ब्रेस्ट कैंसर की दवा टैमोक्सीफेन से बढ़ सकता है फाइब्रॉइड का रिस्क: एक्सपर्ट से समझें दवा कैसे करती है काम, किन महिलाओं को ज्यादा सावधानी जरूरी
टैमोक्सीफेन ब्रेस्ट कैंसर के दोबारा होने का खतरा घटाती है, लेकिन कुछ महिलाओं में गर्भाशय से जुड़ी समस्याओं का जोखिम बढ़ सकता है; जानिए फाइब्रॉइड के लक्षण, जांच और इलाज

फिजिकल हेल्थ। ब्रेस्ट कैंसर के इलाज के बाद कई महिलाओं को लंबे समय तक हार्मोनल दवाएं लेनी पड़ती हैं। इनमें टैमोक्सीफेन एक प्रमुख दवा है, जिसका इस्तेमाल खासतौर पर एस्ट्रोजन रिसेप्टर पॉजिटिव ब्रेस्ट कैंसर में किया जाता है। यह दवा ब्रेस्ट टिश्यू में एस्ट्रोजन के असर को रोककर कैंसर के दोबारा होने का खतरा कम करने में मदद करती है।
हालांकि, शरीर के अलग-अलग हिस्सों पर टैमोक्सीफेन का असर एक जैसा नहीं होता। गर्भाशय में यह एस्ट्रोजन जैसा प्रभाव डाल सकती है और कुछ महिलाओं में गर्भाशय की परत मोटी होने, फाइब्रॉइड या अन्य बदलावों का जोखिम बढ़ सकता है।
हाल ही में अभिनेत्री और ब्रेस्ट कैंसर सर्वाइवर छवि मित्तल ने बताया कि कैंसर के इलाज के बाद टैमोक्सीफेन लेने के दौरान उनका पहले से मौजूद यूटेरिन फाइब्रॉइड काफी बढ़ गया। उनके अनुसार करीब 1.25 सेंटीमीटर का फाइब्रॉइड बढ़कर 7.2 सेंटीमीटर तक पहुंच गया। इसके बाद उन्हें तेज दर्द, ज्यादा ब्लीडिंग और ब्लड क्लॉट्स जैसी परेशानियां हुईं और आखिरकार सर्जरी करानी पड़ी।
लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि टैमोक्सीफेन लेने वाली हर महिला को फाइब्रॉइड हो जाएगा। विशेषज्ञों के मुताबिक जोखिम व्यक्ति की मेडिकल हिस्ट्री और अन्य परिस्थितियों पर निर्भर करता है।
टैमोक्सीफेन क्या है और ब्रेस्ट कैंसर में क्यों दी जाती है?
सीनियर कंसल्टेंट, मेडिकल ऑन्कोलॉजी, नारायणा हॉस्पिटल जयपुर के डॉ. रोहित स्वामी के अनुसार, टैमोक्सीफेन एक हार्मोनल मेडिसिन है। इसका इस्तेमाल खासतौर पर उन ब्रेस्ट कैंसर मरीजों में किया जाता है, जिनका कैंसर एस्ट्रोजन रिसेप्टर पॉजिटिव होता है।
ऐसे कैंसर में एस्ट्रोजन कैंसर सेल्स की ग्रोथ में भूमिका निभाता है। टैमोक्सीफेन एस्ट्रोजन रिसेप्टर से जुड़कर उसके असर को रोकने में मदद करती है। इससे कैंसर सेल्स को बढ़ने वाला संकेत कम हो जाता है और बीमारी के दोबारा होने का जोखिम घटाने में मदद मिलती है।
क्या टैमोक्सीफेन कीमोथेरेपी है?
नहीं। टैमोक्सीफेन कीमोथेरेपी नहीं बल्कि हार्मोनल थेरेपी की दवा है।
कीमोथेरेपी में ऐसी दवाओं का इस्तेमाल किया जाता है जो कैंसर सेल्स को नष्ट करने या उनकी वृद्धि रोकने का काम करती हैं। दूसरी ओर, हार्मोनल थेरेपी हार्मोन के असर को रोकने या नियंत्रित करने के जरिए कुछ प्रकार के कैंसर की ग्रोथ को प्रभावित करती है।
शरीर में कैसे काम करती है यह दवा?
टैमोक्सीफेन को सिलेक्टिव एस्ट्रोजन रिसेप्टर मॉड्यूलेटर (SERM) कहा जाता है। इसका कारण यह है कि शरीर के अलग-अलग अंगों में यह एस्ट्रोजन पर अलग प्रभाव डाल सकती है।
ब्रेस्ट टिश्यू में यह एस्ट्रोजन के प्रभाव को ब्लॉक करने में मदद करती है। सामान्य स्थिति में एस्ट्रोजन एस्ट्रोजन रिसेप्टर से जुड़कर कुछ कैंसर सेल्स को बढ़ने का संकेत दे सकता है। टैमोक्सीफेन इन रिसेप्टर्स पर कब्जा करके एस्ट्रोजन को अपना प्रभाव दिखाने से रोकती है।
यही वजह है कि एस्ट्रोजन रिसेप्टर पॉजिटिव ब्रेस्ट कैंसर के इलाज में इसका महत्वपूर्ण स्थान है।
ब्रेस्ट कैंसर के बाद टैमोक्सीफेन लेने का क्या फायदा?
