JDU का नाम बदलना लगभग तय: 3 बड़े फैक्टर; निशांत को पार्टी सौंपने से पहले ‘नीतीश’ की विरासत लॉक करने की तैयारी
JDU का नाम ‘जनता दल नीतीश’ करने की तैयारी, निशांत कुमार के राजनीतिक भविष्य और नीतीश की विरासत से जुड़ी 3 बड़ी रणनीतियां

पटना। जनता दल यूनाइटेड (JDU) का नाम बदलकर ‘जनता दल नीतीश’ करने के सुझाव ने बिहार की राजनीति में हलचल बढ़ा दी है। 10 सितंबर को खगड़िया में ‘नीतीश संवाद’ कार्यक्रम के दौरान पार्टी के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष संजय झा ने JDU का नाम बदलने का सुझाव दिया था।
इसके बाद डिप्टी CM बिजेंद्र प्रसाद यादव, मंत्री श्रवण कुमार और बिहार JDU अध्यक्ष उमेश कुशवाहा ने भी इस सुझाव को लेकर सकारात्मक रुख दिखाया। उमेश कुशवाहा ने कहा कि संजय झा ने जो भावना व्यक्त की है, वह JDU के प्रत्येक कार्यकर्ता की भावना है और नीतीश कुमार पार्टी की सबसे बड़ी पूंजी हैं।
नाम बदलने के पीछे पार्टी की रणनीति, नीतीश कुमार की राजनीतिक विरासत और उनके बेटे निशांत कुमार के भविष्य को लेकर कई सवाल उठ रहे हैं।
सवाल 1: JDU का नाम बदलने का पूरा मामला क्या है?
10 सितंबर को खगड़िया में ‘नीतीश संवाद’ कार्यक्रम के दौरान संजय झा ने जनता दल यूनाइटेड का नाम बदलकर ‘जनता दल (नीतीश)’ या ‘JD(U)-Nitish’ करने का सुझाव दिया।
उन्होंने कहा कि इससे नीतीश कुमार के राजनीतिक योगदान और विचारधारा को सम्मान मिलेगा। इसके अगले दिन डिप्टी CM बिजेंद्र प्रसाद यादव ने कहा कि यह संजय झा की इच्छा है और जब पार्टी के सामने औपचारिक प्रस्ताव आएगा, तब संगठन इस पर विचार करेगा।
मंत्री श्रवण कुमार ने भी कहा कि JDU नीतीश कुमार के नाम और काम पर चल रही है और पार्टी के नाम में उनका नाम जुड़ना चाहिए। वहीं उमेश कुशवाहा ने इस प्रस्ताव के समर्थन में खुलकर बात रखी।
सवाल 2: क्या संजय झा का बयान पार्टी में टूट की तरफ इशारा है?
ऐसा नहीं माना जा रहा है। रिपोर्ट के मुताबिक JDU में फिलहाल पार्टी एकजुट है और संजय झा के सुझाव का किसी बड़े नेता ने विरोध नहीं किया है।
पॉलिटिकल एनालिस्ट अभिरंजन कुमार के मुताबिक, नीतीश कुमार के राज्यसभा जाने के बाद निशांत कुमार के आगे की राजनीति करने की चर्चा है। उनका मानना है कि पार्टी के कुछ पुराने कार्यकर्ताओं और नीतीश समर्थकों में संजय झा समेत उनके आसपास के नेताओं को लेकर नाराजगी रही है।
सवाल 3: आखिर JDU का नाम क्यों बदलना चाहते हैं नेता?
इसके पीछे तीन बड़ी रणनीतियां बताई जा रही हैं।
1. नीतीश की विरासत की लड़ाई खत्म होगी, निशांत की राह आसान होगी
रिपोर्ट के मुताबिक, नीतीश कुमार के बिहार से दिल्ली जाने के बाद उनकी राजनीतिक विरासत को लेकर अंदरखाने खींचतान है। राष्ट्रीय लोक मोर्चा के प्रमुख उपेंद्र कुशवाहा भी समय-समय पर उनकी विरासत पर दावा करते रहे हैं। वहीं नीतीश कुमार के मुख्यमंत्री पद से हटने के बाद सम्राट चौधरी मुख्यमंत्री बने और स्वाभाविक उत्तराधिकारी के तौर पर उभरे।
चुनावी रणनीतिकारों का मानना है कि अगर पार्टी के नाम में ‘नीतीश’ जुड़ता है तो लोगों के बीच सीधा संदेश जाएगा कि यही पार्टी नीतीश कुमार की राजनीतिक विरासत की प्रतिनिधि है।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि निशांत कुमार जल्द पार्टी की बागडोर संभाल सकते हैं। 8 सितंबर को संजय झा ने बेगूसराय में कहा था कि पार्टी का आगे का भविष्य तय हो चुका है और निशांत कुमार आगे संगठन की जिम्मेदारी संभालेंगे।
2. ‘ब्रांड नीतीश’ को मजबूत करने की रणनीति
बिहार में JDU की पहचान नीतीश कुमार की ‘सुशासन’ और विकास पुरुष वाली छवि से जुड़ी रही है। पार्टी के नाम में ‘नीतीश’ जोड़ने से उसकी अलग पहचान मजबूत करने की रणनीति मानी जा रही है।
इस रणनीति को समझाने के लिए रिपोर्ट में बीजू जनता दल (BJD) और वाईएसआर कांग्रेस (YSRCP) के उदाहरण दिए गए हैं।
