राजस्थान निकाय चुनाव में दिग्गजों की प्रतिष्ठा दांव पर, भीलवाड़ा में पूर्व मंत्री चुनाव से दूर
कोटा में ओम बिरला-शांति धारीवाल-प्रहलाद गुंजल के बीच सियासी मुकाबला, अजमेर में देवनानी को पूर्व मेयर की पत्नी से चुनौती; बीकानेर में अर्जुनराम मेघवाल और बीडी कल्ला पर नजर

राजस्थान के चार प्रमुख नगर निगमों कोटा, अजमेर, बीकानेर और भीलवाड़ा में निकाय चुनाव का सियासी माहौल लगातार गरमाता जा रहा है और इस बार मुकाबला केवल पार्षदों की जीत-हार तक सीमित नहीं दिखाई दे रहा, बल्कि कई बड़े राजनीतिक चेहरों की प्रतिष्ठा भी दांव पर लगी है। कोटा नगर निगम में 100 वार्ड, जबकि अजमेर और बीकानेर में 80-80 तथा भीलवाड़ा में 70 वार्ड हैं और मौजूदा राजनीतिक समीकरणों में भाजपा कई जगह मजबूत स्थिति में नजर आ रही है, लेकिन कांग्रेस और अन्य स्थानीय प्रभावशाली नेताओं के कारण मुकाबला एकतरफा नहीं माना जा रहा। कोटा में भाजपा की ओर से लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के साथ ऊर्जा मंत्री हीरालाल नागर और शिक्षा मंत्री मदन दिलावर की सक्रियता महत्वपूर्ण मानी जा रही है, जबकि कांग्रेस की ओर से पूर्व मंत्री शांति धारीवाल और नेता प्रहलाद गुंजल चुनावी रणनीति में प्रमुख भूमिका निभा रहे हैं। यहां चुनाव को पार्षदों की बजाय बड़े नेताओं के बीच प्रतिष्ठा की लड़ाई के तौर पर देखा जा रहा है। भाजपा में टिकट वितरण को लेकर स्थानीय मंत्रियों और विधायकों ने संगठन के स्तर पर अपने पसंदीदा उम्मीदवारों के लिए पैरवी की है, वहीं कांग्रेस में शांति धारीवाल ने चुनाव की कमान संभाल रखी है। प्रहलाद गुंजल की ओबीसी मतदाताओं के बीच पकड़ को भी कांग्रेस के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है और हाल में प्रियंका गांधी से उनकी मुलाकात ने राजनीतिक चर्चाओं को और बढ़ाया है। कोटा में इस बार एक ही नगर निगम के चुनाव होने से दोनों दलों के लिए रणनीतिक चुनौती बढ़ गई है, क्योंकि पिछली बार शहर में दो नगर निगम थे और उस दौरान कांग्रेस सत्ता में थी। शहर के अलग-अलग हिस्सों में पेयजल, टूटी सड़कों, नालियों की सफाई, कचरा प्रबंधन और प्रशासनिक व्यवस्था जैसे स्थानीय मुद्दे मतदाताओं के बीच प्रमुख बने हुए हैं। ओबीसी वर्ग भी करीब 21 प्रतिशत वार्डों में निर्णायक प्रभाव रखता है, जिसमें जाट, माली, गुर्जर, धाकड़ और कुमावत जैसे सामाजिक समूह शामिल हैं। दूसरी ओर अजमेर में विधानसभा अध्यक्ष वासुदेव देवनानी के लिए चुनाव इसलिए अहम हो गया है क्योंकि उनके राजनीतिक रूप से पुराने समर्थक रहे और दो बार भाजपा से मेयर रह चुके धर्मेंद्र गहलोत ने उनके ही वार्ड नंबर 4 से अपनी पत्नी हेमा गहलोत को निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में मैदान में उतार दिया है। गहलोत ने कुछ समय पहले भाजपा से इस्तीफा देते हुए देवनानी पर राजनीतिक प्रभाव के इस्तेमाल का आरोप लगाया था। उनके समर्थकों का दावा है कि हेमा गहलोत को भाजपा का टिकट नहीं मिलने के पीछे देवनानी की भूमिका रही, जबकि भाजपा ने उनके स्थान पर मोनिका जैन को प्रत्याशी बनाया है। दिलचस्प बात यह भी है कि दोनों प्रमुख प्रत्याशी उस वार्ड की निवासी नहीं बताई