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मध्य प्रदेश में निगम-मंडल नियुक्तियां: ग्वालियर-चंबल हावी, सिंधिया गुट को कम तवज्जो

60 नियुक्तियों में क्षेत्रीय और जातीय संतुलन का दावा

मध्य प्रदेश में निगम मंडलों और प्राधिकरणों में अब तक 60 नियुक्तियां हो चुकी हैं। सरकार और संगठन का दावा है कि इन नियुक्तियों में जातिगत और क्षेत्रीय संतुलन साधने की कोशिश की गई, लेकिन जमीनी स्तर पर असंतुलन साफ नजर आ रहा है।

ग्वालियर-चंबल का दबदबा

नियुक्तियों में ग्वालियर-चंबल क्षेत्र का स्पष्ट प्रभाव दिखा है। यहां से अध्यक्ष और सदस्य मिलाकर 18 नेताओं को जगह मिली है। इनमें से अधिकतर नेता केंद्रीय मंत्री Narendra Singh Tomar के समर्थक माने जाते हैं।

Jyotiraditya Scindia गुट को अपेक्षित हिस्सेदारी नहीं

सिंधिया समर्थकों को उम्मीद के मुताबिक पद नहीं मिल पाए। हालांकि कुछ नाम शामिल हुए, लेकिन उनका प्रभाव सीमित रहा। सूत्रों के अनुसार, सिंधिया ने इस मुद्दे पर केंद्रीय नेतृत्व से भी बातचीत की है।

सवर्ण नेताओं को ज्यादा जिम्मेदारी

करीब 17 निगम मंडलों में सवर्ण नेताओं को अध्यक्ष बनाया गया है, जबकि एससी-एसटी वर्ग को सिर्फ 5 जगहों पर मौका मिला। ब्राह्मण और ठाकुर नेताओं की संख्या सबसे अधिक रही। ओबीसी वर्ग को भी प्रतिनिधित्व देने की कोशिश की गई, खासकर यादव, कुशवाहा और बघेल समुदाय से।

महिलाओं की भागीदारी सीमित

महिला प्रतिनिधित्व अपेक्षाकृत कम रहा। कुछ पदों पर ओबीसी और एसटी वर्ग की महिला नेताओं को जिम्मेदारी दी गई, लेकिन कुल संख्या कम है।

चुनावी रणनीति से जुड़ी नियुक्तियां

राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक ये नियुक्तियां आगामी नगरीय निकाय, पंचायत चुनाव और 2028 विधानसभा चुनाव को ध्यान में रखकर की गई हैं। 2023 में टिकट से वंचित या कम अंतर से हारने वाले नेताओं को इन पदों के जरिए सक्रिय रखा जा रहा है।

क्षेत्रीय असंतुलन भी स्पष्ट

जहां ग्वालियर-चंबल को ज्यादा तवज्जो मिली, वहीं महाकौशल, बुंदेलखंड, मालवा और विंध्य क्षेत्रों को अपेक्षाकृत कम प्रतिनिधित्व मिला। इससे क्षेत्रीय असंतोष की संभावना भी जताई जा रही है।

गुटबाजी से अटकी कुछ नियुक्तियां

इंदौर और भोपाल जैसे बड़े शहरों में गुटबाजी और तालमेल की कमी के कारण कई नियुक्तियां अभी तक लंबित हैं। स्थानीय नेताओं, विधायकों और संगठन के बीच सहमति नहीं बन पा रही है।

“डुअल कंट्रोल मॉडल” की चर्चा

इन नियुक्तियों में राज्य और केंद्र दोनों की भूमिका रही है। अंतिम फैसलों पर केंद्रीय नेतृत्व की मुहर लगी, जिसे राजनीतिक जानकार “डुअल कंट्रोल मॉडल” बता रहे हैं।

👉 कुल मिलाकर, ये नियुक्तियां सिर्फ प्रशासनिक नहीं बल्कि गहरे राजनीतिक समीकरणों और चुनावी रणनीति का हिस्सा मानी जा रही हैं।

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