राखी पर पूर्व CM का संदेश- ‘नो मोर’, केकड़ी में दो दिन में बदला सियासी समीकरण
पूर्व मंत्री राजपाल सिंह शेखावत को पान मसाला छोड़ने की सलाह, वहीं कमलेश साहू के भाजपा में जाने और फिर कांग्रेस में लौटने से गरमाई राजनीति

राजस्थान की सियासत में राखी के मौके पर जहां पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे और पूर्व मंत्री राजपाल सिंह शेखावत की मुलाकात चर्चा में रही, वहीं केकड़ी में कांग्रेस नेता एवं नगरपालिका के पूर्व चेयरमैन कमलेश साहू के भाजपा में शामिल होने और महज दो दिन बाद कांग्रेस में वापस लौटने का मामला भी राजनीतिक गलियारों में सुर्खियों में रहा। राजपाल सिंह शेखावत के मामले में बताया गया कि वे राखी के अवसर पर वसुंधरा राजे के आवास पहुंचे, जहां राजे ने उन्हें राखी बांधी और उनकी पान मसाला खाने की आदत को लेकर बड़ी बहन की तरह समझाइश दी। उन्होंने कहा कि उन्हें मिठाई या नेग नहीं चाहिए, बल्कि यदि कुछ देना है तो पान मसाला छोड़ने का वचन दें। राजे ने इसे ‘नो मोर’ कहते हुए शेखावत से आदत छोड़ने की बात कही, जिस पर उन्होंने भी ऐसा करने का वचन दिया। दूसरी ओर केकड़ी में कांग्रेस नेता और नगरपालिका के पूर्व चेयरमैन कमलेश साहू के भाजपा में शामिल होने का घटनाक्रम ज्यादा तेजी से बदला। विधायक शत्रुघ्न गौतम की मौजूदगी में साहू का सम्मान किया गया और उन्हें भाजपा का पटका पहनाया गया। इस दौरान विधायक ने उन्हें गले लगाया और साहू ने भाजपा नेतृत्व तथा विधायक की प्रशंसा करते हुए पार्टी में जाने की बात कही। हालांकि दो दिन बाद ही साहू ने कांग्रेस नेताओं के साथ प्रेस कॉन्फ्रेंस कर दावा किया कि उन्हें डराने-धमकाने के बाद भाजपा में शामिल कराया गया था। उन्होंने कहा कि उन्होंने कांग्रेस से इस्तीफा तक नहीं दिया है और वे कांग्रेस में थे, हैं तथा कांग्रेस में ही रहेंगे। इस घटनाक्रम ने स्थानीय राजनीति में दल-बदल और चुनावी तैयारियों को लेकर चर्चाओं को तेज कर दिया है। वहीं पूर्व मंत्री बाबूलाल नागर को लेकर भी राजनीतिक गलियारों में चर्चाएं जारी हैं। रिपोर्ट के मुताबिक कांग्रेस मुख्यालय स्थित चुनावी वॉर रूम में पहुंचने की कोशिश के दौरान सुरक्षाकर्मियों ने उन्हें अंदर जाने की अनुमति नहीं दी। बताया गया कि उन्होंने कई नेताओं को फोन कर अंदर जाने का रास्ता तलाशने की कोशिश की, लेकिन सफलता नहीं मिली और अंततः उन्हें वापस लौटना पड़ा। इस पूरे घटनाक्रम को राजस्थान की बदलती राजनीतिक परिस्थितियों, चुनावी रणनीति और नेताओं के बीच बदलते समीकरणों से जोड़कर देखा जा रहा है। हालांकि रिपोर्ट में वर्णित कई बातें राजनीतिक चर्चाओं और संबंधित नेताओं के दावों पर आधारित हैं, इसलिए उनके स्वतंत्र सत्यापन के बिना उन्हें आरोप या दावे के रूप में ही देखा जाना चाहिए।




