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पेरेंटिंग का बढ़ता तनाव रिश्ते में ला सकता है दूरी: बच्चे की जिम्मेदारियों के बीच पति-पत्नी रोज निकालें 15 मिनट

नींद की कमी, बढ़ती जिम्मेदारियां और लगातार थकान से छोटी-छोटी बातों पर बढ़ सकता है तनाव; जिम्मेदारियां बांटना और बच्चे के सामने विवाद से बचना जरूरी

बच्चे के जन्म के बाद पति-पत्नी की जिंदगी में कई बदलाव आते हैं। बच्चे की देखभाल, स्कूल, खान-पान और रोजमर्रा की जिम्मेदारियों के बीच कई बार दंपती एक-दूसरे के लिए समय नहीं निकाल पाते। लगातार थकान और मानसिक दबाव के कारण छोटी-छोटी बातों पर बहस भी बढ़ सकती है।

फैमिली और चाइल्ड काउंसलर डॉ. अमिता श्रृंगी के मुताबिक, लंबे समय तक लगातार जिम्मेदारियां निभाने से माता-पिता की भावनात्मक ऊर्जा कम हो सकती है। इसे पेरेंटिंग स्ट्रेस या पेरेंटल बर्नआउट की शुरुआत के रूप में देखा जा सकता है।

छोटी बात नहीं, पीछे जमा थकान होती है वजह

बच्चे का खाना, स्कूल का होमवर्क, घर का कोई काम या रात में बच्चे का बार-बार जागना जैसी छोटी घटनाएं कभी-कभी बड़े विवाद में बदल जाती हैं। इसकी एक वजह यह हो सकती है कि दोनों पार्टनर पहले से ही शारीरिक और भावनात्मक रूप से थके हुए हों।

लगातार तनाव में रहने पर माता-पिता का धैर्य कम हो सकता है और बच्चे के साथ भावनात्मक रूप से उपलब्ध रहना भी मुश्किल हो सकता है।

बच्चे पर भी पड़ सकता है घर के माहौल का असर

चार साल की उम्र में बच्चा घर के माहौल और माता-पिता के व्यवहार को समझने लगता है। यदि वह लगातार माता-पिता को तनाव में, एक-दूसरे से नाराज या शिकायत करते देखता है तो कुछ बच्चों में असुरक्षा या व्यवहार में बदलाव दिखाई दे सकता है।

ऐसे बच्चे ज्यादा रो सकते हैं, जिद कर सकते हैं, माता-पिता से अधिक चिपके रह सकते हैं, ध्यान आकर्षित करने की कोशिश कर सकते हैं या बहुत शांत हो सकते हैं।

अच्छा पेरेंट बनने के लिए खुद को भूलना जरूरी नहीं

पेरेंटिंग का मतलब अपनी हर जरूरत को नजरअंदाज करना नहीं है। माता-पिता का मानसिक और भावनात्मक संतुलन भी परिवार के लिए महत्वपूर्ण है।

इसलिए खुद के लिए समय निकालना स्वार्थ नहीं, बल्कि परिवार की बेहतर देखभाल का हिस्सा माना जा सकता है।

1. रिश्ते को भी परिवार की जरूरत मानें

पति-पत्नी के बीच प्यार, सम्मान और जुड़ाव बना रहना परिवार के माहौल के लिए महत्वपूर्ण है। बच्चे को भी माता-पिता के बीच सहयोग और अपनापन देखने से सुरक्षा का एहसास मिल सकता है।

2. रोज 15 मिनट सिर्फ एक-दूसरे के लिए

हर दिन कम से कम 15 मिनट ऐसा समय निकालें जिसमें बातचीत सिर्फ पति-पत्नी के बीच हो।

इस दौरान बच्चे की पढ़ाई, खर्च या घर के कामों के बजाय एक-दूसरे से पूछ सकते हैं—

  • आज आपका दिन कैसा रहा?
  • आज किस बात ने सबसे ज्यादा थकाया?
  • मैं आपकी किस तरह मदद कर सकता/सकती हूं?

छोटी-सी यह आदत दोनों को एक-दूसरे की भावनाओं को समझने में मदद कर सकती है।

3. बच्चे की जिम्मेदारियां बांटें

यदि एक पार्टनर को लगातार लगता रहे कि बच्चे और घर का पूरा बोझ उसी पर है तो नाराजगी बढ़ सकती है। इसलिए दोनों मिलकर जिम्मेदारियां तय कर सकते हैं।

जैसे—

  • बच्चे को स्कूल कौन तैयार करेगा?
  • होमवर्क कौन कराएगा?
  • डॉक्टर के पास कौन लेकर जाएगा?
  • छुट्टी के दिन घर और बच्चे के काम कैसे बांटे जाएंगे?

जिम्मेदारियों का स्पष्ट बंटवारा आपसी सहयोग और सम्मान बढ़ाने में मदद कर सकता है।

4. बच्चे के सामने एक-दूसरे को दोष न दें

पति-पत्नी के बीच मतभेद होना सामान्य है, लेकिन बच्चे के सामने एक-दूसरे पर आरोप लगाने या अपमानजनक तरीके से बात करने से बचना चाहिए।

जरूरत हो तो विवाद पर बच्चे से अलग और शांत माहौल में बातचीत करें।

5. खुद का ख्याल भी रखें

सेल्फ-केयर के लिए बहुत ज्यादा समय जरूरी नहीं है। पर्याप्त नींद, थोड़ा व्यायाम, पसंद का कोई काम और दोस्तों या परिवार से संपर्क बनाए रखना तनाव कम करने में मदद कर सकता है।

जब माता-पिता खुद भावनात्मक रूप से बेहतर स्थिति में होते हैं तो उनके लिए बच्चे की जरूरतों को धैर्य से संभालना भी आसान हो सकता है।

कब एक्सपर्ट की मदद लें?

यदि पति-पत्नी के बीच लगातार तनाव बना हुआ है, बातचीत लगभग बंद हो गई है, हर छोटी बात पर झगड़ा होता है या तनाव का असर बच्चे के व्यवहार पर पड़ रहा है, तो कपल काउंसलिंग या फैमिली थेरेपी पर विचार किया जा सकता है।

लगातार गुस्सा, उदासी, अत्यधिक थकान या रिश्ते में बढ़ती भावनात्मक दूरी को भी नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।

पेरेंटिंग और रिश्ता एक-दूसरे के विरोधी नहीं

बच्चे की अच्छी परवरिश और पति-पत्नी के रिश्ते की देखभाल साथ-साथ चल सकती है। बच्चे को केवल माता-पिता की देखभाल ही नहीं, बल्कि घर में सम्मान, सहयोग और भावनात्मक जुड़ाव का माहौल भी चाहिए।

इसलिए बच्चे की जिम्मेदारियों के बीच पति-पत्नी को अपने रिश्ते के लिए भी थोड़ा समय निकालना जरूरी है।

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