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अमेरिका डॉलर से कैसे कमाता है अरबों? जानिए डॉलर के दुनिया की सबसे ताकतवर करेंसी बनने की कहानी और BRICS की चुनौती

डॉलर की वैश्विक ताकत के पीछे क्या है अमेरिका का आर्थिक फायदा? BRICS की लोकल करेंसी में कारोबार बढ़ाने की रणनीति से बदल सकता है ग्लोबल पेमेंट सिस्टम

डॉलर की वैश्विक बादशाहत के पीछे क्या है अमेरिका की ताकत? BRICS देशों की लोकल करेंसी में कारोबार बढ़ाने की कोशिश से क्या बदल सकती है दुनिया की आर्थिक व्यवस्था?

नई दिल्ली, 14 सितम्बर। दुनिया की अर्थव्यवस्था में अमेरिकी डॉलर की भूमिका लंबे समय से बेहद महत्वपूर्ण रही है। अंतरराष्ट्रीय व्यापार, तेल की खरीद-बिक्री, विदेशी मुद्रा भंडार और वैश्विक वित्तीय लेन-देन में डॉलर का व्यापक इस्तेमाल होता है। यही वजह है कि अमेरिका की करेंसी को दुनिया की सबसे प्रभावशाली मुद्राओं में गिना जाता है।

लेकिन सवाल यह है कि डॉलर को इतनी ताकत आखिर मिली कैसे? अमेरिका को इसका आर्थिक फायदा किस तरह मिलता है और अब BRICS देश डॉलर पर अपनी निर्भरता कम करने की कोशिश क्यों कर रहे हैं?

डॉलर कैसे बना दुनिया की प्रमुख करेंसी?

डॉलर की मौजूदा वैश्विक भूमिका अचानक नहीं बनी। इसके पीछे कई दशकों का आर्थिक और राजनीतिक इतिहास है।

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद वैश्विक आर्थिक व्यवस्था को नए सिरे से व्यवस्थित करने की जरूरत महसूस हुई। 1944 में ब्रेटन वुड्स समझौते के तहत एक ऐसी अंतरराष्ट्रीय मौद्रिक व्यवस्था तैयार हुई, जिसमें अमेरिकी डॉलर को केंद्रीय भूमिका मिली।

उस समय डॉलर को सोने से जोड़कर रखा गया था और अन्य प्रमुख मुद्राओं की विनिमय दर डॉलर के संदर्भ में तय की जाती थी। इससे अंतरराष्ट्रीय कारोबार में डॉलर का इस्तेमाल तेजी से बढ़ा।

बाद में अमेरिका ने डॉलर को सोने में बदलने की व्यवस्था समाप्त कर दी, लेकिन तब तक दुनिया के वित्तीय और व्यापारिक ढांचे में डॉलर की भूमिका काफी मजबूत हो चुकी थी।

तेल कारोबार ने भी बढ़ाई डॉलर की ताकत

डॉलर के प्रभुत्व को मजबूत करने में अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा कारोबार की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही। दुनिया में कच्चे तेल का कारोबार बड़े पैमाने पर डॉलर में होता रहा है।

इस व्यवस्था के कारण जिन देशों को तेल और अन्य अंतरराष्ट्रीय वस्तुओं का आयात करना होता है, उन्हें बड़ी मात्रा में डॉलर की जरूरत पड़ती है। इससे वैश्विक स्तर पर डॉलर की मांग बनी रहती है।

यही कारण है कि डॉलर सिर्फ अमेरिका की घरेलू करेंसी नहीं रह गया, बल्कि अंतरराष्ट्रीय व्यापार की प्रमुख मुद्रा बन गया।

अमेरिका को डॉलर की ताकत से क्या फायदा मिलता है?