डॉक्टर मरीज की बीमारी और दोबारा कैंसर होने के जोखिम को देखते हुए टैमोक्सीफेन लंबे समय तक जारी रखने की सलाह दे सकते हैं। यह उपचार के बाद ब्रेस्ट कैंसर के दोबारा होने के खतरे को कम करने में मदद करती है।
दिए गए विशेषज्ञ विवरण के अनुसार, ‘द लैंसेट’ में प्रकाशित एक मेटा-एनालिसिस में लगभग 5 साल तक टैमोक्सीफेन लेने वाली महिलाओं में दवा न लेने वाली महिलाओं की तुलना में कैंसर के दोबारा होने और ब्रेस्ट कैंसर से मृत्यु का जोखिम कम पाया गया।
कितने साल तक लेनी पड़ सकती है टैमोक्सीफेन?
इसका कोई एक निश्चित समय सभी मरीजों के लिए लागू नहीं होता। मरीज की उम्र, कैंसर का प्रकार, स्टेज और दोबारा बीमारी होने के जोखिम जैसे कारकों के आधार पर डॉक्टर अवधि तय करते हैं।
कई मामलों में इसे कम से कम 5 साल तक दिया जाता है। कुछ मरीजों में डॉक्टर की सलाह के अनुसार यह अवधि 10 साल तक भी हो सकती है।
इसलिए मरीज को अपने स्तर पर दवा बंद नहीं करनी चाहिए।
लंबे समय तक लेने पर क्या साइड इफेक्ट हो सकते हैं?
हर महिला में टैमोक्सीफेन के साइड इफेक्ट एक जैसे नहीं होते। कुछ महिलाओं में हल्की परेशानियां हो सकती हैं, जबकि कुछ में गंभीर समस्याएं भी सामने आ सकती हैं।
लंबे समय तक इसके इस्तेमाल से गर्भाशय, लिवर, आंखों और ब्लड वेसल्स पर असर पड़ने की संभावना बताई गई है। संभावित समस्याओं में शामिल हैं:
- गर्भाशय की परत का मोटा होना
- गर्भाशय में फाइब्रॉइड या अन्य बदलाव
- फैटी लिवर जैसी समस्या
- आंखों से संबंधित परेशानियां
- ब्लड क्लॉट बनने का जोखिम
इसी वजह से इलाज के दौरान डॉक्टर के नियमित फॉलोअप को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।
ब्रेस्ट कैंसर की दवा गर्भाशय को कैसे प्रभावित कर सकती है?
टैमोक्सीफेन ब्रेस्ट में एस्ट्रोजन का असर रोकती है, लेकिन गर्भाशय में इसका प्रभाव अलग हो सकता है। यहां यह एस्ट्रोजन जैसा प्रभाव डाल सकती है।
इससे गर्भाशय की अंदरूनी परत में बदलाव हो सकते हैं और कुछ महिलाओं में फाइब्रॉइड या दूसरी यूटेरिन समस्याएं सामने आ सकती हैं।
हालांकि, टैमोक्सीफेन लेने वाली हर महिला में ऐसा होना जरूरी नहीं है।
फाइब्रॉइड क्या होता है?
यूटेरिन फाइब्रॉइड गर्भाशय की मांसपेशियों और फाइब्रस टिश्यू से बनने वाली गांठ होती है। इन्हें लियोमायोमा भी कहा जाता है।
फाइब्रॉइड आमतौर पर बिनाइन यानी गैर-कैंसरकारी होते हैं। इनका आकार बहुत छोटा होने से लेकर काफी बड़ा होने तक हो सकता है और हर महिला में इनके लक्षण भी एक जैसे नहीं होते।
क्या टैमोक्सीफेन लेने वाली हर महिला को फाइब्रॉइड हो सकता है?
नहीं। टैमोक्सीफेन लेने का मतलब यह नहीं है कि महिला को निश्चित रूप से फाइब्रॉइड होगा।
दवा गर्भाशय में कुछ बदलावों के जोखिम को प्रभावित कर सकती है, लेकिन इसका असर हर महिला में अलग हो सकता है। खासतौर पर जिन महिलाओं को पहले से फाइब्रॉइड या गर्भाशय से जुड़ी कोई समस्या है, उन्हें अपने डॉक्टर को इसकी जानकारी देनी चाहिए।
किन महिलाओं को ज्यादा सावधान रहना चाहिए?
