राजस्थान निकाय चुनाव में सियासत के अनोखे रंग, कहीं शादी की गारंटी तो कहीं सिंबल के लिए दंडवत
चौमूं में पूर्व विधायक ने कुंवारे युवाओं की शादी कराने का वादा किया, जोधपुर में प्रत्याशी कनक दंडौती करते हुए पहुंची; कोटपूतली में उम्मीदवार के अचानक गायब होने से मचा हड़कंप, जन्माष्टमी पर दिखी भाईचारे की मिसाल

राजस्थान में नगर निकाय चुनाव का माहौल अब पूरी तरह रंग पकड़ चुका है और राजनीतिक दलों के साथ प्रत्याशी भी मतदाताओं को अपने पक्ष में करने के लिए अलग-अलग तरीके आजमा रहे हैं। चुनावी प्रचार के बीच कुछ घटनाएं ऐसी भी सामने आई हैं, जिन्होंने राजनीतिक चर्चाओं के साथ लोगों का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। चौमूं में पूर्व विधायक रामलाल शर्मा ने पार्षद प्रत्याशी राजकुमार बराला के समर्थन में आयोजित सभा में क्षेत्र के अविवाहित युवाओं की शादी करवाने की गारंटी देने की बात कही। उनका कहना था कि समर्थित प्रत्याशी को जीत दिलाने के बाद वे कुंवारे युवाओं की शादी करवाने के लिए अपनी तरफ से व्यवस्था कराने का प्रयास करेंगे। शादी का मुद्दा उनके लिए नया नहीं है और इससे पहले भी वे अविवाहित युवाओं की समस्या को लेकर सार्वजनिक रूप से अपनी बात रख चुके हैं। उनके पिछले बयान के बाद एक 43 वर्षीय व्यक्ति ने उनसे अपनी शादी करवाने की अपील करते हुए पत्र भी लिखा था, जिसमें उम्र निकलने और विवाह नहीं होने की परेशानी का जिक्र किया गया था। अब एक बार फिर चुनावी मंच से शादी करवाने की गारंटी दिए जाने के बाद यह मामला चर्चा में आ गया है। उधर जोधपुर में वार्ड 91 से निर्दलीय प्रत्याशी सीता देवी का चुनावी सिंबल लेने का तरीका भी लोगों के बीच चर्चा का विषय बन गया। सीता देवी अपने पति श्रवण कुमार के साथ कनक दंडौती करते हुए रिटर्निंग अधिकारी के कार्यालय पहुंचीं। सड़क पर दंडवत करते हुए कार्यालय तक पहुंचने की उनकी तस्वीरें और वीडियो सामने आने के बाद स्थानीय स्तर पर इसे लेकर काफी चर्चा हुई। चुनावी माहौल में जयपुर के परकोटा इलाके की एक घटना भी अलग अंदाज में सामने आई, जहां भाजपा का एक प्रत्याशी ढोल-ताशों के साथ घर-घर जाकर वोट मांग रहा था। इसी दौरान स्थानीय निवासी ने इलाके में फैली गंदगी की ओर ध्यान दिलाते हुए प्रत्याशी से सवाल किया कि जिस तरह वे वोट मांगने के लिए घर-घर पहुंच रहे हैं, उसी तरह क्षेत्र में जमा कचरे की समस्या भी दूर कराएं। यानी स्थानीय मुद्दों ने प्रचार के बीच प्रत्याशियों को आईना दिखाने का काम किया। नागौर के कुचेरा में भी स्थानीय राजनीति और धार्मिक आयोजनों का मेल दिखाई दे रहा है, जहां पूर्व विधायक रिछपाल मिर्धा और विधायक रेवंतराम डांगा विभिन्न कार्यक्रमों में सक्रिय हैं। वहीं बगरू विधायक कैलाश वर्मा ने जन्माष्टमी के अवसर पर समर्थित प्रत्याशी के पक्ष में लोगों से समर्थन मांगते हुए धार्मिक माहौल के बीच चुनावी अपील की। इन सबके बीच सबसे ज्यादा चर्चा कोटपूतली के वार्ड 32 से भाजपा प्रत्याशी बुधराम के अचानक लापता होने को लेकर रही। चुनाव में टिकट