जब दुनिया के दूसरे देश अपने विदेशी मुद्रा भंडार में डॉलर रखते हैं या अंतरराष्ट्रीय व्यापार के लिए डॉलर का इस्तेमाल करते हैं, तो अमेरिकी मुद्रा की वैश्विक मांग बनी रहती है।

इसका अमेरिका को कई स्तरों पर फायदा मिलता है।

1. दुनिया को डॉलर की जरूरत

कई देश व्यापार और वित्तीय लेन-देन के लिए डॉलर रखते हैं। इससे अमेरिकी मुद्रा की मांग मजबूत रहती है।

2. अमेरिकी वित्तीय बाजारों को फायदा

दुनिया के निवेशक अमेरिकी सरकारी बॉन्ड और अन्य डॉलर आधारित परिसंपत्तियों में पैसा लगाते हैं। इससे अमेरिका को वैश्विक पूंजी तक व्यापक पहुंच मिलती है।

3. अमेरिका को अपेक्षाकृत सस्ती फंडिंग

डॉलर की वैश्विक मांग अमेरिकी सरकार और वित्तीय व्यवस्था के लिए एक महत्वपूर्ण लाभ मानी जाती है। विदेशी निवेशकों द्वारा अमेरिकी सरकारी प्रतिभूतियां खरीदने से अमेरिका को बड़े पैमाने पर वित्तीय संसाधन मिलते हैं।

4. डॉलर जारी करने का विशेष लाभ

अमेरिका अपनी मुद्रा जारी करता है, जबकि दूसरे देशों को डॉलर हासिल करने के लिए अपनी वस्तुएं, सेवाएं या दूसरी परिसंपत्तियां बेचनी पड़ सकती हैं। अर्थशास्त्र में मुद्रा जारी करने से मिलने वाले लाभ को सीनियोरेज (Seigniorage) कहा जाता है।

हालांकि यह कहना सही नहीं होगा कि अमेरिका केवल डॉलर छापकर सीधे अरबों डॉलर का मुनाफा कमाता है। डॉलर की वैश्विक स्थिति से मिलने वाला आर्थिक लाभ कहीं अधिक व्यापक और अप्रत्यक्ष है।

BRICS क्यों घटाना चाहता है डॉलर पर निर्भरता?

BRICS देशों में भारत, ब्राजील, रूस, चीन और दक्षिण अफ्रीका सहित कई देश शामिल हैं। समूह के विस्तार के साथ इसकी आर्थिक और व्यापारिक भूमिका भी बढ़ी है।

BRICS के कई देश अंतरराष्ट्रीय व्यापार में स्थानीय मुद्राओं के इस्तेमाल को बढ़ावा देने की बात करते रहे हैं। इसका उद्देश्य यह है कि सदस्य देश आपसी व्यापार में हर लेन-देन के लिए पहले अपनी मुद्रा को डॉलर में बदलने और फिर दूसरी मुद्रा खरीदने पर निर्भर न रहें।

इसे व्यापक रूप से डी-डॉलराइजेशन यानी डॉलर पर निर्भरता कम करने की कोशिश के रूप में देखा जाता है।

रूस के लिए डॉलर से दूरी क्यों महत्वपूर्ण है?

रूस पर पश्चिमी देशों के प्रतिबंधों के बाद अंतरराष्ट्रीय भुगतान व्यवस्था में डॉलर और पश्चिमी वित्तीय संस्थानों पर निर्भरता का जोखिम उसके लिए अधिक महत्वपूर्ण हो गया।

इसी वजह से रूस ने चीन समेत कई देशों के साथ स्थानीय मुद्राओं में व्यापार बढ़ाने की कोशिश की है।

चीन भी बढ़ाना चाहता है युआन की भूमिका

दुनिया की दूसरी बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल चीन लंबे समय से अंतरराष्ट्रीय व्यापार में अपनी मुद्रा युआन (रेनमिन्बी) की भूमिका बढ़ाने की कोशिश कर रहा है।

चीन और उसके व्यापारिक साझेदारों के बीच कुछ लेन-देन स्थानीय मुद्राओं में होने लगे हैं। हालांकि वैश्विक स्तर पर डॉलर की जगह पूरी तरह युआन को स्थापित करना अभी एक बड़ी चुनौती है।

भारत का रुख क्या है?

