सांप को दिया वादा निभाने जीभ आगे कर दी: गायों के लिए 150 डाकुओं से भिड़े तेजाजी, आज ट्रक से लगाई जाती है परिक्रमा
राजस्थान के लोकदेवता तेजाजी की अनोखी लोकगाथा; खरनाल में तेजा दशमी पर देशभर से पहुंचते हैं श्रद्धालु

नागौर/जयपुर। राजस्थान के लोकदेवता तेजाजी महाराज की लोकगाथा आज भी लोगों के बीच आस्था और वचन निभाने की मिसाल के तौर पर सुनाई जाती है। नागौर से करीब 20 किलोमीटर दूर खरनाल को तेजाजी की जन्मस्थली माना जाता है। तेजा दशमी के अवसर पर यहां अलग-अलग राज्यों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं।
लोककथा के अनुसार, तेजाजी का जन्म वर्ष 1130 में खरनाल में ताहड़ देव धौलिया और रामकंवरी के घर हुआ था। बताया जाता है कि जब उन्हें अपनी शादी के बारे में पता चला तो वे पत्नी पेमल को लेने पनेर गांव के लिए रवाना हुए। रास्ते में उन्हें कई घटनाओं का सामना करना पड़ा।
लाछा की गायों को छुड़ाने 150 डाकुओं से भिड़े
तेजाजी जब पनेर पहुंचे, तो लाछा की गायों को रात में चोर ले गए। गायों को छुड़ाने के लिए लाछा ने तेजाजी से मदद मांगी। लोकगाथा के अनुसार तेजाजी 150 डाकुओं से भिड़कर गायों को छुड़ा लाए, लेकिन एक बछड़ा पीछे रह गया। उसे वापस लेने के लिए वे दोबारा लौटे।
नागदेवता से किया था वादा
रास्ते में तेजाजी को एक जलता हुआ सांप दिखाई दिया। लोककथा के अनुसार वह नागदेवता का रूप था। तेजाजी ने उसे भाले की नोक से वहां से हटाया। सांप ने उन्हें डसने की बात कही, लेकिन तेजाजी ने पहले बछड़े को छुड़ाने जाने और वापस लौटकर आने का वचन दिया।
बछड़े को छुड़ाने के बाद तेजाजी अपने वचन के अनुसार उसी स्थान पर वापस लौटे। सांप ने देखा कि तेजाजी के पूरे शरीर पर घाव थे और उसने पूछा कि वह उन्हें कहां डसे। तेजाजी ने कहा कि उनकी जीभ पर कोई घाव नहीं है। इसके बाद उन्होंने अपनी जीभ आगे कर दी और नाग ने उन्हें डस लिया। लोकमान्यता के अनुसार नाग ने उन्हें वचन निभाने के लिए आशीर्वाद दिया।
लीलण घोड़ी की भी पूजा
लोकमान्यता के अनुसार तेजाजी की घोड़ी लीलण ने उनकी मृत्यु का समाचार खरनाल पहुंचाया। खरनाल में लीलण का मंदिर और समाधि स्थल भी है, जहां उसकी पूजा की जाती है।
तेजाजी की बहन के नाम पर भी मंदिर
कथा के अनुसार तेजाजी के बलिदान की खबर मिलने के बाद उनकी बहन बुंगरी बाई और नायक समाज की एक कन्या ने धरती माता से प्रार्थना की और धरती में समा गईं। खरनाल के पास बुंगरी माता का मंदिर भी स्थित है।
आज भी ट्रक और डंपर से लगाते हैं परिक्रमा
खरनाल मंदिर से करीब एक किलोमीटर दूर नागौर-जोधपुर हाईवे के किनारे तेजाजी की लीलण पर सवार बड़ी प्रतिमा स्थापित है। यहां श्रद्धालु ट्रक, गाड़ी और बाइक से भी परिक्रमा करते हैं। रिपोर्ट के अनुसार, यहां एक ट्रक चालक ने भी तेजाजी की प्रतिमा की ट्रक से परिक्रमा की।
किसानों के देवता के रूप में आस्था
खरनाल के किसानों में तेजाजी के प्रति विशेष आस्था बताई जाती है। खेत में फसल बोने से पहले किसान तेजाजी को नारियल चढ़ाकर पूजा करते हैं और आशीर्वाद लेते हैं। स्रोत में बीजणी नामक कृषि उपकरण के आविष्कार का श्रेय भी तेजाजी को दिए जाने की लोकमान्यता का उल्लेख है।
खरनाल में तेजाजी के बलिदान और वचन निभाने की स्मृति में संकल्प स्तूप भी बनाया गया है। इसके जरिए सत्य बोलने, वचन निभाने तथा प्रकृति और पर्यावरण संरक्षण का संदेश दिया जाता है।




