अलग सपने ही छोटी बस्तियों को बड़ी पहचान देते हैं
नासिक से करीब 100 किमी दूर आदिवासी गांव उदमल की कहानी बताती है कि बदलाव के लिए बड़े शहर या बड़ी संस्था नहीं, बड़ा विजन जरूरी है।

महाराष्ट्र का आदिवासी गांव उदमल अब अपनी प्राकृतिक खूबसूरती और साफ रात के आसमान की वजह से नई पहचान बनाने की दिशा में बढ़ रहा है। गांव के युवा विपुल खिराड़ी ने उस अंधेरे को समस्या नहीं, बल्कि अवसर के रूप में देखा, जिसे शहरों में बढ़ता प्रकाश प्रदूषण लगातार खत्म कर रहा है। उनका लक्ष्य उदमल को महाराष्ट्र की पहली आधिकारिक डार्क-स्काई कम्युनिटी के रूप में विकसित करना और उसे एस्ट्रो-टूरिज्म के नक्शे पर पहचान दिलाना है। इसके लिए जिला प्रशासन ने डिस्ट्रिक्ट एनुअल ट्राइबल सब-प्लान के तहत 42.1 लाख रुपए की परियोजना मंजूर की है। योजना में प्रकाश प्रदूषण कम करने, वैज्ञानिक तरीके से आउटडोर लाइटिंग अपनाने, टेलीस्कोप और स्काई-क्वालिटी मीटर जैसी सुविधाएं विकसित करने के साथ स्थानीय आदिवासियों के लिए टिकाऊ रोजगार के अवसर पैदा करना शामिल है। विपुल की सोच की खासियत यह है कि उन्होंने अपने गांव की कमी खोजने के बजाय उसकी ताकत पहचानी। 14 साल की उम्र में एकलव्य आवासीय स्कूल के दौरान स्टारगेजिंग कार्यक्रम से प्रभावित होकर उन्होंने तारों भरे आसमान को अलग नजरिए से देखना शुरू किया। बाद में मनाली के एक एस्ट्रोनॉमी कार्यक्रम के दौरान उनके मन में सवाल आया कि उनका छोटा-सा गांव भी वैश्विक एस्ट्रो-टूरिज्म का हिस्सा क्यों नहीं बन सकता। उन्होंने ग्रामीणों को समझाया कि डार्क-स्काई का मतलब गांव को अंधेरे में रखना नहीं, बल्कि रोशनी का जिम्मेदारी से इस्तेमाल करना है। धीरे-धीरे ग्रामीण और प्रशासन भी इस विचार से जुड़े। यही सोच रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के उस संदेश से भी जुड़ती है, जिसमें उन्होंने युवाओं से केवल समस्याएं पहचानने के बजाय उनके समाधान तलाशने और ‘एजेंट ऑफ चेंज’ बनने का आह्वान किया। उदमल की कहानी इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत के हजारों छोटे गांवों और समुदायों में कोई न कोई ऐसी विशेषता मौजूद है, जो उन्हें अलग पहचान दे सकती है। जरूरत सिर्फ उस विशेषता को पहचानने और उसके आधार पर भविष्य का सपना देखने की है। किसी गांव की पहचान हमेशा उसकी दूरी, गरीबी या पिछड़ेपन से तय नहीं होती—कभी-कभी एक युवा की नई सोच उसी गांव को दुनिया के नक्शे पर ला सकती है।