ओडिशा में बीजू पटनायक के निधन के बाद उनके नाम पर बीजू जनता दल बना और नवीन पटनायक इसके प्रमुख बने। इसके बाद पार्टी ने राज्य की राजनीति में मजबूत पकड़ बनाई और नवीन पटनायक लंबे समय तक मुख्यमंत्री रहे।
इसी तरह आंध्र प्रदेश में वाईएस राजशेखर रेड्डी के निधन के बाद उनके बेटे वाईएस जगन मोहन रेड्डी ने उनके नाम पर YSR कांग्रेस बनाई। रिपोर्ट के अनुसार, 2019 में जगन मोहन रेड्डी मुख्यमंत्री बने।
JDU के रणनीतिकार इसी तरह के मॉडल को नीतीश कुमार और निशांत कुमार के राजनीतिक भविष्य से जोड़कर देख रहे हैं।
3. वोट बैंक को जोड़कर पार्टी को एकजुट रखने की कोशिश
पार्टी के अंदर यह धारणा बताई जा रही है कि JDU के वोटर पार्टी से ज्यादा नीतीश कुमार से जुड़े हैं। ऐसे में पार्टी के नाम में नीतीश का नाम होने से ग्रामीण और कम पढ़े-लिखे मतदाताओं के लिए पार्टी की पहचान ज्यादा सीधी हो सकती है।
पॉलिटिकल एनालिस्ट अभिरंजन कुमार के अनुसार, नीतीश कुमार के बाद पार्टी में संभावित बिखराव को रोकने के लिए नाम में ही उनकी पहचान जोड़ने की कोशिश की जा रही है।
सवाल 4: क्या वाकई JDU का नाम बदलेगा?
रिपोर्ट के मुताबिक इसकी संभावना ज्यादा बताई जा रही है। अब तक किसी बड़े नेता ने इस सुझाव को खारिज नहीं किया है। पार्टी सुप्रीमो नीतीश कुमार, उनके बेटे निशांत कुमार और वरिष्ठ नेता ललन सिंह की ओर से भी इस पर कोई टिप्पणी सामने नहीं आई है।
13 सितंबर को बिहार JDU अध्यक्ष उमेश कुशवाहा के बयान से भी संकेत मिला कि पार्टी में नाम बदलने के प्रस्ताव को लेकर सकारात्मक माहौल है।
सवाल 5: सिर्फ बयान देने से नाम नहीं बदलेगा, क्या है प्रक्रिया?
सिर्फ नेताओं के बयान से पार्टी का नाम नहीं बदला जा सकता। JDU के संविधान के मुताबिक पार्टी के नाम, उद्देश्य या नीति-नियमों में बदलाव का अधिकार राष्ट्रीय परिषद के पास है।
नाम बदलने की प्रक्रिया में ये प्रमुख चरण शामिल हैं:
- किसी वरिष्ठ पदाधिकारी की ओर से राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सामने लिखित प्रस्ताव पेश किया जाएगा।
- राष्ट्रीय कार्यकारिणी की मंजूरी के बाद प्रस्ताव राष्ट्रीय परिषद के पास जाएगा।
- राष्ट्रीय परिषद की विशेष बैठक में कम से कम दो-तिहाई बहुमत से प्रस्ताव पारित करना होगा।
- इसके बाद पार्टी अध्यक्ष की स्वीकृति और चुनाव आयोग में आवेदन की प्रक्रिया होगी।
- चुनाव आयोग के निर्देश पर दो राष्ट्रीय समाचार पत्रों में प्रस्तावित नाम का विज्ञापन प्रकाशित किया जाएगा।
- आम जनता और अन्य राजनीतिक दलों को आपत्ति दर्ज कराने के लिए 30 दिन का समय मिलेगा। आपत्ति नहीं होने और नाम किसी अन्य पंजीकृत दल से मेल नहीं खाने पर आयोग नए नाम को मंजूरी दे सकता है।
सवाल 6: क्या JDU का चुनाव चिह्न ‘तीर’ भी बदलेगा?
नहीं। सिर्फ पार्टी का नाम बदलने से चुनाव चिह्न अपने आप खत्म नहीं होता। रिपोर्ट के मुताबिक, जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 और चुनाव चिह्न संबंधी नियमों के तहत बिना टूट या विलय के केवल नाम बदलने पर पार्टी पुराने चुनाव चिह्न का इस्तेमाल जारी रख सकती है, बशर्ते चुनाव आयोग की शर्तें पूरी हों।
सिंबल कब बदलता है?
अगर किसी पार्टी में दो गुट बन जाएं और दोनों मूल पार्टी के नाम और चुनाव चिह्न पर दावा करें, तो चुनाव आयोग चुनाव चिह्न को फ्रीज कर सकता है। इसके बाद दोनों गुटों को नए नाम और चुनाव चिह्न दिए जा सकते हैं।
रिपोर्ट में लोक जनशक्ति पार्टी (LJP) का उदाहरण दिया गया है, जहां 2021 में पार्टी दो गुटों में बंट गई थी और दोनों ने पार्टी के नाम और चुनाव चिह्न पर दावा किया था।
फिलहाल JDU में ऐसी स्थिति सामने नहीं आई है। इसलिए नाम बदलने की स्थिति में भी पार्टी का ‘तीर’ चुनाव चिह्न बरकरार रहने की संभावना है।


