पेरेंटिंग: बच्चा शेखी बघारता है और बातों को बढ़ा-चढ़ाकर बताता है, तो क्या करें?
6 साल की उम्र में बढ़ा-चढ़ाकर बोलना कई बार सामान्य विकास का हिस्सा हो सकता है; जानें बच्चे के व्यवहार के पीछे की वजह और बिना डांटे-शर्मिंदा किए उसे सच बोलना कैसे सिखाएं।

सवाल: मेरा 6 साल का बेटा दूसरों के सामने अक्सर शेखी बघारता है। वह बातों को बढ़ा-चढ़ाकर बताता है और कई बार ऐसी बातें भी कह देता है, जो सच नहीं होतीं। क्या इस उम्र में ऐसा व्यवहार सामान्य है? क्या यह कल्पनाशक्ति, अटेंशन पाने की कोशिश, असुरक्षा या पेरेंटिंग से जुड़ा संकेत हो सकता है? हम बिना डांटे उसके इस व्यवहार को कैसे बदलें?
एक्सपर्ट: रिद्धि दोषी पटेल, चाइल्ड एंड पेरेंटिंग साइकोलॉजिस्ट, मुंबई
जवाब
6 साल की उम्र में बच्चों का सामाजिक और भावनात्मक विकास तेजी से हो रहा होता है। इस उम्र में बच्चे यह समझने लगते हैं कि दूसरे लोग उनके बारे में क्या सोचते हैं। इसलिए कई बच्चे खुद को ज्यादा होशियार, ताकतवर या खास दिखाने की कोशिश करते हैं।
वे अपनी बातों को बढ़ा-चढ़ाकर बता सकते हैं या ऐसी बातें भी कह सकते हैं, जो पूरी तरह सच न हों। इसलिए हर बार इसे झूठ या खराब परवरिश मान लेना सही नहीं है।
बच्चा शेखी क्यों बघारता है?
इसके पीछे कई कारण हो सकते हैं। बच्चा ध्यान आकर्षित करना चाहता हो, अपनी पहचान बनाने की कोशिश कर रहा हो या उसे अपने बारे में कम भरोसा महसूस हो रहा हो।
कई बार बच्चा सिर्फ अपनी कल्पनाशक्ति का इस्तेमाल कर रहा होता है। इसलिए पहले यह समझना जरूरी है कि वह जानबूझकर झूठ बोल रहा है या कल्पना और वास्तविकता को मिला रहा है।
हर बढ़ा-चढ़ाकर कही बात झूठ नहीं
5 से 7 साल की उम्र में बच्चों की कल्पनाशक्ति काफी सक्रिय होती है। वे अपनी इच्छाओं, कल्पनाओं और वास्तविक अनुभवों को मिलाकर कहानी बना सकते हैं।
मसलन, बच्चा कहे—“मैं कल चांद पर घूमने गया था”, “मेरे घर में ड्रैगन रहता है” या “मैं सुपरमैन की तरह उड़ सकता हूं”, तो यह उसकी कल्पना हो सकती है।
वहीं अगर वह जानबूझकर अपनी उपलब्धियों को बड़ा दिखाने के लिए कहे कि “मैं स्कूल में हमेशा फर्स्ट आता हूं”, जबकि ऐसा नहीं है, तो इसके पीछे तारीफ पाने या खुद को बेहतर दिखाने की इच्छा हो सकती है।
इसके पीछे क्या मनोविज्ञान हो सकता है?
1. अटेंशन पाने की इच्छा
अगर बच्चे को लगता है कि लोग उसकी बात तभी सुनते हैं, जब वह कुछ असाधारण बताए, तो वह अपनी बातों को बढ़ा सकता है।
2. असुरक्षा
अगर उसे लगता है कि दूसरे बच्चे उससे ज्यादा होशियार या बेहतर हैं, तो वह खुद को बड़ा दिखाने की कोशिश कर सकता है।
3. कम आत्मसम्मान
जिस बच्चे को अपनी खूबियों पर भरोसा कम होता है, वह दूसरों की नजरों में खुद को बड़ा साबित करने की कोशिश कर सकता है।
4. बड़ों की नकल
अगर घर में बड़े लोग अपनी उपलब्धियों को बढ़ा-चढ़ाकर बताते हैं या लगातार दूसरों से तुलना करते हैं, तो बच्चा भी उसी व्यवहार को सीख सकता है।
5. कल्पनाशक्ति
इस उम्र में कल्पना और वास्तविकता के बीच की सीमा कई बार पूरी तरह स्पष्ट नहीं होती। इसलिए बच्चा दोनों को मिलाकर बात कर सकता है।
बच्चे की बात के पीछे छिपी भावना समझें
कई बार बच्चा जब कहता है, “मेरे पास सबसे बड़ा खिलौना है”, तो वह सिर्फ खिलौने की बात नहीं कर रहा होता।
हो सकता है कि वह असल में कहना चाहता हो—
- “मुझे भी नोटिस करो।”
- “मेरी भी तारीफ करो।”
- “मैं भी खास हूं।”
- “मुझे भी स्वीकार करो।”
इसलिए केवल उसके शब्दों पर प्रतिक्रिया देने के बजाय यह समझने की कोशिश करें कि उसके पीछे कौन-सी भावना है।
माता-पिता क्या करें?
