राक्षस के वध के लिए प्रकट हुए थे शिव! 9 किमी पहाड़ी रास्ता पार कर पहुंचते हैं हल्देश्वर महादेव; बलराम ने भी की थी तपस्या
बालोतरा के सिवाना की छप्पन पहाड़ियों में स्थित है प्राचीन धाम; सावन में उमड़ती है श्रद्धालुओं की भीड़, जंगल में तेंदुए समेत वन्यजीवों का खतरा

बालोतरा। राजस्थान के बालोतरा जिले के सिवाना क्षेत्र में छप्पन की पहाड़ियों के बीच स्थित हल्देश्वर महादेव मंदिर आस्था और प्राकृतिक खूबसूरती का अनोखा संगम है। मान्यता है कि भगवान शिव यहां हल्दिया नामक राक्षस के संहार के लिए स्वयं प्रकट हुए थे।
सावन के महीने में यहां श्रद्धालुओं की भारी भीड़ पहुंचती है। मंदिर तक पहुंचने के लिए श्रद्धालुओं को करीब 9 किलोमीटर का दुर्गम पैदल रास्ता तय करना पड़ता है। पथरीली चढ़ाई, पहाड़ियों, नालों और झरनों से होकर गुजरने वाली यह यात्रा करीब तीन घंटे में पूरी होती है।
छप्पन पहाड़ियों के बीच है मंदिर
सिवाना के पास पीपलून गांव की तलहटी से मंदिर की पैदल यात्रा शुरू होती है। रास्ता कई जगह कच्चा और फिसलन भरा है। श्रद्धालुओं को ऊंची-नीची पहाड़ियों और पथरीले रास्तों से गुजरना पड़ता है।
यहां एक साथ सात दुर्गम पहाड़ दिखाई देते हैं। मानसून के दौरान इन पहाड़ियों पर बादल छाए रहने और चारों ओर हरियाली के कारण स्थानीय लोग इस क्षेत्र को ‘मिनी माउंट आबू’ भी कहते हैं।
बलराम ने की थी शिव की तपस्या
स्थानीय मान्यता के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण के बड़े भाई बलराम ने इसी स्थान पर भगवान शिव की कठोर तपस्या की थी। बलराम का एक नाम ‘हलधर’ भी था। इसी वजह से इस स्थान का नाम हल्देश्वर महादेव पड़ने की मान्यता है।
एक अन्य धार्मिक मान्यता के अनुसार, प्राचीन समय में हल्दिया नामक राक्षस के आतंक से परेशान ग्रामीणों ने भगवान शिव की आराधना की थी। उनकी प्रार्थना से प्रसन्न होकर भगवान शिव स्वयंभू स्वरूप में यहां प्रकट हुए।
स्वयंभू शिवलिंग के होते हैं दर्शन
कठिन पहाड़ी रास्ता पार करने के बाद श्रद्धालु मंदिर पहुंचते हैं। गर्भगृह में स्वयंभू शिवलिंग विराजमान है। मंदिर के पास एक पवित्र जलकुंड भी है, जिसके जल को श्रद्धालु पवित्र मानते हैं।
सावन के सोमवार, महाशिवरात्रि और अन्य धार्मिक पर्वों पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहां पहुंचकर जलाभिषेक और पूजा-अर्चना करते हैं।
मंदिर के आसपास कई धार्मिक स्थल
हल्देश्वर महादेव मंदिर के आसपास गुरु गोरखनाथ की गुफा और धूणी भी है। इसके अलावा कोटेश्वर महादेव, सुखलेश्वर महादेव और पांडेश्वर महादेव के मंदिर भी बताए जाते हैं।
स्थानीय मान्यता है कि पांडवों ने महाभारत काल में यहां अज्ञातवास बिताया था।
68 संतों की समाधियां
हल्देश्वर महादेव धाम संत परंपरा से भी जुड़ा माना जाता है। मंदिर परिसर में 68 संत-महात्माओं की समाधियां होने की बात कही जाती है। इनमें चार जीवित समाधियां विशेष श्रद्धा का केंद्र हैं।
मंदिर के महंत संत भीमगिरीजी महाराज के अनुसार, यहां पूरे साल श्रद्धालु पहुंचते हैं। उनके मुताबिक पहाड़ों के बीच स्थित यह धाम प्राकृतिक वातावरण और आध्यात्मिक शांति के लिए भी जाना जाता है।
जंगल में तेंदुए और अन्य वन्यजीव
हल्देश्वर धाम का इलाका घने वन क्षेत्र में आता है। छप्पन की पहाड़ियों में तेंदुआ, लकड़बग्घा, सियार, जंगली सूअर, नीलगाय और खरगोश सहित कई वन्यजीव पाए जाते हैं।
बरसात के दौरान श्रद्धालुओं को कभी-कभी वन्यजीव दिखाई देने की बात भी सामने आती है। इसी कारण मंदिर मार्ग पर रात में यात्रा नहीं करने और वन्यजीवों से सावधान रहने की चेतावनी दी गई है। मंदिर परिसर में रात में रुकने की अनुमति भी नहीं है।




