मध्यप्रदेश में दूध उत्पादन के आंकड़ों पर सवाल, पशुओं की संख्या स्थिर फिर 33.27 लाख टन उत्पादन कैसे बढ़ा
5 साल में दुधारू पशुओं की संख्या में बदलाव नहीं, फिर 33.27 लाख मीट्रिक टन बढ़ा दूध उत्पादन; ग्वालियर-चंबल में जांच के दौरान कुछ नमूनों में मिलावट की आशंका

भोपाल/विदिशा/मुरैना/ग्वालियर। मध्यप्रदेश में दूध उत्पादन के सरकारी आंकड़ों और जमीनी स्थिति को लेकर सवाल उठ रहे हैं। पशुपालन एवं डेयरी विभाग के आंकड़ों के मुताबिक पिछले पांच वर्षों में प्रदेश में दुधारू गाय और भैंसों की संख्या में कोई बदलाव दर्ज नहीं हुआ, जबकि इसी अवधि में दूध उत्पादन करीब 33.27 लाख मीट्रिक टन बढ़ गया।
विभाग के रिकॉर्ड के अनुसार वर्ष 2020-21 में प्रदेश का दूध उत्पादन 179.99 लाख मीट्रिक टन था, जो 2024-25 में बढ़कर 213.26 लाख मीट्रिक टन हो गया। यानी पांच वर्षों में उत्पादन में करीब 33.27 लाख मीट्रिक टन की वृद्धि दर्ज की गई।
पशुओं की संख्या स्थिर, उत्पादन में लगातार बढ़ोतरी
रिपोर्ट के अनुसार, विभाग ने 2019 की पशुगणना के आंकड़ों को आधार बनाकर पिछले कई वर्षों में दुधारू पशुओं की संख्या में कोई बदलाव दर्ज नहीं किया। दूसरी ओर, दूध उत्पादन के आंकड़ों में लगातार बढ़ोतरी हुई।
इस अंतर को लेकर सवाल उठ रहे हैं कि क्या केवल प्रति पशु दूध उत्पादन बढ़ने से इतनी बड़ी वृद्धि संभव है।
महंगाई से डेयरी संचालक परेशान, कई ने कारोबार छोड़ा
विदिशा के डेयरी संचालकों का कहना है कि पशुओं के चारे और अन्य खर्च लगातार बढ़े हैं। खली-चूनी और भूसे की कीमतों में बढ़ोतरी के कारण कई छोटे-बड़े पशुपालकों ने डेयरी व्यवसाय कम कर दिया या बंद कर दिया।
डेयरी संचालकों के मुताबिक, कुछ इलाकों में पहले की तुलना में दुधारू पशुओं की संख्या काफी कम हुई है। ऐसे में सरकारी उत्पादन आंकड़ों में बढ़ोतरी और स्थानीय स्तर पर घटती पशु संख्या के बीच अंतर को लेकर सवाल खड़े हो रहे हैं।
मिलावटी दूध को लेकर भी सामने आई जांच
रिपोर्ट के मुताबिक ग्वालियर-चंबल क्षेत्र में दूध की गुणवत्ता की जांच के दौरान कुछ नमूनों में मिलावट की आशंका सामने आई। खाद्य सुरक्षा विभाग की टीम ने भिंड में पांच स्थानों पर रैपिड किट से दूध की जांच की। इनमें से चार नमूनों को संदिग्ध मानते हुए उनके सैंपल आगे की जांच के लिए भेजे गए।
इसके अलावा पोरसा, गोरमी और गोहद से लिए गए दूध के नमूनों की निजी लैब में जांच कराई गई। रिपोर्ट के अनुसार पोरसा के नमूने में रिफाइंड ऑयल की मौजूदगी पाई गई।
शैंपू, डिटर्जेंट और यूरिया से नकली दूध बनाने का दावा
रिपोर्ट में चंबल क्षेत्र में कथित मिलावटी दूध के कारोबार से जुड़े एक व्यक्ति के हवाले से दावा किया गया है कि शैंपू, डिटर्जेंट पाउडर, रिफाइंड तेल, यूरिया और ग्लूकोज पाउडर जैसे पदार्थों का इस्तेमाल कर सिंथेटिक दूध तैयार किया जाता है।
हालांकि, ऐसे दावों की पुष्टि संबंधित नमूनों की वैज्ञानिक जांच और आधिकारिक कार्रवाई के आधार पर ही की जा सकती है। खाद्य सुरक्षा के लिहाज से किसी भी संदिग्ध दूध को बिना जांच के सुरक्षित या असुरक्षित घोषित करना उचित नहीं है।
विभाग का दावा- नस्ल सुधार से बढ़ा दूध उत्पादन
पशुपालन विभाग के अतिरिक्त उपसंचालक डॉ. संजय भारती के मुताबिक, प्रदेश में दूध उत्पादन बढ़ने की प्रमुख वजह नस्ल सुधार है। उनके अनुसार साहीवाल, गिर, जर्सी और एचएफ गायों तथा मुर्रा भैंसों की नस्ल सुधार योजनाओं से प्रति पशु उत्पादन में वृद्धि हुई है।
विभाग के अनुसार वर्तमान में गायों से औसतन करीब 3.30 लीटर और भैंसों से करीब 4.30 लीटर दूध प्रतिदिन प्राप्त हो रहा है।
डॉ. भारती ने यह भी कहा कि सिंथेटिक दूध को लेकर विभाग के पास अब तक कोई शिकायत नहीं आई है।
सरकारी आंकड़ों और जमीनी स्थिति के बीच अंतर की जांच जरूरी
एक तरफ सरकारी आंकड़ों में दूध उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है, वहीं दूसरी तरफ कुछ क्षेत्रों के पशुपालक पशुओं की संख्या घटने और डेयरी कारोबार में कमी की बात कह रहे हैं। इसी के साथ कुछ स्थानों पर दूध के नमूनों में मिलावट की जांच भी सामने आई है।
ऐसे में पशुओं की वास्तविक संख्या, प्रति पशु दूध उत्पादन और प्रदेश में कुल दूध की मांग-सप्लाई के आंकड़ों का स्वतंत्र और वैज्ञानिक मिलान जरूरी है। इससे यह स्पष्ट हो सकेगा कि उत्पादन में दर्ज वृद्धि का वास्तविक आधार क्या है और दूध में मिलावट की समस्या का दायरा कितना है।




