मंगोलिया से 2 हजार किमी उड़कर बीकानेर पहुंचीं कुरजां: 40 डिग्री गर्मी के बावजूद 20 हजार विदेशी पक्षियों ने लूणकरनसर में डाला डेरा
GPS ट्रैकिंग से सामने आया प्रवास मार्ग, अल्ताई से चीन के शिनजियांग, पामीर, काराकोरम और हिमालय पार कर पहुंचीं राजस्थान

बीकानेर। राजस्थान में तापमान 40 डिग्री सेल्सियस तक पहुंचने के बावजूद विदेशी पक्षियों कुरजां का लूणकरनसर पहुंचने का सिलसिला शुरू हो गया है। अब तक करीब 20 हजार कुरजां के यहां पहुंचने का अनुमान है। ये पक्षी पश्चिमी मंगोलिया के अल्ताई पर्वतीय क्षेत्र से उड़ान भरकर करीब 2 हजार किलोमीटर की दूरी तय करते हुए बीकानेर जिले के लूणकरनसर पहुंचे हैं।
पक्षियों के प्रवास पर नजर रखने के लिए की जा रही GPS ट्रैकिंग से इनके लंबे सफर का मार्ग सामने आया है। कुरजां ने मंगोलिया से निकलने के बाद चीन के शिनजियांग क्षेत्र, पामीर, काराकोरम और हिमालयी इलाके को पार किया और इसके बाद उत्तरी भारत में प्रवेश किया।
अल्ताई पर्वत से शुरू हुआ सफर
पक्षी विशेषज्ञ डॉ. दाऊ बोहरा के अनुसार, कुरजां पश्चिमी मंगोलिया के होव्द-उल्गी क्षेत्र के आसपास से प्रवास के लिए निकलीं। इसके बाद इनका रास्ता अल्ताई पर्वतमाला और पूर्वी कजाकिस्तान-पश्चिमी मंगोलिया के क्षेत्रों से होकर चीन की ओर बढ़ा।
GPS से लैस पक्षियों की ट्रैकिंग के जरिए विशेषज्ञ इनके प्रवास की दिशा और पड़ावों का अध्ययन कर रहे हैं।
चीन से पामीर और हिमालय तक का सफर
मंगोलिया से निकलने के बाद कुरजां चीन के शिनजियांग पहुंचीं। यहां से उरुमची और मध्य शिनजियांग होते हुए दक्षिणी शिनजियांग के काशगर क्षेत्र तक इनका सफर जारी रहा।
इसके बाद पक्षियों ने पामीर और काराकोरम के दुर्गम पर्वतीय क्षेत्रों को पार किया। हिमालयी क्षेत्र से होते हुए वे भारत पहुंचीं और करीब 2 हजार किलोमीटर की यात्रा के बाद लूणकरनसर में अपना पड़ाव बनाया।
झील और खुले मैदान बने प्रवासी पक्षियों का ठिकाना
लूणकरनसर की नमक झील और आसपास के आर्द्र क्षेत्र, जलाशय तथा खुले मैदान कुरजां के लिए अनुकूल वातावरण उपलब्ध कराते हैं। यहां उन्हें पानी के साथ अनाज, बीज, घास, कृषि फसलों के अवशेष और छोटे जीव भोजन के रूप में मिलते हैं।
दिन के समय बड़ी संख्या में कुरजां आसपास के खेतों और खुले इलाकों में दिखाई देती हैं, जबकि जलाशय और झील क्षेत्र इनके विश्राम के लिए महत्वपूर्ण स्थान हैं।
मार्च-अप्रैल में लौटती हैं कुरजां
कुरजां का लूणकरनसर में मौसमी आगमन पिछले 20 साल से अधिक समय से देखा जा रहा है। मध्य एशिया में सर्दी बढ़ने के साथ ये पक्षी दक्षिण की ओर प्रवास करती हैं।
राजस्थान में सर्दियों के दौरान अनुकूल परिस्थितियां मिलने के कारण ये यहां कई महीने रुकती हैं। सामान्य तौर पर मार्च-अप्रैल में तापमान बढ़ने के बाद इनका उत्तर दिशा में अपने प्रजनन क्षेत्रों की ओर लौटना शुरू हो जाता है।
GPS टैगिंग से वैज्ञानिकों को मिल रही अहम जानकारी
मंगोलिया में कुछ कुरजां को टैग और GPS डिवाइस लगाए जाते हैं। इससे वैज्ञानिक यह पता लगा सकते हैं कि पक्षी कहां से उड़ान भरते हैं, किस रास्ते से गुजरते हैं, कहां रुकते हैं और कितनी दूरी तय करते हैं।
3 अक्टूबर 2026 को टैग की गई एक कुरजां का लूणकरनसर पहुंचना प्रवास के मार्ग और अलग-अलग क्षेत्रों के बीच पक्षियों की कनेक्टिविटी के अध्ययन के लिए महत्वपूर्ण रिकॉर्ड माना जा रहा है।
विशेषज्ञों के अनुसार, मौसम में बदलाव, दिन की लंबाई, भोजन-पानी की उपलब्धता और प्रजनन क्षेत्रों की परिस्थितियां इन पक्षियों के प्रवास के समय और मार्ग को प्रभावित कर सकती हैं।
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