1. सबके सामने शर्मिंदा न करें
बच्चे की गलत बात पर लोगों के सामने उसे “झूठा” या “शेखीबाज” न कहें। इससे वह शर्मिंदा और रक्षात्मक हो सकता है।
बाद में अकेले में शांत तरीके से बात करें।
2. सच बोलने पर तारीफ करें
जब बच्चा बिना बढ़ा-चढ़ाकर अपनी बात बताए, तो उसकी ईमानदारी की तारीफ करें। उसे यह महसूस होना चाहिए कि सच बोलने पर भी उसे प्यार और सम्मान मिलेगा।
3. दूसरे बच्चों से तुलना न करें
“देखो, तुम्हारा दोस्त कितना अच्छा है” जैसी बातें बच्चे की असुरक्षा बढ़ा सकती हैं।
4. मेहनत और वास्तविक उपलब्धि की तारीफ करें
सिर्फ यह कहने के बजाय कि “तुम सबसे अच्छे हो”, बच्चे से कहें—“मुझे अच्छा लगा कि तुमने इसके लिए मेहनत की।”
इससे बच्चे को अपनी वास्तविक खूबियों पर भरोसा करना सीखने में मदद मिलेगी।
5. उसकी भावनाओं के बारे में पूछें
बच्चे से शांत तरीके से पूछ सकते हैं—
- “क्या तुम चाहते थे कि सब तुम्हारी तारीफ करें?”
- “उस समय तुम्हें कैसा महसूस हो रहा था?”
- “तुम ऐसा क्यों कहना चाहते थे?”
ऐसे सवाल बच्चे को अपनी भावनाएं समझने और व्यक्त करने में मदद कर सकते हैं।
बच्चे से क्या कहें?
अगर बच्चा बढ़ा-चढ़ाकर बात करे, तो डांटने के बजाय शांत स्वर में कहें—
- “चलो, अब सच वाली कहानी बताते हैं।”
- “मुझे वही सुनना अच्छा लगता है, जो सच में हुआ।”
- “सच बोलने के लिए हिम्मत चाहिए और मुझे तुम पर भरोसा है।”
- “तुम्हें खास बनने के लिए झूठ बोलने की जरूरत नहीं है।”
इस तरह की भाषा बच्चे को डराने के बजाय ईमानदारी और आत्मविश्वास की ओर ले जाती है।
बच्चे का कॉन्फिडेंस कैसे बढ़ाएं?
केवल शेखी बघारने की आदत रोकने पर ध्यान न दें। बच्चे के आत्मविश्वास को मजबूत करना भी जरूरी है।
उसे उसकी वास्तविक खूबियों के लिए सराहें। छोटी-छोटी जिम्मेदारियां दें, उसकी बात ध्यान से सुनें और हर गलती पर आलोचना करने के बजाय उसे सुधारने का मौका दें।
बच्चे को यह भरोसा होना चाहिए कि उसे स्वीकार किए जाने के लिए हर बार खुद को दूसरों से बेहतर साबित करने की जरूरत नहीं है।
कब एक्सपर्ट की सलाह लें?
अगर बच्चा लगातार और लगभग हर परिस्थिति में झूठ बोलता है या बढ़ा-चढ़ाकर बातें करता है, तो इस व्यवहार पर थोड़ा ज्यादा ध्यान देना चाहिए।
खासकर तब, जब—
- वह सच सामने आने के बाद भी अपनी बात पर अड़ा रहे।
- दोस्तों के साथ उसके रिश्ते खराब होने लगें।
- गुस्सा या बेचैनी जैसे दूसरे व्यवहारिक बदलाव दिखाई दें।
- आत्मविश्वास में लगातार कमी नजर आए।
- आदत समय के साथ बढ़ती जाए।
- स्कूल से भी ऐसी शिकायतें आने लगें।
ऐसी स्थिति में चाइल्ड साइकोलॉजिस्ट या पेरेंटिंग एक्सपर्ट से सलाह लेना उपयोगी हो सकता है।
एक्सपर्ट की सलाह
6-7 साल की उम्र में बढ़ा-चढ़ाकर बातें करना कई बार बच्चे के सामान्य विकास का हिस्सा हो सकता है। इसलिए हर बार इसे झूठ या बदतमीजी मानकर डांटना या मारना सही तरीका नहीं है।
माता-पिता अगर बच्चे की बात के पीछे छिपी भावना को समझें, उसे सुरक्षित और स्वीकार करने वाला माहौल दें, सच बोलने के लिए प्रोत्साहित करें और उसकी वास्तविक खूबियों की तारीफ करें, तो धीरे-धीरे यह व्यवहार कम हो सकता है।
बच्चे को बदलने से पहले उसके व्यवहार को समझना ज्यादा जरूरी है।