जिन महिलाओं को पहले से फाइब्रॉइड या गर्भाशय से जुड़ी कोई बीमारी है, उन्हें टैमोक्सीफेन उपचार के दौरान अपने डॉक्टर के संपर्क में रहना चाहिए।
अगर दवा लेते समय पीरियड्स में असामान्य बदलाव, ज्यादा ब्लीडिंग, पेल्विक दर्द या दूसरी नई परेशानी शुरू हो, तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।
फाइब्रॉइड के शुरुआती लक्षण क्या हैं?
फाइब्रॉइड कई बार बिना किसी लक्षण के भी मौजूद रह सकता है। लेकिन लक्षण होने पर इनमें खासतौर पर ये समस्याएं दिखाई दे सकती हैं:
- पीरियड्स का अनियमित होना
- बहुत ज्यादा या लंबे समय तक ब्लीडिंग
- पेल्विक एरिया में दर्द या भारीपन
- पेट के निचले हिस्से में दबाव महसूस होना
- ब्लैडर या आंत से जुड़ी परेशानी
लक्षणों की गंभीरता फाइब्रॉइड के आकार और उसकी स्थिति पर निर्भर कर सकती है।
फाइब्रॉइड की जांच कैसे होती है?
डॉक्टर पहले मरीज के लक्षण और मेडिकल हिस्ट्री समझते हैं। इसके बाद जरूरत के अनुसार पेल्विक एग्जामिनेशन किया जा सकता है।
फाइब्रॉइड की पुष्टि के लिए अल्ट्रासाउंड एक सामान्य जांच है। इससे डॉक्टर गांठों की संख्या, आकार और गर्भाशय में उनकी स्थिति का पता लगा सकते हैं।
क्या फाइब्रॉइड में हमेशा सर्जरी करनी पड़ती है?
नहीं। हर फाइब्रॉइड का इलाज सर्जरी से करना जरूरी नहीं होता।
अगर लक्षण हल्के हैं, तो डॉक्टर दवाओं के जरिए दर्द और ज्यादा ब्लीडिंग को नियंत्रित कर सकते हैं। कुछ परिस्थितियों में ऐसी दवाओं का इस्तेमाल भी किया जाता है जो फाइब्रॉइड के आकार को कम करने में मदद कर सकती हैं।
सर्जरी की जरूरत फाइब्रॉइड के आकार, स्थिति, लक्षण और मरीज की व्यक्तिगत परिस्थितियों के आधार पर तय होती है।
कैंसर का इलाज खत्म होने के बाद भी क्यों हो सकती हैं परेशानियां?
कैंसर का उपचार पूरा होने के बाद भी कुछ मरीजों को लंबे समय तक शारीरिक या मानसिक परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है। इनका संबंध सर्जरी, कीमोथेरेपी, रेडिएशन या हार्मोनल थेरेपी से हो सकता है।
इसीलिए कैंसर सर्वाइवर के लिए इलाज खत्म होने के बाद भी नियमित फॉलोअप महत्वपूर्ण होता है।
लाइफस्टाइल से साइड इफेक्ट का जोखिम कम किया जा सकता है?
स्वस्थ जीवनशैली शरीर को उपचार के दौरान और उसके बाद बेहतर तरीके से संभालने में मदद कर सकती है। इसके लिए नियमित शारीरिक गतिविधि, संतुलित भोजन और स्वस्थ वजन बनाए रखना महत्वपूर्ण है।
हालांकि, लाइफस्टाइल में बदलाव को डॉक्टर द्वारा दी गई कैंसर की दवा का विकल्प नहीं माना जाना चाहिए।
ब्रेस्ट कैंसर से बचाव के लिए क्या करें?
ब्रेस्ट कैंसर के सभी मामलों को पूरी तरह रोकना संभव नहीं है। हालांकि, कुछ स्वस्थ आदतों से जोखिम कम करने में मदद मिल सकती है।
- संतुलित और पौष्टिक आहार लें।
- वजन को स्वस्थ सीमा में बनाए रखें।
- नियमित एक्सरसाइज या शारीरिक गतिविधि करें।
- शराब से बचें।
- स्मोकिंग न करें।
- उम्र और व्यक्तिगत जोखिम के अनुसार डॉक्टर की सलाह से स्क्रीनिंग कराएं।
- परिवार में कैंसर की हिस्ट्री हो तो डॉक्टर को इसकी जानकारी दें।
जरूरी बात
ब्रेस्ट कैंसर के इलाज के दौरान टैमोक्सीफेन जैसी हार्मोनल दवाएं कई मरीजों के लिए उपचार का महत्वपूर्ण हिस्सा हो सकती हैं। इसलिए इसके संभावित साइड इफेक्ट की चिंता में बिना डॉक्टर की सलाह दवा बंद नहीं करनी चाहिए। किसी भी असामान्य ब्लीडिंग, तेज दर्द या नए लक्षण की जानकारी अपने ऑन्कोलॉजिस्ट या संबंधित विशेषज्ञ को तुरंत दें।



