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कामाख्या कॉरिडोर पर साधकों की आपत्ति, कोर्ट तक पहुंचा विवाद; बोले- आस्था और परंपरा की रक्षा जरूरी

बोले- आस्था और परंपरा की रक्षा जरूरी

गुवाहाटी। असम के प्रसिद्ध मां कामाख्या मंदिर के प्रस्तावित एक्सेस कॉरिडोर को लेकर विकास और धार्मिक आस्था के बीच बहस एक बार फिर सामने आई है। कॉरिडोर परियोजना का उद्देश्य श्रद्धालुओं की आवाजाही को सुविधाजनक बनाना और मंदिर परिसर के आसपास की व्यवस्थाओं को बेहतर करना है। असम सरकार ने इसे धार्मिक पर्यटन और श्रद्धालुओं की सुविधा से जुड़ी महत्वपूर्ण परियोजना के रूप में आगे बढ़ाया है। राज्य के बजट दस्तावेज में भी कामाख्या कॉरिडोर को विकसित करने की योजना का उल्लेख किया गया था। वहीं, परियोजना को लेकर कुछ साधकों और याचिकाकर्ताओं ने मंदिर की पारंपरिक धार्मिक व्यवस्था, प्राकृतिक जलधाराओं और आध्यात्मिक महत्व पर संभावित असर को लेकर चिंता जताई है। इस विवाद में मामला अदालत तक पहुंचा और गौहाटी हाईकोर्ट ने फरवरी 2026 में सरकार को परियोजना के कुछ हिस्सों से संबंधित काम आगे बढ़ाने की अनुमति दी, साथ ही मुख्य मंदिर संरचना को किसी भी तरह से प्रभावित न करने की शर्त रखी। इससे पहले अदालत में मंदिर के गर्भगृह से जुड़ी प्राकृतिक जलधाराओं और प्रस्तावित निर्माण के संभावित प्रभाव को लेकर तकनीकी जांच का मुद्दा भी सामने आया था। दूसरी ओर, साधकों का तर्क है कि कामाख्या केवल एक पर्यटन स्थल या सामान्य मंदिर परिसर नहीं है, बल्कि शाक्त और तांत्रिक परंपरा का अत्यंत महत्वपूर्ण केंद्र है, इसलिए विकास कार्यों में वहां की धार्मिक परंपराओं और प्राकृतिक स्वरूप को सर्वोच्च प्राथमिकता मिलनी चाहिए। सोशल मीडिया पर भी कुछ साधकों ने परियोजना को लेकर अपनी चिंताएं व्यक्त की हैं और इसे केवल निर्माण का मुद्दा न मानकर धार्मिक विरासत और साधना परंपरा से जोड़कर देखा है। ऐसे में कामाख्या कॉरिडोर को लेकर मूल सवाल यही है कि श्रद्धालुओं की सुविधा और बुनियादी ढांचे का विकास किस तरह किया जाए, लेकिन मंदिर की सदियों पुरानी धार्मिक परंपरा, प्राकृतिक संरचना और आस्था से जुड़े तत्वों पर कोई प्रतिकूल प्रभाव न पड़े। परियोजना पर अदालत की अनुमति मिलने के बावजूद साधकों की चिंताएं पूरी तरह समाप्त नहीं हुई हैं और आने वाले समय में निर्माण तथा संरक्षण के बीच संतुलन इस पूरे विवाद का सबसे महत्वपूर्ण पहलू बना रहेगा।

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