‘किल द बास्टर्ड’… तभी धुंध में गायब हो गया पाकिस्तानी हेलिकॉप्टर: माइनस 50°C में 27 में से 21 जवानों के हाथ-पैर गल गए, फिर भी सियाचिन पर लहराया तिरंगा
सियाचिन पर पाकिस्तान की नजर, RAW को मिले घुसपैठ की तैयारी के सुराग; कर्नल नरेंद्र ‘बुल’ कुमार की चेतावनी के बाद भारत ने शुरू किया ऑपरेशन मेघदूत

नई दिल्ली। अप्रैल 1984। सियाचिन ग्लेशियर का तापमान करीब माइनस 50 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच चुका था। भारतीय सेना के जवान दुनिया के सबसे ऊंचे युद्धक्षेत्र में दुश्मन के साथ-साथ प्रकृति से भी जंग लड़ रहे थे। भारतीय फौज को सियाचिन पहुंचे अभी चार दिन ही हुए थे और 27 में से 21 जवानों के हाथ-पैर बर्फीली ठंड से बुरी तरह प्रभावित हो चुके थे।
इसी दौरान आसमान में पाकिस्तानी हेलिकॉप्टर दिखाई दिया। भारतीय सैनिकों ने मोर्चा संभाल लिया। कैप्टन ने आदेश दिया—‘किल द बास्टर्ड।’ सैनिकों की उंगलियां ट्रिगर पर थीं, लेकिन इससे पहले कि कोई कार्रवाई होती, हेलिकॉप्टर धुंध में गायब हो गया।
कुछ दिनों बाद सियाचिन ग्लेशियर गोलियों और धमाकों से गूंज उठा। पाकिस्तान पूरी तैयारी के साथ मैदान में उतर चुका था। भारत के पास उस समय भारी तोपें और पर्याप्त भारी गोले नहीं थे। इसके बावजूद जब संघर्ष थमा, तो सियाचिन की बर्फीली चोटियों पर तिरंगा लहरा रहा था।
यह कहानी है ऑपरेशन मेघदूत की।
शिमला समझौते में छूट गया था सियाचिन का एक हिस्सा
कहानी की शुरुआत 2 जुलाई 1972 से होती है। शिमला में भारत की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और पाकिस्तान के राष्ट्रपति जुल्फिकार अली भुट्टो ने समझौते पर हस्ताक्षर किए।
समझौते के तहत कश्मीर में पुरानी सीजफायर लाइन की जगह लाइन ऑफ कंट्रोल यानी LoC तय की गई। नक्शे पर दोनों देशों के अधिकारियों ने सीमारेखा खींची, लेकिन एक जगह आकर रेखा रुक गई—पॉइंट NJ9842।
इसके आगे का इलाका बेहद दुर्गम और बर्फ से ढका हुआ था। इसलिए समझौते में यहां से आगे की सीमा को स्पष्ट रूप से जमीन पर चिन्हित नहीं किया गया। दस्तावेज में इसे ग्लेशियरों की दिशा में आगे बढ़ने वाली रेखा के तौर पर दर्ज किया गया।
आगे चलकर यही अस्पष्टता सियाचिन विवाद की बड़ी वजह बनी।
पाकिस्तान ने नक्शों के जरिए दावा मजबूत करने की कोशिश की
फाइल में दी गई कहानी के मुताबिक, 1970 के दशक के मध्य में पाकिस्तान ने NJ9842 से उत्तर-पूर्व की ओर काराकोरम दर्रे तक एक अलग रेखा दिखाने की रणनीति अपनाई।
इसके बाद विदेशी पर्वतारोहियों को सियाचिन क्षेत्र में अभियान के लिए अनुमति दी गई। कहानी के अनुसार, कुछ विदेशी पर्वतारोहियों द्वारा प्रकाशित नक्शों और लेखों में सियाचिन को पाकिस्तान के हिस्से के रूप में दिखाया जाने लगा।
पाकिस्तान की कोशिश कथित तौर पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपने दावे को मजबूत करने की थी।
कर्नल ‘बुल’ ने नक्शे में देखा खतरा
1975 में दो जर्मन पर्वतारोही भारत पहुंचे। उनकी मुलाकात भारतीय सेना के कर्नल नरेंद्र कुमार से हुई, जिन्हें ‘बुल’ के नाम से जाना जाता था।
1978 में जब दोनों पर्वतारोही दोबारा कर्नल कुमार से मिलने पहुंचे, तो उनके पास एक अंतरराष्ट्रीय नक्शा था। नक्शे में NJ9842 से काराकोरम की ओर सीधी रेखा दिखाई गई थी और उसके भीतर सियाचिन को पाकिस्तान की तरफ दिखाया गया था।
कर्नल कुमार ने इसे गंभीरता से लिया। उन्होंने नक्शा भारतीय सैन्य अधिकारियों के सामने रखा और सियाचिन क्षेत्र में जाकर स्थिति की वास्तविक जानकारी जुटाने का फैसला किया।
सियाचिन में मिले पाकिस्तानी सामान के सुराग
1978 में कर्नल नरेंद्र कुमार अपनी टीम के साथ सियाचिन पहुंचे। बेहद कठिन मौसम और खतरनाक बर्फीली दरारों के बीच टीम ने इलाके की जांच की।
