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उज्जैन

कूनो में 60% चीते भारत में जन्मे: 4 साल में 8 से बढ़कर 52 हुई संख्या, अब नए इलाकों में बसाने की तैयारी

नामीबिया से लाए गए शुरुआती 8 चीतों में सिर्फ 3 वयस्क बचे थे; कूनो में अब 32 चीते भारत में जन्मे, गांधी सागर के बाद नौरादेही में बसाने की तैयारी

चार साल पहले जब नामीबिया से चीते भारत लाए गए थे, तब सबसे बड़ी चुनौती उन्हें देश में दोबारा बसाने की थी। 17 सितंबर 2022 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मध्यप्रदेश के कूनो नेशनल पार्क में नामीबिया से लाए गए 8 चीतों को बाड़े में छोड़ा था।

शुरुआती दौर में चीतों की मौतों के बाद प्रोजेक्ट को लेकर कई सवाल उठे। इसके बावजूद पिछले चार वर्षों में कूनो में चीतों की संख्या बढ़ी है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, अब भारत में 52 चीते हैं, जिनमें 32 का जन्म देश में ही हुआ है।

पहले साल में 9 चीतों की मौत

प्रोजेक्ट के पहले साल में कूनो में 9 चीतों की मौत हुई। इनमें 3 वयस्क और 6 शावक शामिल थे। 26 मार्च से 2 अगस्त के बीच हुई इन मौतों के बाद प्रोजेक्ट को लेकर सवाल उठे और मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा।

गर्मी भी चीतों के सामने बड़ी चुनौती बनी। कूनो में तापमान 45 डिग्री सेल्सियस से ऊपर पहुंचने के दौरान कुछ शावकों की मौत हुई। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, गर्मी और डिहाइड्रेशन को इन मौतों की वजह बताया गया था।

दूसरे साल में जन्मे 13 शावकों से बढ़ी उम्मीद

2023-24 में प्रोजेक्ट के लिए स्थिति में बदलाव देखने को मिला। इस दौरान अलग-अलग समय पर शावकों का जन्म हुआ और 13 शावक एक साल की उम्र पूरी कर सके।

अफ्रीका और नामीबिया से लाए गए वयस्क चीतों के भी भारतीय परिस्थितियों के अनुकूल होने की प्रक्रिया आगे बढ़ी।

तीसरे साल खुले जंगल में बढ़ी आवाजाही

2024-25 में कूनो की टीम ने चीतों को खुले जंगल में छोड़ना शुरू किया। कुछ चीते कूनो की सीमा से बाहर निकलकर राजस्थान के जंगलों तक पहुंचे।

इसके बाद आसपास के करीब 12 जिलों में चीतों की 24 घंटे निगरानी शुरू की गई। स्थानीय लोगों को चीतों के व्यवहार और उनके संरक्षण के बारे में जानकारी देने के लिए ‘चीता मित्रों’ को भी अभियान से जोड़ा गया।

इसी चरण में कूनो से बाहर चीतों को बसाने की दिशा में कदम बढ़ाते हुए मंदसौर के गांधी सागर में 3 चीतों को स्थानांतरित किया गया।

चौथे साल नए इलाकों में बसाने की तैयारी

2026 में प्रोजेक्ट विस्तार के चरण में पहुंच गया है। कूनो प्रबंधन के अनुसार, चीते खुले जंगल में प्राकृतिक व्यवहार कर रहे हैं और नए इलाकों की ओर बढ़ रहे हैं।

गांधी सागर के बाद अब नौरादेही नेशनल पार्क में भी चीतों को बसाने की तैयारी की जा रही है।

पीसीसीएफ वाइल्ड लाइफ शमिता राजौरा के अनुसार, कूनो में मौजूद चीतों में 19 की उम्र एक साल से कम है। 17 चीते फिलहाल बाड़ों से बाहर हैं, जिनमें 10 नर और 7 मादा शामिल हैं। बाड़ों में मौजूद चीतों को भी चरणबद्ध तरीके से खुले जंगल में छोड़ने की तैयारी है।

