शाह बोले- कांग्रेस का पूरा वंदे मातरम न गाना देशविरोधी
1937 के फैसले को लेकर शाह का कांग्रेस पर हमला; बोले- तुष्टीकरण की राजनीति ने देश के विभाजन की जमीन तैयार की, कांग्रेस ने भाजपा के आरोपों को बताया राजनीतिक मुद्दा

गृहमंत्री अमित शाह ने कांग्रेस के सभी कार्यक्रमों में वंदे मातरम के केवल शुरुआती दो छंद गाने के फैसले पर तीखा हमला बोला है। तमिलनाडु के चेंगलपट्टू में मीडिया से बातचीत में शाह ने कहा कि कांग्रेस का पूरा वंदे मातरम न गाने का फैसला हैरान करने वाला और देशविरोधी है।
शाह ने आरोप लगाया कि 1937 में कांग्रेस ने मुस्लिम तुष्टीकरण के कारण वंदे मातरम को दो हिस्सों में बांटने का फैसला किया था। उनके मुताबिक इस फैसले से दो-राष्ट्र सिद्धांत को मजबूती मिली और आगे चलकर देश के विभाजन की परिस्थितियां बनीं।
कांग्रेस ने तय किए सिर्फ पहले दो छंद
कांग्रेस वर्किंग कमेटी ने बुधवार को फैसला किया कि पार्टी के सभी कार्यक्रमों में वंदे मातरम के छह छंदों में से केवल शुरुआती दो छंद गाए जाएंगे। यह निर्णय 15 अगस्त को कांग्रेस मुख्यालय में स्वतंत्रता दिवस समारोह के दौरान वंदे मातरम को लेकर हुए विवाद के बाद लिया गया।
शाह ने इसे वोट बैंक और तुष्टीकरण की राजनीति बताया। उन्होंने कहा कि देश में अब तुष्टीकरण की राजनीति नहीं चलेगी और भाजपा इस फैसले का संसद, विधानसभा तथा जनता के बीच विरोध करेगी।
भाजपा ने कांग्रेस पर साधा निशाना
भाजपा अध्यक्ष नितिन नवीन ने भी कांग्रेस के फैसले पर हमला करते हुए आरोप लगाया कि पार्टी वोट बैंक की राजनीति के लिए राष्ट्रगीत का अपमान कर रही है। उन्होंने कांग्रेस की तुलना नई मुस्लिम लीग से की और कहा कि यह फैसला उन स्वतंत्रता सेनानियों का अपमान है जिन्होंने वंदे मातरम को अपने संघर्ष और बलिदान से जोड़ा था।
कांग्रेस ने भाजपा के आरोपों को खारिज किया
कांग्रेस सांसद केसी वेणुगोपाल ने कहा कि वंदे मातरम स्वतंत्रता संग्राम का हिस्सा रहा है और पार्टी के लिए यह भावनात्मक विषय है। उन्होंने भाजपा पर इसे राजनीतिक मुद्दा बनाने का आरोप लगाया।
15 अगस्त के कार्यक्रम को लेकर कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने भी कहा था कि कांग्रेस मुख्यालय में पूरा वंदे मातरम गाया गया था और इसे रोकने की कोई कोशिश नहीं हुई। उनके मुताबिक, सोनिया गांधी का इशारा गीत रोकने के लिए नहीं बल्कि लंबे समय से खड़े कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के लिए कुर्सी मांगने को लेकर था।
1937 में पहले दो छंदों पर सहमति क्यों बनी?
उपलब्ध ऐतिहासिक दस्तावेजों के मुताबिक, अक्टूबर-नवंबर 1937 में कांग्रेस वर्किंग कमेटी की बैठक में राष्ट्रीय कार्यक्रमों के लिए वंदे मातरम के शुरुआती दो छंदों को चुनने का निर्णय हुआ था। वजह यह बताई गई थी कि गीत के बाद के हिस्सों में धार्मिक प्रतीकों और देवी-देवताओं से जुड़े संदर्भ हैं, जिन पर कुछ मुस्लिम नेताओं ने आपत्ति जताई थी।
जवाहरलाल नेहरू ने उस समय तर्क दिया था कि शुरुआती दो छंदों में ऐसी धार्मिक सामग्री नहीं है जो किसी समुदाय की भावनाओं के विरुद्ध मानी जाए। इसी कारण इन्हें व्यापक रूप से स्वीकार्य संस्करण के रूप में चुना गया।
वंदे मातरम का इतिहास
वंदे मातरम की रचना बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने 19वीं सदी में की थी। बाद में यह उनके उपन्यास ‘आनंदमठ’ का हिस्सा बना। 1896 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अधिवेशन में रवींद्रनाथ टैगोर ने इसे सार्वजनिक रूप से गाया था।
स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान वंदे मातरम राष्ट्रीय चेतना और ब्रिटिश शासन के खिलाफ संघर्ष का प्रमुख नारा बन गया। आज यह भारत का राष्ट्रीय गीत है।
कानून और आधिकारिक संस्करण का विवाद
2026 में केंद्र सरकार की ओर से जारी निर्देशों में वंदे मातरम के पूरे छह छंदों को आधिकारिक संस्करण बताया गया है। हालांकि, उपलब्ध विवरण के अनुसार केवल छह छंद पूरे नहीं गाने को अपने आप में अपराध घोषित नहीं किया गया है।
कानूनी प्रावधान मुख्य रूप से जानबूझकर राष्ट्रीय गीत के गायन को रोकने या गायन कर रही सभा में बाधा डालने से संबंधित हैं। इसलिए पूरे छह छंद न गाने और जानबूझकर गायन रोकने के बीच कानूनी अंतर महत्वपूर्ण है।
वंदे मातरम पर विवाद अब इतिहास, राष्ट्रवाद, धार्मिक संवेदनशीलता और राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप के बीच एक बड़ा मुद्दा बन गया है। कांग्रेस इसे स्वतंत्रता संग्राम की विरासत से जोड़ रही है, जबकि भाजपा इसे राष्ट्रगीत के सम्मान और तुष्टीकरण की राजनीति से जोड़कर देख रही है।