वहां उन्हें जापानी सिगरेट के पैकेट, खाली डिब्बे और अन्य सामान मिला। कुछ पैकेटों पर कथित तौर पर ‘Pak Army Supply’ लिखा हुआ था।
टीम ने तस्वीरें और अन्य साक्ष्य जुटाए। वापस लौटकर इसकी रिपोर्ट सेना के वरिष्ठ अधिकारियों और प्रधानमंत्री कार्यालय तक पहुंचाई गई।
कहानी के अनुसार, इसके बाद कर्नल कुमार को दोबारा सियाचिन भेजा गया और वहां से मिले सुरागों ने भारतीय एजेंसियों की चिंता बढ़ा दी।
पाकिस्तान की तैयारी और ‘ऑपरेशन अबाबील’
1983 की शुरुआत में पाकिस्तानी सेना ने सियाचिन क्षेत्र में रेकी के लिए अपने स्पेशल सर्विस ग्रुप यानी SSG के कमांडो भेजे।
उन्हें वहां भारतीय सेना की मौजूदगी के संकेत मिले। इसके बाद पाकिस्तान ने सियाचिन पर कब्जे की तैयारी तेज कर दी।
फाइल में इसे पाकिस्तान के गुप्त ‘ऑपरेशन अबाबील’ की शुरुआत से जोड़ा गया है।
पाकिस्तानी सेना की योजना ऊंचाई वाले इलाकों में प्रशिक्षित सैनिकों को सियाचिन की महत्वपूर्ण चोटियों और दर्रों की ओर भेजने की थी।
RAW ने जुटाई पाकिस्तान की तैयारियों की जानकारी
इसी दौरान भारतीय खुफिया एजेंसी RAW भी पाकिस्तान की गतिविधियों पर नजर रख रही थी।
फाइल में वर्णित घटनाओं के मुताबिक, दिसंबर 1983 में RAW को गिलगित-बाल्टिस्तान क्षेत्र में पाकिस्तानी सेना की हाई-एल्टीट्यूड ट्रेनिंग और विशेष उपकरणों की खरीद से जुड़ी जानकारी मिली।
भारतीय एजेंसियों को यह पता लगाने की जरूरत थी कि पाकिस्तान सियाचिन पर कब कार्रवाई करने वाला है।
लंदन से मिला अहम सुराग
जनवरी 1984 में RAW के एक अधिकारी ने लंदन के एक माउंटेनियरिंग गियर स्टोर से पाकिस्तान की खरीदारी से जुड़ी जानकारी जुटाई।
स्टोर के मैनेजर के मुताबिक, पाकिस्तान सेना ने 500 से ज्यादा विशेष हाई-एल्टीट्यूड गियर सेट का बड़ा ऑर्डर दिया था। इसमें स्नो गॉगल्स, आइस-एक्स, विशेष टेंट और अत्यधिक ऊंचाई पर इस्तेमाल होने वाले उपकरण शामिल थे।
डिलीवरी मार्च 1984 के लिए बताई गई थी।
यह जानकारी भारतीय एजेंसियों के लिए बेहद महत्वपूर्ण थी। इससे संकेत मिला कि पाकिस्तान जल्द ही सियाचिन में सैन्य कार्रवाई की तैयारी कर रहा है।
दिल्ली में हुई हाई-लेवल बैठक
खुफिया रिपोर्ट मिलने के बाद भारतीय सेना और RAW के वरिष्ठ अधिकारियों के बीच बैठक हुई।
भारतीय पक्ष के सामने अब दो विकल्प थे—पाकिस्तान की कार्रवाई का इंतजार करना या उससे पहले सियाचिन की रणनीतिक ऊंचाइयों पर पहुंच जाना।
फाइल के अनुसार, तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के सामने भी सियाचिन की स्थिति रखी गई। सेना ने आशंका जताई कि अगर पाकिस्तान पहले पहुंच गया, तो महत्वपूर्ण दर्रों और ऊंचाइयों पर भारत की स्थिति बेहद कमजोर हो सकती है।
आखिरकार भारतीय सेना को आगे बढ़ने की अनुमति मिल गई।
शुरू हुआ ऑपरेशन मेघदूत
भारतीय सेना ने सियाचिन पर कब्जा मजबूत करने के लिए अपने अभियान का नाम रखा—‘ऑपरेशन मेघदूत’, यानी बादलों का दूत।
अप्रैल 1984 में भारतीय सैनिकों ने सियाचिन की महत्वपूर्ण ऊंचाइयों की ओर बढ़ना शुरू किया। मौसम दुश्मन से कम खतरनाक नहीं था। बर्फीली हवाएं, बेहद कम तापमान, ऑक्सीजन की कमी और गहरी दरारें सैनिकों के लिए लगातार चुनौती बनी हुई थीं।
लेकिन भारतीय सैनिकों ने इन परिस्थितियों के बावजूद रणनीतिक चोटियों पर अपनी मौजूदगी स्थापित कर दी।
इसके बाद सियाचिन दुनिया के सबसे ऊंचे युद्धक्षेत्रों में से एक बन गया।
यह ऑपरेशन मेघदूत की कहानी का पहला हिस्सा है। अगले हिस्से में—भारतीय सेना ने सियाचिन की चोटियों पर कैसे कब्जा किया, पाकिस्तान की प्रतिक्रिया क्या थी और दुनिया के सबसे ऊंचे युद्धक्षेत्र में पहली बड़ी भिड़ंत कैसे हुई।




