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उज्जैन

14वीं सदी का ऐतिहासिक महाकाल द्वार भरभराकर गिरा, 2.12 करोड़ से चल रहा था जीर्णोद्धार

बारिश के बीच पास में चल रही थी गहरी खुदाई, जमीन के सेटलमेंट की आशंका; हादसे के वक्त आसपास कोई नहीं होने से टली जनहानि

उज्जैन में महाकाल मंदिर से रामघाट की ओर जाने वाले प्राचीन मार्ग पर स्थित करीब 14वीं सदी का ऐतिहासिक महाकाल द्वार देर रात अचानक भरभराकर गिर गया। जिस समय यह हादसा हुआ, उस वक्त द्वार के आसपास कोई व्यक्ति मौजूद नहीं था, जिसके चलते एक बड़ा हादसा होने से बच गया और किसी तरह की जनहानि की सूचना नहीं है। घटना की जानकारी मिलने के बाद रविवार सुबह स्मार्ट सिटी और संबंधित विभाग के अधिकारी मौके पर पहुंचे और क्षतिग्रस्त ऐतिहासिक संरचना का निरीक्षण किया। प्रारंभिक जांच में सामने आया है कि महाकाल द्वार के ठीक आसपास निर्माण कार्य के लिए गहरी खुदाई यानी डीप एक्सकेवेशन चल रही थी और पिछले दो-तीन दिनों से क्षेत्र में लगातार बारिश भी हो रही थी। लगातार बारिश के कारण जमीन में नमी बढ़ने और मिट्टी के खिसकने या जमीन के सेटलमेंट की वजह से द्वार की नींव और संरचना प्रभावित होने की आशंका जताई जा रही है, हालांकि अधिकारियों का कहना है कि वास्तविक कारण विस्तृत जांच के बाद ही स्पष्ट हो सकेगा। कार्यपालन यंत्री कमल सक्सेना के अनुसार प्रारंभिक जानकारी में हादसा रात के समय होने की बात सामने आई है और आसपास गहरी खुदाई का काम चल रहा था। बारिश और खुदाई के कारण जमीन की स्थिति प्रभावित होने से सेटलमेंट की संभावना को घटना की एक वजह माना जा रहा है। महाकाल द्वार श्री महाकालेश्वर मंदिर से करीब 100 मीटर की दूरी पर स्थित है और यह रामघाट जाने वाले पुराने मार्ग का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है। लंबे समय से जर्जर स्थिति के कारण इस रास्ते को बंद रखा गया था, जिसके बाद उज्जैन स्मार्ट सिटी लिमिटेड की महाकाल मंदिर परिसर विस्तार परियोजना के तहत करीब 2.12 करोड़ रुपए की लागत से इसके जीर्णोद्धार और पुनर्विकास का काम कराया जा रहा था। इस ऐतिहासिक संरचना के संरक्षण में आधुनिक सीमेंट की जगह पारंपरिक चूना तकनीक का इस्तेमाल किया जा रहा था। निर्माण कार्य में चंदेरी और ललितपुर से आए कारीगर चूना, गुड़, मैथी, गूगल, उड़द के पानी, ईंट के चूरे और रेत जैसे पारंपरिक मिश्रण का उपयोग कर रहे थे। बताया गया था कि पारंपरिक निर्माण तकनीक का उद्देश्य ऐतिहासिक संरचना के मूल स्वरूप और मजबूती को बनाए रखना था। द्वार के अचानक गिरने के बाद अब निर्माण की गुणवत्ता, जीर्णोद्धार में इस्तेमाल की गई तकनीक, आसपास चल रही गहरी खुदाई और जमीन की मौजूदा स्थिति को लेकर सवाल उठ रहे हैं। महाकाल द्वार का धार्मिक और ऐतिहासिक महत्व काफी पुराना है। इसे मध्यकालीन दौर से महाकाल मंदिर और रामघाट के बीच संपर्क मार्ग के तौर पर इस्तेमाल किए जाने की जानकारी मिलती है। ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार यह द्वार लगभग 14वीं शताब्दी ईस्वी के आरंभ का माना जाता है और इसका निर्माण बेसाल्ट पत्थर तथा ईंटों से किया गया था। महाकाल द्वार परिसर में मेहराबदार प्रवेश द्वार के अलावा पत्थर की सीढ़ियां, मंदिर से प्राप्त नक्काशीदार पत्थरों के अवशेष और पुराना मार्ग भी मौजूद रहा है। सदियों से स्थानीय लोगों और देश-विदेश से आने वाले श्रद्धालुओं के लिए यह स्थान महाकाल मंदिर और रामघाट को जोड़ने वाले महत्वपूर्ण रास्ते के रूप में उपयोग होता रहा है। इसकी स्थापत्य शैली और ऐतिहासिक संरचना से अलग-अलग कालखंडों में इसके पुनरुद्धार के संकेत मिलते हैं। बताया जाता है कि मध्यकाल में हुए विध्वंस के बाद इस स्थल पर अलग-अलग समय में संरक्षण और पुनर्निर्माण के कार्य हुए। सिंधिया शासन के दौरान 18वीं शताब्दी में भी यहां पुनरुद्धार हुआ और आधुनिक दौर में सिंहस्थ कुंभ 2004 के समय भी संरचना पर काम किया गया था। इसके बाद 2021 में उज्जैन स्मार्ट सिटी लिमिटेड की योजना के तहत महाकाल द्वार के पुनर्विकास की दिशा में काम किया गया। अब करोड़ों रुपए की लागत से चल रहे जीर्णोद्धार के बीच ऐतिहासिक द्वार के गिरने की घटना ने संरक्षण कार्यों और आसपास चल रहे निर्माण की निगरानी को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। प्रशासन और संबंधित विभाग की जांच के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि द्वार गिरने के पीछे मुख्य कारण लगातार बारिश, गहरी खुदाई से जमीन का प्रभावित होना, निर्माण कार्य की तकनीकी स्थिति या इन सभी परिस्थितियों का संयुक्त प्रभाव था। फिलहाल अधिकारियों ने घटनास्थल का निरीक्षण कर स्थिति का जायजा लिया है और मामले की जांच की जा रही है।

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