सैटेलाइट कॉलर और ग्राउंड टीम से 24×7 निगरानी

चीतों की निगरानी के लिए उनके गले में विशेष सैटेलाइट कॉलर लगाए जाते हैं। GPS तकनीक के जरिए इन कॉलर से उनकी लोकेशन और मूवमेंट की जानकारी मिलती है।

इसके साथ वन विभाग की ग्राउंड टीमें भी लगातार निगरानी करती हैं। जब कोई चीता कूनो की सीमा से बाहर जाता है, तो कॉलर से प्राप्त सिग्नल के आधार पर उसकी लोकेशन का पता लगाया जाता है और टीम मौके पर पहुंचकर उसके व्यवहार तथा गतिविधियों पर नजर रखती है।

1952 में भारत में विलुप्त घोषित हुआ था चीता

भारत में चीतों की आबादी खत्म होने की कहानी भी इस प्रोजेक्ट की पृष्ठभूमि का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

1948 में छत्तीसगढ़ के कोरिया क्षेत्र में महाराजा रामानुज प्रताप सिंहदेव द्वारा तीन चीतों के शिकार की तस्वीर को भारत में आखिरी दर्ज घटनाओं में शामिल किया जाता है। इसके बाद देश में चीतों के दिखाई देने का कोई आधिकारिक रिकॉर्ड सामने नहीं आया।

1952 में भारत सरकार ने चीते को देश में विलुप्त घोषित कर दिया था।

1972 में फिर बसाने की कवायद शुरू हुई

भारत में चीते को दोबारा बसाने की शुरुआती पहल का श्रेय मध्यप्रदेश कैडर के 1961 बैच के आईएफएस अधिकारी एमके रंजीत सिंह को दिया जाता है। उन्होंने 1972 में भारत में चीते को फिर से बसाने का विचार रखा और प्रारंभिक ड्राफ्ट तैयार किया।

बाद में ईरान से चीते लाने की योजना पर भी विचार हुआ, लेकिन यह आगे नहीं बढ़ सकी। 1981 में रंजीत सिंह ने कूनो क्षेत्र को वन्यजीव संरक्षण के लिए विकसित करने की दिशा में पहल की।

2008-09 में भारत में चीते लाने के लिए नए सिरे से योजना तैयार की गई। इसके बाद नामीबिया से चीते लाने पर केंद्र और राज्य सरकारों के बीच सहमति बनी।

सुप्रीम कोर्ट की अनुमति के बाद शुरू हुआ प्रोजेक्ट

चीता पुनर्वास योजना से जुड़ा मामला 2010 में सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। 2013 में अदालत ने कूनो में चीतों की जगह एशियाई शेरों को बसाने का आदेश दिया था।

इसके बाद केंद्र सरकार ने पुनर्विचार याचिका दायर की। जनवरी 2020 में सुप्रीम कोर्ट ने कूनो में प्रायोगिक आधार पर चीतों को बसाने की अनुमति दे दी।

इसके बाद नामीबिया से चीतों को भारत लाने की प्रक्रिया शुरू हुई और 17 सितंबर 2022 को कूनो में पहले 8 चीते छोड़े गए।

चार साल में चीता प्रोजेक्ट की तस्वीर

  • 2022: नामीबिया से 8 चीते कूनो लाए गए।
  • पहला साल: 3 वयस्क और 6 शावकों समेत 9 चीतों की मौत।
  • दूसरा साल: 13 शावक एक साल की उम्र तक पहुंचे।
  • तीसरा साल: खुले जंगल में चीतों की आवाजाही बढ़ी और राजस्थान तक पहुंचे।
  • 2024-25: गांधी सागर में चीतों को बसाने की शुरुआत।
  • 2026: भारत में कुल 52 चीते, इनमें 32 का जन्म भारत में हुआ।
  • आगे: नौरादेही में भी चीता पुनर्वास की तैयारी।

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