मुंबई छोड़ने वाले थे, तभी मिला ‘हनुमान अंश’ का ऑफर: कंपोजर धीरेंद्र बोले- बाबा जी का स्मरण किया, 5 मिनट में बन गई फिल्म की थीम

मुंबई। बाबा नीम करोली के जीवन पर आधारित फिल्म ‘हनुमान अंश’ इन दिनों चर्चा में है। फिल्म के बैकग्राउंड स्कोर और ‘सियावर रामचंद्र की जय’ गाने को कंपोजर धीरेंद्र मुलकलवार ने तैयार किया है। खास बात यह है कि यह गाना शुरुआत में फिल्म का हिस्सा नहीं था। इसकी शुरुआत एक सीन के बैकग्राउंड म्यूजिक से हुई और बाद में यही फिल्म की पहचान बन गया।
धीरेंद्र के मुताबिक, फिल्म से जुड़ने से कुछ महीने पहले ही वह कैंची धाम जाने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन हर बार कोई न कोई वजह सामने आ जाती थी। आखिरकार अप्रैल में उन्हें कैंची धाम जाने का मौका मिला। इसके करीब दो महीने बाद उन्हें फिल्म का ऑफर मिल गया।
कैंची धाम के बाद मिला फिल्म का ऑफर
धीरेंद्र ने बताया कि वह करीब चार-पांच साल से कैंची धाम जाने की कोशिश कर रहे थे। पिछले साल अप्रैल में वह आखिरकार वहां पहुंचे और बाबा नीम करोली के दर्शन किए।
इसके करीब दो महीने बाद फिल्म के निर्माता विशाल चतुर्वेदी ने उन्हें फोन किया। उस समय विशाल फिल्म बना रहे थे और 43 दिनों का हनुमान चालीसा पाठ भी कर रहे थे। उन्होंने धीरेंद्र को फिल्म का बैकग्राउंड स्कोर तैयार करने का प्रस्ताव दिया।
धीरेंद्र ने बिना ज्यादा सोचे काम के लिए हामी भर दी। उनके लिए यह सिर्फ एक फिल्म का प्रोजेक्ट नहीं, बल्कि बाबा नीम करोली की कृपा से मिला अवसर था।
दो महीने तक धुन बनाते रहे, फिर 5 मिनट में तैयार हुई थीम
फिल्म की कहानी सुनने के बाद धीरेंद्र को उसकी मुख्य थीम तैयार करनी थी। उन्होंने करीब दो महीने तक कई धुनें बनाईं, लेकिन खुद ही उन्हें रिजेक्ट करते रहे।
इसके बाद उन्हें विशाल चतुर्वेदी की बताई एक बात याद आई कि एक कंपोजर ने बाबा जी की तस्वीर के सामने बैठकर कुछ ही मिनटों में धुन तैयार कर ली थी।
धीरेंद्र ने बताया कि उन्होंने बाबा जी का स्मरण किया। इसी दौरान अचानक उनके दिमाग में एक धुन आई। उन्होंने सिस्टम ऑन किया और करीब 5 से 7 मिनट में पूरी धुन तैयार कर दी।
यही धुन बाद में फिल्म की मुख्य थीम बन गई।
बैकग्राउंड म्यूजिक से बना ‘सियावर रामचंद्र की जय’
फिल्म में एक सीन है, जिसमें एक क्रांतिकारी बाबा नीम करोली के पास लौटता है। इस सीन में देशभक्ति और आध्यात्मिकता दोनों भावों को दिखाना था।
धीरेंद्र ने पहले एक म्यूजिक तैयार किया, लेकिन उन्हें लगा कि उसमें कुछ कमी है। इसके बाद उन्होंने विजुअल्स पर ध्यान देने के बजाय सिर्फ सीन के भाव को महसूस किया।
अचानक उनके मन में ‘सीताराम, सीताराम’ की रिदम आई। इसके बाद उन्होंने मंदिरों में होने वाले जयघोष को धुन में शामिल किया—
‘सियावर रामचंद्र की जय, पवनसुत हनुमान की जय, उमापति महादेव की जय।’
शुरुआत में यह सिर्फ बैकग्राउंड म्यूजिक था। बाद में इसे ट्रेलर में इस्तेमाल किया गया और फिर पूरी तरह एक गाने में बदलने का फैसला लिया गया।
कम बजट में घर को ही बना दिया स्टूडियो