जा रही हैं और कांग्रेस ने यहां अपना उम्मीदवार नहीं उतारा है। अजमेर में भाजपा के सामने जहां संगठन और स्थानीय प्रभाव को बनाए रखने की चुनौती है, वहीं कांग्रेस जिला अध्यक्ष राजकुमार जयपाल, प्रदेश कांग्रेस सचिव रूबी खान, डेयरी चेयरमैन रामचंद्र चौधरी, श्रीगोपाल बाहेती और पूर्व आरटीडीसी चेयरमैन धर्मेंद्र राठौड़ जैसे नेताओं के सहारे मुकाबले को मजबूत करने की कोशिश कर रही है। यहां पेयजल, अतिक्रमण, सफाई, कचरा प्रबंधन, निगम कर्मचारियों की हड़ताल, यातायात, पार्किंग और संकरी सड़कों जैसे मुद्दे चुनावी चर्चा में हैं। अजमेर के कई वार्डों में ओबीसी, एससी और एसटी मतदाताओं के साथ ब्राह्मण, राजपूत, वैश्य, मुस्लिम, सिंधी और ईसाई समाज के मतदाताओं की मौजूदगी चुनावी समीकरणों को प्रभावित कर सकती है। बीकानेर में भाजपा और कांग्रेस दोनों ने पुराने और अनुभवी चेहरों पर भरोसा जताया है। यहां केंद्रीय मंत्री अर्जुनराम मेघवाल के लिए चुनाव को संगठन की पकड़ और भाजपा के प्रभाव की परीक्षा के रूप में देखा जा रहा है, जबकि कांग्रेस की चुनावी रणनीति की जिम्मेदारी पूर्व मंत्री डॉ. बीडी कल्ला के हाथों में है। भाजपा की ओर से पूर्व मेयर सुशीला राजपुरोहित, पार्टी महासचिव श्याम सिंह हाडला, वरिष्ठ नेता सुरेंद्र सिंह शेखावत और पूर्व कोषाध्यक्ष दीपक पारीक जैसे नेता सक्रिय हैं, जबकि कांग्रेस में पूर्व मेयर मकसूद अहमद, बीडी कल्ला के बेटे अनिल कल्ला और संजय आचार्य जैसे चेहरे मैदान में प्रभाव बनाने की कोशिश कर रहे हैं। बीकानेर में पुराने नगर निगम बोर्ड की कार्यप्रणाली, भाजपा सरकार के प्रति संभावित एंटी-इनकंबेंसी, सड़क और यातायात व्यवस्था, पार्किंग, अतिक्रमण, सफाई तथा सीवर लाइन के काम की धीमी रफ्तार जैसे मुद्दे मतदाताओं के बीच चर्चा में हैं। शहर में पुष्करणा ब्राह्मण और वैश्य समाज का प्रभाव महत्वपूर्ण माना जाता है, जबकि जाट, कुम्हार, सुथार और बिश्नोई जैसे सामाजिक समूह भी कई वार्डों में चुनावी परिणाम प्रभावित कर सकते हैं। भीलवाड़ा में चुनावी तस्वीर कुछ अलग है, जहां टिकट वितरण को लेकर सामने आए राजनीतिक मतभेदों के चलते पूर्व मंत्री रामलाल जाट और नेता धीरज गुर्जर ने चुनावी मैदान से दूरी बना ली है। दोनों नेताओं के समर्थकों को टिकट नहीं मिलने से नाराजगी की चर्चा है और इसका असर कांग्रेस के संगठनात्मक प्रदर्शन पर पड़ने की संभावना जताई जा रही है। कांग्रेस कई वार्डों में अधिकृत प्रत्याशी तक मैदान में नहीं उतार पाई है, जिससे भाजपा को स्थानीय स्तर पर बढ़त मिल सकती है। हालांकि नगर निगम चुनाव में स्थानीय मुद्दे, प्रत्याशियों की व्यक्तिगत पकड़, वार्ड स्तर का संगठन और जातीय-सामाजिक समीकरण अंतिम परिणाम को प्रभावित करने वाले महत्वपूर्ण कारक रहेंगे। कुल मिलाकर कोटा में बिरला, धारीवाल और गुंजल की राजनीतिक पकड़, अजमेर में देवनानी और गहलोत परिवार के बीच खुली चुनौती, बीकानेर में अर्जुनराम मेघवाल और बीडी कल्ला की प्रतिष्ठा तथा भीलवाड़ा में कांग्रेस के अंदरूनी मतभेद राजस्थान के इन निकाय चुनावों को खासा महत्वपूर्ण बना रहे हैं और नतीजे कई बड़े नेताओं के स्थानीय राजनीतिक प्रभाव की दिशा भी तय कर सकते हैं।



