ग्वालियर के दफ्तरों में रिश्वतखोरी का खेल: 19 महीनों में 37 अधिकारी-कर्मचारी ट्रैप
राजस्व विभाग और नगर निगम में सबसे ज्यादा मामले; किसी ने रिश्वत के लिए निजी ऑफिस बनाया तो कोई रिटायरमेंट से एक दिन पहले 6 हजार की घूस लेते पकड़ा गया

ग्वालियर में सरकारी दफ्तरों में रिश्वतखोरी के मामलों ने चिंता बढ़ा दी है। लोकायुक्त पुलिस की कार्रवाई में सामने आए मामलों के अनुसार 1 जनवरी 2025 से अगस्त 2026 तक 19 महीनों में 9 सरकारी विभागों के 37 अधिकारी-कर्मचारी रिश्वत लेते रंगे हाथ पकड़े जा चुके हैं। इनमें सबसे ज्यादा मामले राजस्व विभाग और नगर निगम से जुड़े बताए गए हैं। लोकायुक्त की कार्रवाई में ऐसे मामले भी सामने आए, जिनमें सरकारी काम कराने के नाम पर खुलेआम रकम मांगे जाने के आरोप लगे। सिरसौद गांव में पदस्थ हल्का पटवारी रेखा शाक्य पर आरोप है कि उसने रिश्वत लेने के लिए सरकारी कार्यालय से अलग निजी ठिकाना बना रखा था, जहां जमीन से जुड़े काम कराने के नाम पर लोगों से पैसे मांगे जाते थे। मंशाराम की शिकायत पर लोकायुक्त ने कार्रवाई करते हुए पटवारी को 15 हजार रुपए की रिश्वत लेते रंगे हाथ पकड़ा। शिकायतकर्ता ने अपनी बहन की जमीन के सीमांकन और पत्नी सावित्रीबाई के नाम नामांतरण के लिए आवेदन किया था। आरोप है कि काम कराने के बदले पटवारी ने 15 हजार रुपए की मांग की थी और इससे पहले 3500 रुपए भी लिए जा चुके थे। जांच में रिश्वत की रकम लेने में पटवारी के पति कृष्णकांत की भूमिका सामने आने का भी उल्लेख है। इसी तरह ग्वालियर नगर निगम के कार्यपालन यंत्री सुशील कटारे से जुड़ा मामला भी चर्चा में रहा। कटारे को 31 जुलाई को सेवानिवृत्त होना था, लेकिन उससे एक दिन पहले 30 जुलाई को वह ठेकेदार से 6 हजार रुपए की रिश्वत लेते लोकायुक्त के जाल में फंस गए। मामला करीब 36 लाख रुपए के भुगतान से जुड़ा था और आरोप है कि फाइल आगे बढ़ाने के बदले एक प्रतिशत कमीशन के हिसाब से 36 हजार रुपए की मांग की गई थी। ठेकेदार पहले ही 30 हजार रुपए दे चुका था। बातचीत रिकॉर्ड होने के बाद शिकायत लोकायुक्त तक पहुंची और सत्यापन के बाद केमिकल लगे 6 हजार रुपए देकर ट्रैप की कार्रवाई की गई। जैसे ही रकम ली गई, लोकायुक्त टीम ने अधिकारी को पकड़ लिया। लोकायुक्त में पहुंची शिकायतों से यह भी सामने आया कि नामांतरण, सीमांकन और नाम संशोधन जैसे सामान्य सरकारी कामों के लिए भी रिश्वत मांगने के आरोप लगे। शिकायतकर्ताओं का आरोप था कि पैसे नहीं देने पर फाइल आगे नहीं बढ़ाई जाती थी। परेशान लोगों ने लोकायुक्त से शिकायत की, जिसके बाद शिकायतों के सत्यापन और कार्रवाई के जरिए कई मामलों में अधिकारियों-कर्मचारियों को रंगे हाथ पकड़ा गया। इन घटनाओं ने सरकारी कार्यालयों में आम नागरिकों के कामकाज और भ्रष्टाचार की स्थिति को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए हैं।



