कोडरमा में मुर्गी पालन से महिलाओं की बदली जिंदगी
लेगहॉर्न BV 300 प्रजाति की मुर्गियां बनीं ग्रामीण महिलाओं की कमाई का जरिया, सरकारी अनुदान से कम लागत में शुरू किया कारोबार

कोडरमा के डोमचांच प्रखंड में ग्रामीण महिलाएं लेगहॉर्न BV 300 प्रजाति की मुर्गियों का पालन कर स्वरोजगार की दिशा में आगे बढ़ रही हैं। JSLPS की पहल से भेलवाटांड़ गांव की मनीषा मेहता सहित कई महिलाएं मुर्गी पालन को अपनी आजीविका का साधन बना रही हैं। करीब 1000 वर्गफीट क्षेत्र में चल रहे मनीषा के फार्म में फिलहाल 600 मुर्गियां हैं, जिनमें 400 से 450 तक प्रतिदिन अंडे देती हैं। इस प्रजाति की खासियत बताई गई है कि फार्म में आने के करीब 25 दिन बाद मुर्गियां अंडे देना शुरू कर देती हैं और उत्पादन करीब डेढ़ साल तक जारी रहता है। इसके बाद मुर्गियों को मांस के लिए खुले बाजार में बेचकर अतिरिक्त आमदनी हासिल की जाती है। एक केज में 100 मुर्गियों को रखने की व्यवस्था तैयार करने में करीब 1.08 लाख रुपए की लागत आती है, लेकिन सरकारी स्तर पर 80 प्रतिशत अनुदान मिलने से लाभार्थी का अपना खर्च करीब 20 हजार रुपए तक रह जाता है। मनीषा के अनुसार दाना-पानी, रखरखाव और अन्य खर्च निकालने के बाद उन्हें हर महीने करीब 30 से 40 हजार रुपए की आमदनी होती है, जिससे सालाना आय लगभग 4 से 5 लाख रुपए तक पहुंच सकती है। इस व्यवसाय में महिलाओं को तकनीकी प्रशिक्षण और सहयोग भी दिया जा रहा है तथा चिकित्सकों द्वारा समय-समय पर मुर्गियों के स्वास्थ्य की जांच की जाती है। अंडों की बिक्री के साथ उत्पादन अवधि पूरी होने के बाद मुर्गियों की बिक्री से भी अतिरिक्त आय का रास्ता बनता है। खास तौर पर ठंड के मौसम में अंडों की मांग और कीमत बढ़ने से मुनाफा सामान्य मौसम की तुलना में करीब दोगुना तक होने का दावा किया गया है। कम लागत, सरकारी अनुदान, तकनीकी सहयोग और अंडों की नियमित बिक्री के कारण मुर्गी पालन ग्रामीण महिलाओं के लिए आत्मनिर्भरता और आय का प्रभावी माध्यम बनता नजर आ रहा है।




