रकार: झारखंड में जसपुरिया (नागपुरी), कुड़ुख (उरांव), संथाली, हो, खड़िया, खोरठा और ठेचकी मांदर सहित सात प्रमुख प्रकार प्रचलित हैं।
- विशिष्ट ध्वनि: मिट्टी का खोल होने के कारण मांदर की आवाज सौम्य, भारी और खनकदार होती है। आधुनिक लोहे या एल्युमिनियम शीट से बने मांदर में यह विशेषता नहीं मिलती।
जीआई टैग मिलने से झारखंड के इस पारंपरिक लोकवाद्य को अलग पहचान मिली है। इससे मांदर की सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने और इससे जुड़े कारीगरों को अपनी कला के लिए नई पहचान दिलाने की संभावनाएं बढ़ी हैं।



