डॉ. रामदयाल मुंडा ने विदेशियों को सिखाई करम की परंपरा; नागपुरी, मुंडारी गीतों के साथ नचनी-पायका की थाप पर झूमते थे अमेरिकी छात्र
1963 में अमेरिका गए थे डॉ. रामदयाल मुंडा; मिनियापोलिस में विदेशी छात्रों के साथ सजता था करम का अखरा

रांची। अमेरिका की बर्फीली सर्दियों में जब तापमान बेहद कम रहता था, तब मिनियापोलिस में एक घर से मांदर, ढोलक और झांझर की आवाज सुनाई देती थी। अंदर विदेशी छात्र झारखंड के करम गीत ‘भादो पहुंचल आहे…’ गाते और लोकनृत्य करते थे। यह घर पद्मश्री डॉ. रामदयाल मुंडा का था, जिन्होंने अमेरिका में रहते हुए झारखंड की लोक संस्कृति को विदेशी छात्रों तक पहुंचाया।
उनके बेटे गुंजल इकिर मुंडा के संस्मरण के अनुसार, उस दौर में अमेरिका में बहुत से लोगों को करम पर्व की जानकारी नहीं थी। डॉ. मुंडा ने वहां विदेशी विद्यार्थियों को करम गीतों के साथ झारखंड के पारंपरिक नृत्यों और सांस्कृतिक परंपराओं से परिचित कराया।
शिकागो से शुरू हुआ सांस्कृतिक सफर
डॉ. रामदयाल मुंडा 1963 में शिकागो यूनिवर्सिटी भाषा विज्ञान और ऑस्ट्रो-एशियाटिक भाषाओं पर शोध के लिए अमेरिका गए थे। 1963 से 1970 तक उन्होंने शिकागो में और 1970 से 1981 तक मिनेसोटा यूनिवर्सिटी में एसोसिएट प्रोफेसर के रूप में काम किया।
वह अपने साथ रांची से मांदर, नगाड़ा, ढोलक और बांसुरी जैसे पारंपरिक वाद्ययंत्र भी ले गए। अमेरिका में उन्होंने ‘फॉक म्यूजिक एंड डांसेज ऑफ साउथ एशिया’ नाम का समूह बनाया। विदेशी शिक्षक और शोधार्थी उनके साथ मांदर की थाप पर झारखंडी लोकधुनों पर कदम मिलाते थे।
अमेरिकी युवाओं ने सीखे करम गीत और नृत्य
डॉ. मुंडा ने अमेरिकी युवाओं को करम गीतों के साथ नचनी और पायका की लय से परिचित कराया। विश्वविद्यालय के आयोजनों और मिनियापोलिस के पार्कों में उनकी मंडली लोकगीत और नृत्य प्रस्तुत करती थी।
उनके साथ हेजल लुट्ज, कैरल बेबिराकी, मार्था, रामकी, सौम्या और सुमना चक्रवर्ती जैसे शिक्षक एवं शोधार्थी भी इस सांस्कृतिक गतिविधि से जुड़े।
‘जे नाची से बांची’ था संदेश
डॉ. रामदयाल मुंडा के लिए करम केवल एक त्योहार नहीं था, बल्कि प्रकृति, समाज और सह-अस्तित्व से जुड़ा जीवन दर्शन था। उनका चर्चित सूत्रवाक्य था—‘जे नाची से बांची’, यानी जो नाचेगा, वही बचेगा।
अमेरिका में उन्होंने नेटिव अमेरिकन्स के साथ भी संवाद किया और प्रकृति-आधारित संस्कृतियों के बीच समानताओं तथा साझा जीवन मूल्यों पर चर्चा की। बाद में अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी वे झारखंडी संस्कृति का प्रतिनिधित्व करते रहे।
विदेश में भी सजता था करम का अखरा
गुंजल इकिर मुंडा के अनुसार, उनके पिता जहां भी रहे, भादो की एकादशी पर करम का अखरा जरूर सजाया जाता था। मिनियापोलिस में विदेशी छात्र करम व्रत, जावा के अंकुरों और पर्व से जुड़े सांस्कृतिक महत्व को समझते थे और रातभर मांदर की थाप पर नृत्य करते थे।
1981 में रांची विश्वविद्यालय लौटने के बाद भी डॉ. मुंडा का सांस्कृतिक अभियान जारी रहा। ऑस्ट्रेलियन नेशनल यूनिवर्सिटी, सिरैक्यूज यूनिवर्सिटी न्यूयॉर्क और टोक्यो यूनिवर्सिटी में विजिटिंग प्रोफेसर के रूप में रहते हुए उन्होंने विभिन्न देशों में झारखंड की लोक परंपराओं को प्रस्तुत किया।
रूस, चीन और फिलीपींस तक उनकी सांस्कृतिक यात्राओं के जरिए अखरा और मांदर की परंपरा पहुंची। इस तरह सात समंदर पार भी करम पर्व झारखंड की संस्कृति, प्रकृति और सामुदायिक जीवन के संदेश के साथ मनाया जाता रहा।




