सिंधिया राजघराने की ₹41 हजार करोड़ की संपत्ति का विवाद, 78 साल पुराना ‘द कोवेनेंट’ बना अहम दस्तावेज
ज्योतिरादित्य सिंधिया, वसुंधरा राजे और यशोधरा राजे के बीच पारिवारिक समझौते की कोशिशों के बीच नई कानूनी अड़चन; प्रतिमा देवी ने दायर की कैविएट

ग्वालियर के सिंधिया राजघराने की ₹41 हजार करोड़ से अधिक की अचल संपत्तियों के बंटवारे का मामला जिला कोर्ट में अब और पेचीदा हो गया है। इस विवाद में करीब 78 साल पुराना विलय पत्र यानी ‘द कोवेनेंट’ बेहद महत्वपूर्ण दस्तावेज बनकर सामने आया है। कोर्ट के सामने पेश इस दस्तावेज में मध्य भारत की रियासतों के भारत में विलय, राजघराने की निजी संपत्तियों और तत्कालीन राजाओं को मिलने वाले टैक्स फ्री ‘प्रिवी पर्स’ यानी वार्षिक भत्ते से जुड़ी जानकारी दर्ज होने का दावा किया गया है। इसी दस्तावेज के आधार पर सिंधिया परिवार की संपत्तियों के स्वामित्व और अधिकारों को लेकर चल रही कानूनी बहस को नया आधार मिला है। मामले में केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया की ओर से पारिवारिक समझौते का आवेदन दिया गया था, जिसके तहत उनकी बुआ वसुंधरा राजे और यशोधरा राजे के साथ संपत्तियों के बंटवारे को लेकर सहमति बनाने की कोशिश की जा रही थी। हालांकि, अब स्वर्गीय पद्माराजे सिंधिया की बेटी प्रतिमा देवी ने अदालत में कैविएट दाखिल कर दी है। प्रतिमा देवी का तर्क है कि वह और उनकी बहन रमा राजे अपनी मां पद्माराजे की कानूनी उत्तराधिकारी हैं और प्रस्तावित पारिवारिक समझौते से उनके अधिकार प्रभावित हो सकते हैं। इसलिए उनका पक्ष सुने बिना अदालत कोई अंतिम आदेश पारित न करे। इस विवाद का एक प्रमुख कानूनी पहलू ज्येष्ठाधिकार यानी Rule of Primogeniture और हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम के बीच अधिकारों की व्याख्या से जुड़ा बताया जा रहा है। प्रस्तुत विवरण के अनुसार सिंधिया परिवार की निजी संपत्तियों में ग्वालियर का जयविलास पैलेस परिसर, सख्या विलास, सुसेरा कोठी, कुलेथ कोठी, टेकनपुर रिट्रीट, शिवपुरी का माधव विलास पैलेस, उज्जैन का कालियादेह पैलेस और गुना कोठी समेत कई संपत्तियां शामिल हैं। इसके अलावा मुंबई, दिल्ली, आगरा, झांसी, वाराणसी, ऊटी और पुणे में स्थित संपत्तियों का भी उल्लेख किया गया है। वहीं कई छतरियां और मंदिर निजी ट्रस्टों के प्रबंधन में बताए गए हैं। दूसरी ओर मोती महल पैलेस, गोरखी पैलेस, फूल बाग, जल बिहार, गेंदघर और गद्दी बैरक जैसी कुछ संपत्तियां सरकार को सौंपी गई संपत्तियों में बताई गई हैं। फिलहाल इस पूरे विवाद का केंद्र यह सवाल है कि ऐतिहासिक कोवेनेंट, पारिवारिक समझौते और उत्तराधिकार से जुड़े कानूनी अधिकारों की व्याख्या किस तरह की जाती है। प्रतिमा देवी की कैविएट के बाद अदालत के सामने अब परिवार के सभी संबंधित दावेदारों के अधिकारों पर विचार करने की स्थिति बन गई है।




