झारखंड CGL परीक्षा रद्द करने के मामले में हाईकोर्ट ने फैसला रखा सुरक्षित, पेपर लीक और अनियमितताओं पर हुई सुनवाई
JSSC-CGL परीक्षा रद्द करने के खिलाफ झारखंड हाईकोर्ट में सुनवाई पूरी। सरकार ने पेपर लीक और अनियमितताओं का हवाला दिया, जबकि याचिकाकर्ताओं ने सरकार के अधिकार पर सवाल उठाए।

रांची। झारखंड हाईकोर्ट में जेएसएससी-सीजीएल परीक्षा समेत अन्य नियुक्तियों को रद्द करने के राज्य सरकार के फैसले के खिलाफ दाखिल याचिकाओं पर गुरुवार को सुनवाई हुई। जस्टिस दीपक रोशन की अदालत ने याचिकाकर्ताओं, हस्तक्षेपकर्ताओं और राज्य सरकार की दलीलें सुनने के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया।
मामले में मुख्य रूप से परीक्षा में कथित पेपर लीक, अनियमितताओं और परीक्षा रद्द करने के अधिकार को लेकर बहस हुई। अब सभी पक्षों की नजर हाईकोर्ट के फैसले पर है।
सरकार ने कहा- परीक्षा की निष्पक्षता पर गंभीर सवाल
राज्य सरकार की ओर से वरीय अधिवक्ता मीनाक्षी अरोड़ा ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से पक्ष रखा। उन्होंने दलील दी कि जेएसएससी-सीजीएल परीक्षा में बड़े पैमाने पर अनियमितताएं हुईं। सरकार के अनुसार, सिस्टम की विफलता के कारण प्रश्नपत्र लीक हुआ और उसके उत्तर अभ्यर्थियों तक पहुंचाए गए।
सरकार ने कहा कि जब किसी प्रतियोगी परीक्षा की निष्पक्षता और पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े हो जाएं, तो पूरी परीक्षा रद्द करना जरूरी हो सकता है। इसी आधार पर राज्य कैबिनेट ने कथित पेपर लीक और अनियमितताओं को देखते हुए परीक्षा रद्द करने का निर्णय लिया था।
याचिकाकर्ताओं ने परीक्षा रद्द करने के अधिकार पर उठाए सवाल
याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता अमृतांश वत्स ने सरकार की अधिसूचना को असंवैधानिक बताया। उन्होंने दलील दी कि राज्य सरकार के पास जेएसएससी-सीजीएल परीक्षा और उसके विज्ञापन को रद्द करने का अधिकार नहीं है। उनके अनुसार, यह अधिकार झारखंड कर्मचारी चयन आयोग (JSSC) के पास है।
इस तरह सुनवाई के दौरान परीक्षा रद्द करने के फैसले के साथ-साथ संबंधित प्राधिकरण के अधिकार क्षेत्र का मुद्दा भी प्रमुखता से उठा।
हस्तक्षेपकर्ता ने बताया परीक्षा व्यवस्था की विफलता का मामला
हस्तक्षेपकर्ता की ओर से अधिवक्ता कुमार हर्ष ने परीक्षा में व्यापक गड़बड़ी का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि मामला केवल कुछ अभ्यर्थियों तक सीमित नहीं है, बल्कि परीक्षा प्रणाली में गंभीर चूक से जुड़ा है।
उनकी दलील के अनुसार, परीक्षा कराने की जिम्मेदारी जिस एजेंसी को दी गई थी, वह पहले से ब्लैकलिस्टेड थी। उन्होंने दावा किया कि जांच में प्रिंटिंग प्रेस से प्रश्नपत्र लीक होने और बाद में सोशल मीडिया के माध्यम से उसके प्रसारित होने की बात सामने आई।
हस्तक्षेपकर्ता ने अभय तिवारी की गिरफ्तारी के बाद जांच में नए तथ्य सामने आने का भी उल्लेख किया। उनका कहना था कि कथित गड़बड़ियों के कारण योग्य अभ्यर्थी भी चयन से वंचित रह गए। इसलिए केवल दोषी अभ्यर्थियों पर कार्रवाई करके परीक्षा की विश्वसनीयता से जुड़े सवालों को समाप्त नहीं किया जा सकता।
ये संबंधित पक्षों की अदालत में रखी गई दलीलें हैं। मामले में अंतिम निष्कर्ष हाईकोर्ट के फैसले से ही स्पष्ट होगा।
JPSC की अन्य परीक्षाओं पर भी सुनवाई
रिपोर्ट के अनुसार, हाईकोर्ट में शुक्रवार सुबह 11 बजे जेपीएससी-सीडीपीओ, 11वीं से 13वीं सिविल सेवा परीक्षा और फूड सेफ्टी ऑफिसर सहित अन्य परीक्षाओं को रद्द करने के फैसले के खिलाफ दाखिल याचिकाओं पर भी सुनवाई निर्धारित है।
इन मामलों में भी राज्य सरकार के फैसले को चुनौती दी गई है। अदालत की सुनवाई पर उन अभ्यर्थियों की नजर रहेगी जिनका भविष्य इन भर्ती परीक्षाओं से जुड़ा है।




