पाकिस्तान में एक साथ चार मोर्चों पर संकट, आसिम मुनीर के सामने सबसे बड़ी चुनौती
आसिम मुनीर के सामने सबसे बड़ी चुनौती

पाकिस्तान की विदेश नीति भले ही इस समय मजबूत दिखाई दे रही हो और सऊदी अरब व तुर्किये के साथ बढ़ते रक्षा संबंधों, अमेरिका-ईरान तनाव के बीच मध्यस्थता की कोशिशों तथा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी रणनीतिक भूमिका बढ़ाने के प्रयासों से इस्लामाबाद को कूटनीतिक बढ़त मिलती नजर आ रही हो, लेकिन देश के भीतर हालात उतने स्थिर नहीं हैं। पाकिस्तान एक साथ कई सुरक्षा और राजनीतिक चुनौतियों का सामना कर रहा है। बलूचिस्तान में लंबे समय से चल रहा विद्रोह अब भी पाकिस्तान की सुरक्षा व्यवस्था के लिए गंभीर चुनौती बना हुआ है, जबकि खैबर पख्तूनख्वा यानी KP में आतंकी गतिविधियों और स्थानीय असंतोष ने सरकार की मुश्किलें बढ़ा रखी हैं। दूसरी ओर पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर यानी PoK में भी राजनीतिक असंतोष, आर्थिक समस्याओं और केंद्र के खिलाफ नाराजगी के कारण स्थिति संवेदनशील बनी हुई है। इन तीनों क्षेत्रों के अलावा पाकिस्तान की आंतरिक राजनीति में सेना की भूमिका, विपक्ष के साथ टकराव, आर्थिक दबाव और सत्ता के केंद्रीकरण को लेकर भी लगातार सवाल उठते रहे हैं। ऐसे माहौल में सेना प्रमुख फील्ड मार्शल आसिम मुनीर के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह सुरक्षा, राजनीति और अर्थव्यवस्था के बीच संतुलन कैसे बनाए रखें। पाकिस्तान में सेना ऐतिहासिक रूप से राजनीति में प्रभावशाली भूमिका निभाती रही है, इसलिए जब देश में राजनीतिक अस्थिरता और सुरक्षा संकट एक साथ बढ़ते हैं तो तख्तापलट या सैन्य हस्तक्षेप की चर्चा भी तेज हो जाती है। हालांकि केवल चार क्षेत्रों में असंतोष या विद्रोह की मौजूदगी को सीधे तख्तापलट की संभावना का प्रमाण नहीं माना जा सकता। इसके लिए सेना के भीतर नेतृत्व की एकजुटता, राजनीतिक संस्थाओं की स्थिति, आर्थिक संकट की गंभीरता, जनता का रुख और अंतरराष्ट्रीय दबाव जैसे कई कारक निर्णायक होंगे। बलूचिस्तान की चुनौती मुख्य रूप से संसाधनों, राजनीतिक प्रतिनिधित्व और अलगाववादी हिंसा से जुड़ी है, जबकि KP में सुरक्षा संकट का बड़ा हिस्सा आतंकवाद और सीमा पार गतिविधियों से जुड़ा हुआ है। PoK में आर्थिक और राजनीतिक असंतोष की प्रकृति अलग है। इसलिए इन सभी मोर्चों को एक ही तरह की बगावत मानना सही नहीं होगा। फिर भी यदि पाकिस्तान इन क्षेत्रों में बढ़ती नाराजगी को प्रभावी ढंग से नियंत्रित नहीं कर पाता और साथ ही आर्थिक तथा राजनीतिक संकट भी गहराता है, तो सेना पर देश की सत्ता और प्रशासन में अपनी भूमिका और बढ़ाने का दबाव बन सकता है। यही वजह है कि सवाल उठ रहा है कि क्या आसिम मुनीर पाकिस्तान को स्थिर रखने के लिए मौजूदा राजनीतिक व्यवस्था के साथ आगे बढ़ेंगे या सेना की भूमिका को और मजबूत करेंगे। फिलहाल तख्तापलट की संभावना को निश्चित रूप से कहना जल्दबाजी होगी, लेकिन पाकिस्तान के भीतर सुरक्षा संकट, क्षेत्रीय असंतोष और राजनीतिक तनाव का एक साथ मौजूद होना निश्चित रूप से इस्लामाबाद के लिए गंभीर चेतावनी है।