धीरेंद्र के मुताबिक, फिल्म का म्यूजिक तैयार करते समय बजट काफी सीमित था। स्टूडियो का खर्च बचाने के लिए उन्होंने अपने घर को ही रिकॉर्डिंग स्टूडियो में बदल दिया।
उनके दोस्त शांतनु सुदामे पुणे से आए और करीब एक महीने तक उनके घर पर रहकर गाने की रिकॉर्डिंग की। शांतनु ने गाना लिखा और गाया भी।
रिकॉर्डिंग में सितार, दिलरुबा और दूसरे इंस्ट्रूमेंट्स का इस्तेमाल किया गया। इंटरवल के एक बड़े सीन के लिए भारी परकशन की जरूरत थी। इसके लिए परकशनिस्ट जैनत पटनायक को बुलाया गया। उन्होंने फिल्म और बाबा नीम करोली के बारे में जानने के बाद काम करने के लिए हामी भर दी।
बोले- मेरे लिए यह बाबा जी की फिल्म थी
फिल्म की कमाई बढ़ने के बाद फीस बढ़ने को लेकर पूछे गए सवाल पर धीरेंद्र ने कहा कि निर्माता विशाल चतुर्वेदी से उनकी दोस्ती है और पैसों को लेकर दोनों के बीच ज्यादा बातचीत नहीं हुई।
उन्होंने कहा कि उन्होंने सिर्फ अपनी न्यूनतम तकनीकी लागत निकालने की बात कही थी। उनके लिए सबसे महत्वपूर्ण इस फिल्म का हिस्सा बनना था।
धीरेंद्र के मुताबिक, उनके लिए फिल्म में काम करना ही बाबा जी का सबसे बड़ा प्रसाद था।
20 साल के संघर्ष के बाद मिला बड़ा मौका
धीरेंद्र ने बताया कि बचपन से ही उनका सपना फिल्मों में संगीत देने का था। बड़े भाई की वजह से संगीत में रुचि बढ़ी और मां ने उन्हें तबला सीखने के लिए प्रेरित किया।
उन्होंने गुरु राजीव पिल्ले से तबले की शिक्षा ली। मुंबई आने के बाद ऑडियो इंजीनियरिंग की पढ़ाई की और रेडियो में ऑडियो इंजीनियर के तौर पर काम किया।
फिल्मों में तुरंत काम नहीं मिला तो उन्होंने विज्ञापनों और जिंगल्स में काम शुरू किया। उनके मुताबिक, वह अब तक 500 से ज्यादा जिंगल्स और विज्ञापनों पर काम कर चुके हैं।
इसके बाद उन्हें ‘टॉयलेट: एक प्रेम कथा’ के ‘सुबह की ट्रेन’ गाने को प्रोड्यूस करने का मौका मिला। उन्होंने ‘उरी: द सर्जिकल स्ट्राइक’, ‘अटैक’ और ‘आर्टिकल 15’ जैसी फिल्मों में भी म्यूजिक प्रोडक्शन का काम किया।
मुंबई छोड़ने का बना लिया था मन
धीरेंद्र के मुताबिक, ‘हनुमान अंश’ से पहले करीब डेढ़ साल उनके लिए काफी मुश्किल रहा। फिल्मों में म्यूजिक करने का सपना पूरा नहीं हो रहा था और आर्थिक परेशानियां भी बढ़ रही थीं।
विज्ञापन और डॉक्यूमेंट्री का काम भी प्रभावित हुआ। एक समय उन्हें लगा कि मुंबई छोड़कर अपने होमटाउन वापस लौट जाना चाहिए।
इसी बीच कैंची धाम जाने का मौका मिला। इसके करीब दो महीने बाद ‘हनुमान अंश’ का ऑफर आया।
धीरेंद्र ने कहा कि उन्हें लगा कि शायद 20 साल की मेहनत के बाद बाबा नीम करोली ने उनके लिए सही समय तय किया था।
कैंची धाम में मिला अलग अनुभव
धीरेंद्र ने अपने कैंची धाम के अनुभव को भी साझा किया। उन्होंने बताया कि वह आरती के समय पहुंचे और कुछ ही मिनट में दर्शन हो गए।
उनके अनुसार, उन्हें वहां बैठकर ध्यान करने का भी अवसर मिला। उनके लिए यह अनुभव बेहद खास था और कैंची धाम से लौटने के बाद भी वह उसी भाव में रहे।
दो महीने बाद फिल्म का ऑफर मिलने पर उन्होंने इसे बाबा नीम करोली से जुड़ा संयोग माना।




