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बुक रिव्यू: ‘पीपल की छांव में’ — एक पेड़ से शुरू हुई मुहिम, जो बन गई आंदोलन

एक बच्चे की प्रकृति के प्रति जिज्ञासा से लेकर लाखों पेड़ लगाने के संकल्प तक की कहानी; पीपल बाबा की किताब पर्यावरण संरक्षण के साथ जीवन, संघर्ष और बदलाव की सीख भी देती है।

पर्यावरण संरक्षण की बात अक्सर बढ़ती गर्मी, बदलते मौसम या प्रदूषण के समय होती है। लेकिन पेड़, मिट्टी, पानी और प्रकृति हमारे रोजमर्रा के जीवन से कितने गहरे जुड़े हैं, इसे समझने की कोशिश कम ही होती है। स्वामी प्रेम परिवर्तन, जिन्हें देशभर में ‘पीपल बाबा’ के नाम से जाना जाता है, ने अपना जीवन पेड़ लगाने और पर्यावरण संरक्षण को समर्पित किया।

उनकी किताब ‘पीपल की छांव में’ इसी सफर की कहानी है। किताब बताती है कि प्रकृति के प्रति एक बच्चे की जिज्ञासा कैसे आगे चलकर एक बड़े मिशन में बदलती है और किस तरह लगातार प्रयास एक आंदोलन का रूप ले सकता है।

बचपन से शुरू हुआ प्रकृति से रिश्ता

किताब की शुरुआत लेखक के बचपन से होती है। पिता के तबादलों के कारण उनका काफी समय देहरादून में बीता। जंगल, पक्षी और वन्यजीव उनके जीवन का हिस्सा बनने लगे। एक चील को देखकर पैदा हुई जिज्ञासा ने उन्हें प्रकृति और पक्षियों के बारे में पढ़ने के लिए प्रेरित किया।

नानी की सीख का भी उनके जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ा। किताब में नानी से जुड़े प्रसंग भावनात्मक होने के साथ-साथ लेखक की सोच को समझने में मदद करते हैं। आगे चलकर अलग-अलग लोगों और शिक्षकों से मिले अनुभवों ने उनके प्रकृति प्रेम को और मजबूत किया।

पौधा लगाना ही काफी नहीं

किताब की खास बात यह है कि लेखक पेड़ लगाने को सिर्फ पौधा रोपने तक सीमित नहीं रखते। वे बताते हैं कि किसी पौधे को बड़ा करने के लिए मिट्टी, पानी, धूप और आसपास के वातावरण को समझना जरूरी है।

यही सोच धीरे-धीरे उनके काम की पहचान बनती गई। वे लोगों के बीच पहुंचे, पेड़ लगाने का संदेश दिया और पर्यावरण संरक्षण को लेकर जागरूकता फैलाने लगे।

कैसे बने ‘पीपल बाबा’

कहानी का एक महत्वपूर्ण मोड़ वह है, जब लोग लेखक को ‘पीपल बाबा’ के नाम से पहचानने लगते हैं। एक व्यक्ति की व्यक्तिगत रुचि अब सार्वजनिक मुहिम बन चुकी थी।

लेखक बताते हैं कि इस सफर में उन्हें आर्थिक परेशानियों और लोगों के अविश्वास जैसी चुनौतियों का भी सामना करना पड़ा। लेकिन उन्होंने अपने उद्देश्य से समझौता नहीं किया।

पीपल का धार्मिक और वैज्ञानिक महत्व

किताब सिर्फ संस्मरण नहीं है। इसके कई हिस्सों में पीपल के धार्मिक, ऐतिहासिक और वैज्ञानिक महत्व को भी समझाया गया है।

लेखक पेड़ों की कटाई, तेजी से बढ़ते शहरीकरण और जलवायु परिवर्तन जैसी चुनौतियों पर भी बात करते हैं। हालांकि किताब का अंदाज डर पैदा करने वाला नहीं है। समस्या बताने के साथ-साथ वह समाधान की संभावना भी सामने रखती है।