मिलने के बाद वे कथित तौर पर चुपचाप घर से निकल गए और कई शहरों की बसों में सफर करते रहे। जानकारी के मुताबिक वे कोटपूतली से सीकर, फिर दिल्ली, उसके बाद अलवर और बहरोड़ होते हुए दोबारा दिल्ली तक पहुंच गए। जब काफी समय तक उनका कोई पता नहीं चला तो परिवार और स्थानीय लोगों में चिंता बढ़ गई और मामला पुलिस तक पहुंच गया। चुनावी माहौल होने के कारण यह मामला और गंभीर हो गया तथा उनके विरोधी प्रत्याशियों पर भी तरह-तरह की आशंकाएं जताई जाने लगीं। कांग्रेस प्रत्याशी ने उनकी तलाश की मांग को लेकर पुलिस थाने के बाहर धरना तक दिया। पुलिस ने तलाश शुरू की और आखिरकार बुधराम को दिल्ली से खोजकर उनके परिवार को सौंप दिया। बताया गया कि उन्होंने पहले कभी चुनाव नहीं लड़ा था और उनके सामने मैदान में मौजूद कुछ प्रत्याशी राजनीतिक रूप से प्रभावशाली परिवारों से जुड़े हुए थे। ऐसे में उनके अचानक गायब होने की घटना ने पूरे इलाके में चर्चाओं को जन्म दे दिया। राजस्थान के निकाय चुनावों में जहां एक तरफ टिकट, जातीय समीकरण, स्थानीय मुद्दे और राजनीतिक प्रतिष्ठा महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ इस तरह के घटनाक्रम चुनावी माहौल को रोचक बना रहे हैं। इसी बीच जन्माष्टमी के अवसर पर प्रदेश के कई हिस्सों से सामाजिक समरसता की तस्वीरें भी सामने आईं। सोशल मीडिया पर ऐसे वीडियो दिखाई दिए, जिनमें मुस्लिम परिवारों के बच्चे कृष्ण कन्हैया का रूप धारण कर स्कूल के कार्यक्रमों में हिस्सा लेने जाते नजर आए और उनके माता-पिता उन्हें उत्साहपूर्वक स्कूल पहुंचाते दिखाई दिए। राजस्थान में धार्मिक और सांस्कृतिक आयोजनों में अलग-अलग समुदायों की भागीदारी की परंपरा लंबे समय से रही है। जयपुर में मुस्लिम कारीगरों द्वारा मंदिरों के लिए चांदी का वर्क तैयार करने का काम भी इसी साझा सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा माना जाता है। त्योहारों की बात करें तो मकर संक्रांति की पतंगबाजी, होली के रंग और दीपावली के उत्सव में भी विभिन्न समुदायों की भागीदारी दिखाई देती है। जयपुर की तीज सवारी और ताजियों के जुलूस जैसे आयोजनों में भी शहर की साझा संस्कृति नजर आती है। अजमेर में दरगाह शरीफ पर अलग-अलग धर्मों के श्रद्धालुओं का पहुंचना भी सामाजिक मेल-जोल का उदाहरण है। निकाय चुनाव की राजनीतिक गर्मी के बीच सामने आई ये घटनाएं राजस्थान के चुनावी माहौल के अलग-अलग पहलुओं को सामने रखती हैं—कहीं मतदाताओं को आकर्षित करने के लिए अनोखे वादे हैं, कहीं चुनावी प्रक्रिया के लिए असाधारण तरीके अपनाए जा रहे हैं, कहीं प्रत्याशी के अचानक गायब होने से पुलिस और राजनीति दोनों सक्रिय हो जाते हैं और कहीं धार्मिक त्योहार सामाजिक भाईचारे का संदेश देते हैं। इन घटनाओं के बीच स्थानीय समस्याएं और विकास के मुद्दे भी मतदाताओं के लिए उतने ही महत्वपूर्ण हैं, इसलिए चुनावी नतीजे केवल बड़े नेताओं के प्रभाव से नहीं बल्कि वार्ड स्तर के समीकरण, प्रत्याशी की व्यक्तिगत पकड़ और जनता के स्थानीय मुद्दों पर भरोसे से भी तय होंगे।