भारत भी कई देशों के साथ स्थानीय मुद्राओं में व्यापार और भुगतान के विकल्पों पर काम कर रहा है। भारत का उद्देश्य केवल डॉलर को हटाना नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय व्यापार के लिए वैकल्पिक भुगतान व्यवस्था विकसित करना भी है।

स्थानीय मुद्रा में व्यापार होने से विदेशी मुद्रा के लेन-देन की लागत कम करने और कुछ परिस्थितियों में डॉलर पर निर्भरता घटाने में मदद मिल सकती है।

क्या BRICS डॉलर को खत्म कर सकता है?

यह सबसे बड़ा सवाल है। फिलहाल इसका जवाब आसान नहीं है

डॉलर की ताकत सिर्फ इसलिए नहीं है कि अमेरिका उसे जारी करता है। इसके पीछे अमेरिका की विशाल अर्थव्यवस्था, गहरे वित्तीय बाजार, वैश्विक बैंकिंग नेटवर्क, अमेरिकी सरकारी बॉन्ड बाजार और लंबे समय से बनी अंतरराष्ट्रीय व्यापार व्यवस्था शामिल है।

इसके अलावा BRICS देशों की अर्थव्यवस्थाओं, राजनीतिक प्राथमिकताओं और वित्तीय व्यवस्थाओं में काफी अंतर है। इसलिए एक साझा मुद्रा या डॉलर का तत्काल विकल्प तैयार करना आसान नहीं होगा।

फिर BRICS की रणनीति का असर क्या हो सकता है?

यदि BRICS और दूसरे देश आपसी व्यापार में स्थानीय मुद्राओं का इस्तेमाल लगातार बढ़ाते हैं, तो अंतरराष्ट्रीय भुगतान व्यवस्था में धीरे-धीरे विविधता आ सकती है।

इसका अर्थ यह नहीं कि डॉलर अचानक खत्म हो जाएगा। बल्कि संभव है कि वैश्विक अर्थव्यवस्था में एक प्रमुख मुद्रा के बजाय कई मुद्राओं की भूमिका बढ़े।

यानी आने वाले समय में मुकाबला डॉलर बनाम एक दूसरी करेंसी का ही नहीं, बल्कि अलग-अलग भुगतान प्रणालियों और मुद्राओं के बीच बढ़ सकता है।

डॉलर की बादशाहत के लिए सबसे बड़ी चुनौती क्या है?

डॉलर के सामने चुनौती केवल BRICS से नहीं है। दुनिया में कई देश अपनी आर्थिक और वित्तीय संप्रभुता को मजबूत करना चाहते हैं।

स्थानीय मुद्रा में व्यापार, डिजिटल भुगतान व्यवस्था और अलग-अलग देशों के बीच सीधे मुद्रा विनिमय जैसे विकल्प बढ़ने से अंतरराष्ट्रीय भुगतान प्रणाली धीरे-धीरे बदल सकती है।

फिर भी डॉलर को हटाना आसान नहीं होगा। वैश्विक वित्तीय व्यवस्था में उसकी गहरी पैठ और अमेरिकी वित्तीय बाजारों की मजबूती उसे लंबे समय तक महत्वपूर्ण बनाए रख सकती है।

निष्कर्ष

BRICS का लक्ष्य डॉलर को रातोंरात खत्म करना नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय कारोबार में डॉलर पर निर्भरता कम करने के विकल्प तैयार करना है।

अगर स्थानीय मुद्राओं में व्यापार बढ़ता है, तो वैश्विक वित्तीय व्यवस्था अधिक बहुध्रुवीय हो सकती है। लेकिन निकट भविष्य में डॉलर की जगह किसी एक दूसरी मुद्रा का पूरी तरह ले लेना मुश्किल दिखाई देता है।

इसलिए आने वाले वर्षों की असली कहानी “डॉलर खत्म होगा या नहीं” से ज्यादा “दुनिया डॉलर पर कितनी निर्भर रहेगी” की होगी।

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