किताब की सबसे बड़ी ताकत

किताब की सबसे बड़ी खूबी इसका अनुभव आधारित होना है। पर्यावरण पर बहुत-सी किताबें और भाषण उपलब्ध हैं, लेकिन यहां लेखक अपने व्यक्तिगत अनुभवों के जरिए प्रकृति को समझाते हैं।

कहीं मिट्टी और पानी की बात होती है तो कहीं पौधों की देखभाल की। कई जगह उन लोगों और परिस्थितियों का जिक्र है, जिन्होंने लेखक की यात्रा को प्रभावित किया।

लेखक की सादगी भी किताब को प्रभावी बनाती है। वे संघर्षों और आर्थिक चुनौतियों को छिपाते नहीं हैं। यही ईमानदारी कहानी को विश्वसनीय बनाती है।

नानी के प्रसंग भावुक करते हैं

किताब में नानी से जुड़े हिस्से सबसे ज्यादा याद रह जाने वाले प्रसंगों में शामिल हैं। नानी सिर्फ परिवार की सदस्य नहीं, बल्कि लेखक के लिए एक गुरु जैसी दिखाई देती हैं।

उनकी सीख और जीवन-दृष्टि लेखक की सोच को आकार देती है। पूरी किताब में उनके प्रभाव की झलक अलग-अलग जगह मिलती है।

विज्ञान और जीवन की सीख साथ-साथ

किताब में पेड़ों, मिट्टी, पानी और पौधों से जुड़ी कई वैज्ञानिक जानकारियां भी दी गई हैं। लेखक बताते हैं कि पौधों को कितना पानी चाहिए, अधिक पानी किस तरह नुकसान पहुंचा सकता है और प्रकृति के अलग-अलग हिस्से एक-दूसरे से कैसे जुड़े हैं।

हालांकि कुछ जगह ये विवरण लंबे हो जाते हैं। जो पाठक सिर्फ कहानी पढ़ना चाहते हैं, उन्हें ये हिस्से थोड़े धीमे लग सकते हैं। लेकिन पर्यावरण संरक्षण के काम की गंभीरता समझने के लिए ये हिस्से महत्वपूर्ण हैं।

भाषा सरल, संदेश प्रभावी

किताब का लेखन अनुभवों और घटनाओं के आसपास घूमता है। भाषा सहज है और पर्यावरण जैसे विषय को आम पाठक के लिए समझने योग्य तरीके से पेश किया गया है।

किताब का संदेश किसी भाषण या नारे की तरह नहीं आता, बल्कि लेखक की जिंदगी के अनुभवों से निकलता है।

यह किताब क्यों पढ़ें?

  • एक ऐसे व्यक्ति की कहानी, जिसने अपने विश्वास को काम में बदला।
  • पर्यावरण संरक्षण को व्यक्तिगत जिम्मेदारी के नजरिए से समझाती है।
  • पेड़, मिट्टी और पानी के महत्व को आसान तरीके से सामने रखती है।
  • संघर्ष, धैर्य और लगातार प्रयास की सीख देती है।
  • किताब पढ़ने के बाद प्रकृति और पेड़ों को देखने का नजरिया बदल सकता है।

हमारी राय

‘पीपल की छांव में’ की सबसे प्रभावी बात इसकी धीमी लेकिन लगातार आगे बढ़ती कहानी है। जैसे एक पेड़ धीरे-धीरे बढ़ता है, वैसे ही लेखक की यात्रा भी छोटे अनुभवों और प्रयासों से आगे बढ़ती है।

कहीं बचपन की जिज्ञासा है, कहीं परिवार से मिली सीख, कहीं संघर्ष और कहीं एक बड़े उद्देश्य की तलाश। किताब खत्म होने के बाद सबसे ज्यादा याद रहती है लेखक की वह जिद, जिसने एक छोटे प्रयास को बड़े पर्यावरण आंदोलन में बदल दिया।

कुल मिलाकर, यह किताब सिर्फ पेड़ लगाने की कहानी नहीं, बल्कि यह समझने की कोशिश है कि बदलाव की शुरुआत एक व्यक्ति से भी हो सकती है।

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