Welcome to भगवा हिन्दुस्तान   Click to listen highlighted text! Welcome to भगवा हिन्दुस्तान
मध्य प्रदेश

विदेश से शक्कर बुला रहे, एमपी की मिलों पर ताले: 6 फैक्ट्रियां सालों से बंद, कर्ज और कुप्रबंधन ने बढ़ाई मुश्किल

एमपी में 26 शुगर मिलों में से 6 बंद; कैलारस मिल को फिर शुरू कराने की मांग से प्रदेश में चीनी उद्योग की बदहाली का मुद्दा फिर गरमाया

मध्य प्रदेश में एक ओर बाजार में चीनी की कीमतें बढ़ने के बीच सरकार ने सप्लाई बनाए रखने के लिए 10 लाख टन चीनी आयात करने का फैसला किया है, वहीं दूसरी ओर प्रदेश की कई चीनी मिलें वर्षों से बंद पड़ी हैं और उनकी मशीनरी व परिसंपत्तियां जर्जर होती जा रही हैं। मुरैना की कैलारस शुगर मिल को दोबारा शुरू कराने की मांग को लेकर कांग्रेस विधायक पंकज उपाध्याय के आमरण अनशन के बाद यह मुद्दा एक बार फिर चर्चा में आया है।政府 के आश्वासन के बाद अनशन खत्म जरूर हुआ, लेकिन किसानों और कर्मचारियों की नाराजगी अभी भी बनी हुई है। कैलारस शुगर मिल करीब 15 साल से बंद है और इसे दोबारा शुरू कराने के लिए सरकार पहले भी 2017 के बाद दो बार प्रयास कर चुकी है, लेकिन दोनों बार प्रक्रिया कागजी स्तर से आगे नहीं बढ़ सकी। कृषि मंत्री एदल सिंह कंसाना की ओर से मिल को दोबारा शुरू करने के लिए कार्रवाई आगे बढ़ाने की बात कही गई है। कैलारस का मामला अकेला नहीं है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार मध्य प्रदेश में कुल 26 शुगर मिलें हैं, जिनमें से छह पूरी तरह बंद हो चुकी हैं। सीहोर की भोपाल शुगर इंडस्ट्रीज वर्ष 2002-03 से बंद है। यह मिल 1937 में स्थापित हुई थी और इसकी क्षमता 1,250 टीसीडी थी। प्रबंधन और मजदूरों के बीच विवाद, मिल को बीमार इकाई घोषित किए जाने से जुड़े आरोप और जमीन को लेकर विवाद इसके इतिहास का हिस्सा रहे हैं। मिल के पास हजारों एकड़ कृषि भूमि होने तथा मजदूरों के वेतन और पीएफ की बड़ी रकम बकाया होने के दावे भी सामने आए हैं। ग्वालियर की डबरा शुगर मिल भी आर्थिक संकट और किसानों को समय पर गन्ने का भुगतान नहीं मिलने के बाद मुश्किल में आई। भुगतान में देरी के कारण किसानों ने गन्ने की जगह दूसरी फसलों की ओर रुख किया और मिल के लिए कच्चे माल की कमी बढ़ती गई। अंततः मिल बंद हो गई और अब इसकी मशीनरी तथा जमीन को लेकर भी विवाद बना हुआ है। इंदौर की द मालवा सहकारी शक्कर कारखाना, बरलाई भी बंद मिलों में शामिल है। वर्ष 1980 में स्थापित इस सहकारी मिल से इंदौर, देवास और उज्जैन के करीब 10 हजार किसान जुड़े थे। 2001 के सूखे के बाद गन्ने का उत्पादन घटा और कुप्रबंधन तथा बढ़ते कर्ज की समस्या के बीच 2002-03 में मिल बंद कर दी गई। इस मिल पर सरकार का करीब 165 करोड़ रुपए का कर्ज दर्ज होने की बात कही गई है। गुना की नारायणपुरा शक्कर मिल वर्ष 2000 में सहकारिता मॉडल पर स्थापित हुई थी और इससे करीब 3 हजार हेक्टेयर क्षेत्र के किसान जुड़े थे। बैंक कर्ज और बढ़ते ब्याज के कारण मिल घाटे में चली गई। किसानों का भुगतान अटकने के बाद गन्ने की खेती प्रभावित हुई और अंततः 2017-18 में मिल बंद हो गई। जुलाई 2026 में गुना कलेक्टर ने तकनीकी टीम के साथ मिल का निरीक्षण किया और इसे दोबारा शुरू करने के लिए विशेष एक्शन प्लान की बात कही। संगठन से जुड़े लोगों के अनुसार मिल बंद होने से करीब 80 गांवों के किसान प्रभावित हुए हैं और कर्मचारियों के वेतन का बकाया भी बना हुआ है। इन मिलों की कहानी बताती है कि चीनी उद्योग के संकट के पीछे सिर्फ एक कारण नहीं है, बल्कि वित्तीय संकट, कर्ज, किसानों को भुगतान में देरी, कच्चे माल की कमी, कुप्रबंधन और लंबे समय तक बंद रहने से मशीनरी के जर्जर होने जैसी समस्याएं जुड़ी हुई हैं। ऐसे में एक तरफ देश में चीनी की जरूरत पूरी करने के लिए आयात का फैसला और दूसरी तरफ प्रदेश में बंद पड़ी मिलों की स्थिति सरकार के सामने बड़ा सवाल खड़ा करती है कि स्थानीय चीनी उद्योग को दोबारा मजबूत करने के लिए क्या ठोस कदम उठाए जाएंगे।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button
error: Content is protected !!
Click to listen highlighted text!