20 साल जेल में रहने के बाद बरी हुए विष्णु तिवारी: परिवार उजड़ गया, घर खंडहर हुआ; हाईकोर्ट ने रेप और SC-ST एक्ट के मामले में निर्दोष माना
जमीन विवाद के बाद दर्ज हुआ था मुकदमा; सजा के दौरान माता-पिता और तीन भाइयों की मौत, 2021 में हाईकोर्ट से मिली रिहाई

उत्तर प्रदेश के ललितपुर जिले के सिलावन गांव के विष्णु तिवारी की जिंदगी का एक बड़ा हिस्सा जेल में बीत गया। रिपोर्ट के मुताबिक, करीब 20 साल जेल में रहने के बाद इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उन्हें बलात्कार और SC-ST एक्ट से जुड़े मामले में बरी कर दिया। जब विष्णु जेल से बाहर आए, तब तक उनका घर लगभग खंडहर हो चुका था और उनके माता-पिता तथा तीन भाइयों की मौत हो चुकी थी।
विष्णु के मुताबिक, वर्ष 2000 में खेत को लेकर पड़ोसी परिवार से विवाद हुआ था। इसके बाद उन पर मारपीट और एक महिला से बलात्कार का मुकदमा दर्ज हुआ। उनका कहना है कि दोनों मामले झूठे थे।
2003 में उम्रकैद की सजा
मामला ललितपुर सेशन कोर्ट में चला और वर्ष 2003 में विष्णु को आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई। इसके बाद उन्हें आगरा सेंट्रल जेल भेज दिया गया।
विष्णु का दावा है कि जेल में उनके साथ मारपीट की गई और पैरों में गंभीर चोटें आईं। वे बताते हैं कि आज भी उन्हें लंगड़ाकर चलना पड़ता है।
केस लड़ते-लड़ते बिक गई जमीन
विष्णु के अनुसार, उनके पिता ने मुकदमे की पैरवी के लिए अनाज और 10 मवेशी तक बेच दिए। बाद में परिवार की करीब 5 एकड़ जमीन भी केस लड़ने में चली गई।
जेल में रहने के दौरान उन्हें परिवार से जुड़ी दुखद खबरें मिलती रहीं। वर्ष 2013 में उन्हें पिता की मौत की जानकारी मिली। इसके बाद 2014 में एक भाई और 2015 में मां की मौत हो गई। 2017 में एक अन्य भाई की भी मौत हो गई। विष्णु इनमें से किसी की अंतिम विदाई में शामिल नहीं हो सके।
भाई सदमे में बीमार हुआ, बाद में उसकी मौत
रिपोर्ट के मुताबिक, विष्णु से मिलने के बाद उनके एक भाई की हालत भी बिगड़ गई थी। कुछ समय बाद उसकी मौत हो गई। एक अन्य भाई के बारे में बताया गया कि वह जेल से परिवार की मौतों और हालात के सदमे के बाद मानसिक रूप से अस्वस्थ हो गया।
विष्णु के मुताबिक, उनके परिवार में लगातार हुई मौतों के कारण घर पूरी तरह बिखर गया।
2017 में NGO को मिली जानकारी
विष्णु बताते हैं कि 2017 में कैदियों की स्थिति देखने के लिए एक NGO की टीम जेल पहुंची। टीम को उनके बारे में जानकारी मिली, जिसके बाद एक वकील ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में उनका मुकदमा उठाया।
28 जनवरी 2021 को हाईकोर्ट में मामले की सुनवाई हुई। उनके वकील ने अदालत में दलील दी कि विष्णु करीब 20 वर्षों से जेल में हैं और उनके खिलाफ लगाए गए बलात्कार के आरोपों का पर्याप्त आधार नहीं है।
हाईकोर्ट ने FIR और गवाहों के बयानों में बताई विसंगतियां
रिपोर्ट में अदालत के फैसले के हवाले से कहा गया है कि घटना के तीन दिन बाद FIR दर्ज हुई थी और पीड़िता के परिवार तथा गवाहों के बयानों में आपसी मेल नहीं था।
हाईकोर्ट ने विष्णु को दोषमुक्त करते हुए उनकी रिहाई का आदेश दिया।
जेल से निकलने के बाद भी सवाल खत्म नहीं हुए
विष्णु को 3 मार्च 2021 को आगरा जेल से रिहा किया गया। जेल प्रशासन ने उन्हें 500 रुपये देकर रिहा किया था।
रिहाई के समय विष्णु ने जेल अधिकारियों से कहा कि बाहर उनका कोई अपना नहीं बचा है। उनके माता-पिता और भाई सभी की मौत हो चुकी थी।
पांच साल बाद भी जिंदगी संघर्ष में
रिपोर्ट के अनुसार, जेल से बाहर आने के करीब पांच साल बाद भी विष्णु आर्थिक और सामाजिक कठिनाइयों का सामना कर रहे हैं। उनका कहना है कि 20 साल जेल में रहने की जानकारी मिलने के बाद लोग उन्हें काम से निकाल देते हैं। इन दिनों वे लखनऊ में किसी के घर खाना बनाने का काम कर रहे हैं।
विष्णु ने रिपोर्ट में अपनी बेहद निराशाजनक मानसिक स्थिति और आत्महत्या के विचारों का भी जिक्र किया है। उन्होंने कहा कि उन्हें लगता है कि उनकी आजादी का अब कोई अर्थ नहीं है।
20 साल बाद मिला न्याय, लेकिन परिवार वापस नहीं आया
विष्णु की कहानी में अदालत से बरी होने के बाद भी उनके जीवन की कई क्षतियां वापस नहीं आ सकीं। दो दशक जेल में रहने के दौरान परिवार के सदस्य एक-एक कर दुनिया से चले गए और उनका पुराना घर भी जर्जर हो गया।
यह मामला लंबे समय तक चले आपराधिक मुकदमे, जेल में बिताए वर्षों और बरी होने के बाद पुनर्वास से जुड़े सवालों को सामने लाता है।
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