जोधपुर में शेखावत-गहलोत फैक्टर से कांटे की टक्कर, उदयपुर में बागियों का खतरा
पाली में निर्दलीय बदल सकते हैं चुनावी समीकरण; तीनों नगर निगमों में दिग्गज नेताओं की प्रतिष्ठा दांव पर

जोधपुर। राजस्थान के निकाय चुनाव में जोधपुर, उदयपुर और पाली नगर निगम की सियासी तस्वीर अलग-अलग नजर आ रही है। जोधपुर में भाजपा-कांग्रेस के बीच कांटे की टक्कर, उदयपुर में भाजपा मजबूत स्थिति में होने के बावजूद कांग्रेस के बागी चुनौती बने हुए हैं, जबकि पाली में निर्दलीय प्रत्याशी बोर्ड गठन में अहम भूमिका निभा सकते हैं। तीनों निगमों में दिग्गज नेताओं की प्रतिष्ठा भी दांव पर है।
जोधपुर में शेखावत बनाम गहलोत का मुकाबला
जोधपुर नगर निगम में केंद्रीय मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत और पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की प्रतिष्ठा दांव पर है। दोनों दलों के बीच मुकाबला कड़ा माना जा रहा है। भाजपा के विधायक अतुल भंसाली और देवेंद्र जोशी भी बोर्ड बनाने के लिए सक्रिय हैं।
कांग्रेस की ओर से गहलोत के करीबी नेता राजेंद्र सोलंकी और पूर्व विधायक मनीषा पंवार चुनावी मैनेजमेंट में सक्रिय हैं। हालांकि, पर्दे के पीछे चुनाव की कमान अशोक गहलोत संभाल रहे हैं।
ओबीसी वोटर अहम
जोधपुर में करीब 25 प्रतिशत सीटों पर ओबीसी वोटर जीत-हार में निर्णायक भूमिका निभाते हैं। माली, जाट और घांची जैसी जातियों का प्रभाव कई वार्डों में है। रिपोर्ट के मुताबिक कांग्रेस की माइनॉरिटी और SC-ST वोटरों में पकड़ है, जबकि भाजपा को सामान्य वर्ग के वोटरों का समर्थन मिलता दिख रहा है। ओबीसी वोट दोनों दलों के बीच बंटा हुआ है।
जोधपुर के बड़े मुद्दे
- डोर-टू-डोर कचरा कलेक्शन और अंदरूनी शहर में गंदगी
- पुरानी सीवरेज लाइन और लीकेज की समस्या
- प्रदूषण नियंत्रण में नाकामी
उदयपुर में भाजपा मजबूत, कांग्रेस के बागी चुनौती
उदयपुर नगर निगम में भाजपा लगातार छह बार से बोर्ड बनाने का दावा कर रही है। यहां मेयर पद ओपन होने के कारण कई बड़े नेता और उनके रिश्तेदार चुनाव मैदान में हैं। गुलाबचंद कटारिया के दोनों दामादों के भाई अतुल चंडालिया और आकाश वागरेचा भी पार्षद का चुनाव लड़ रहे हैं।
भाजपा की ओर से पूर्व शहर अध्यक्ष दिनेश भट्ट, प्रमोद सामर, पूर्व डिप्टी मेयर पारस सिंघवी और महेंद्र सिंह शेखावत मैदान में हैं। कांग्रेस की ओर से डॉ. पूनम कुंवर और अरुण टांक समेत कई प्रमुख चेहरे चुनाव लड़ रहे हैं।
12 बागी कांग्रेस के लिए बड़ी चुनौती
कांग्रेस में टिकट बंटवारे के बाद 22 बागियों में से 10 को मनाने में पार्टी सफल रही, लेकिन 12 बागी अभी भी मैदान में हैं। इसके उलट भाजपा में केवल एक बागी के चुनाव लड़ने की जानकारी है। ऐसे में बागी फैक्टर कांग्रेस के लिए बड़ी चुनौती बन सकता है।
उदयपुर के बड़े मुद्दे
- आयड़ नदी का सौंदर्यीकरण
- ट्रैफिक जाम और फ्लाईओवर की मांग
- साफ-सफाई और कचरा निस्तारण
पाली में निर्दलीय तय कर सकते हैं बोर्ड
पाली नगर निगम में 65 वार्ड हैं। यहां छह वार्डों में कांग्रेस का प्रत्याशी नहीं है। तीन प्रत्याशियों के सिंबल जमा नहीं हुए, जबकि तीन नामांकन रद्द हो गए। वार्ड 55 के कांग्रेस प्रत्याशी के भाजपा में शामिल होने से भी कांग्रेस की चुनौती बढ़ी है।
दूसरी ओर पूर्व सभापति राकेश भाटी के कांग्रेस का हाथ थामकर वार्ड 32 से चुनाव लड़ने से भाजपा को भी चुनौती मिल रही है। दोनों दलों में पुराने नेताओं के टिकट कटने के कारण बागी फैक्टर मजबूत हुआ है। सियासी जानकारों के मुताबिक निर्दलीय प्रत्याशी बोर्ड गठन में अहम भूमिका निभा सकते हैं।
मदन राठौड़ की प्रतिष्ठा दांव पर
पाली प्रदेश भाजपा अध्यक्ष मदन सिंह राठौड़ का गृह जिला है। भाजपा की ओर से पूर्व विधायक ज्ञानचंद पारख, जिलाध्यक्ष सुनील भंडारी और सांसद पीपी चौधरी चुनावी मैनेजमेंट संभाल रहे हैं। कांग्रेस की ओर से भी स्थानीय नेताओं ने मोर्चा संभाल रखा है।
पाली के बड़े मुद्दे
- आवारा मवेशी और कुत्तों की समस्या
- अधूरी सीवरेज लाइन और कचरा निस्तारण
- टूटी सड़कें और बेतरतीब ट्रैफिक व्यवस्था
तीनों शहरों में क्या बन रहा समीकरण?
जोधपुर: शेखावत बनाम गहलोत की सीधी राजनीतिक टक्कर और ओबीसी वोटर अहम।
उदयपुर: भाजपा लगातार छठी बार बोर्ड बनाने की कोशिश में है, लेकिन कांग्रेस के 12 बागी मुकाबले को प्रभावित कर सकते हैं।
पाली: कांग्रेस के छह वार्डों में प्रत्याशी नहीं होने से भाजपा को फायदा मिल सकता है, लेकिन निर्दलीय उम्मीदवार पूरे समीकरण को बदल सकते हैं।
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