बैगा आदिवासी इलाकों में बच्चों की मौत का आंकड़ा बढ़ने का दावा, 9 गांवों में 21 मौतों की पड़ताल
सरकारी आंकड़ों में 8 मौतें, जमीनी पड़ताल में 21 बच्चों की मौत का दावा; स्वास्थ्य सुविधाओं, टीकाकरण और साफ पानी की कमी को लेकर गंभीर सवाल

बालाघाट, 15 अगस्त। मध्य प्रदेश के बालाघाट जिले के बिरसा ब्लॉक के बैगा आदिवासी बहुल इलाकों में बच्चों की लगातार हो रही मौतों ने स्वास्थ्य व्यवस्था को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार क्षेत्र में अज्ञात बीमारी से बच्चों के बीमार होने और मौतों का मामला सामने आया है, जबकि बीमारी की वास्तविक वजह अभी स्पष्ट नहीं हो पाई है। हालिया मीडिया रिपोर्टों में सरकारी स्तर पर कम से कम 7 से 8 बच्चों की मौत की जानकारी सामने आई है, वहीं स्थानीय परिवारों और जमीनी पड़ताल के आधार पर पिछले कुछ महीनों में 9 गांवों के 19 परिवारों में 21 बच्चों की मौत होने का दावा किया गया है। कई परिवारों का कहना है कि बच्चों को बुखार, शरीर पर दाने या घाव, उल्टी-दस्त, कमजोरी और अन्य गंभीर लक्षणों के बाद इलाज के लिए दूर-दराज के अस्पतालों में ले जाना पड़ा, लेकिन कई मामलों में समय पर उपचार नहीं मिल सका। मछूलदा गांव की बतिया बाई के चार वर्षीय बेटे की जुलाई में बीमारी के बाद मौत होने का मामला भी सामने आया है। परिवार के अनुसार बच्चे के शरीर पर दाने निकल आए थे और उसे उल्टी-दस्त की शिकायत थी। हालत बिगड़ने के बाद उसे स्थानीय स्तर पर इलाज दिलाने का प्रयास किया गया, लेकिन उसकी जान नहीं बच सकी। इसी तरह बोंदारी गांव में पांच वर्षीय सचिन की तबीयत बिगड़ने के बाद परिवार उसे पहले बालाघाट और फिर महाराष्ट्र के गोंदिया स्थित निजी अस्पताल लेकर गया, जहां इलाज के दौरान उसकी मौत हो गई। परिवार का दावा है कि इलाज के लिए उन्हें कर्ज तक लेना पड़ा। ग्रामीणों ने स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी, डॉक्टरों की अनुपलब्धता, खराब रास्तों और पीने के साफ पानी की समस्या को लेकर भी चिंता जताई है। कुछ गांवों में लोगों के दूषित या असुरक्षित जलस्रोतों पर निर्भर रहने की बात सामने आई है। गटिया गांव में सात वर्षीय बच्ची की इलाज के लिए ले जाते समय रास्ते में मौत होने का दावा भी किया गया है, जबकि परिवार के अन्य बच्चों के बीमार होने की बात सामने आई है। कोण्डेकसा गांव में एक बच्चे की मौत मलेरिया के दौरान होने की जानकारी दी गई। दूसरी ओर, स्वास्थ्य विभाग और प्रशासन की ओर से प्रभावित क्षेत्रों में स्वास्थ्य टीमों को भेजकर बच्चों की जांच और उपचार का काम किया जा रहा है। हालिया रिपोर्टों के मुताबिक विशेषज्ञों ने पोषण की स्थिति और दूषित पानी की संभावना को भी जांच के दायरे में रखा है तथा बीमार बच्चों के नमूने जांच के लिए पुणे की प्रयोगशाला भेजे गए हैं। प्रभावित गांवों में स्वास्थ्य शिविर लगाने और घर-घर बच्चों की जांच करने की कार्रवाई भी की जा रही है। इस पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल बीमारी के कारण और मौतों की वास्तविक संख्या को लेकर है। यदि जमीनी स्तर पर सामने आ रहे आंकड़े सरकारी रिकॉर्ड से अलग हैं, तो प्रत्येक मौत का सत्यापन, मेडिकल रिकॉर्ड की जांच और मृत्यु के कारण का वैज्ञानिक परीक्षण जरूरी हो जाता है। साथ ही दूरस्थ आदिवासी गांवों में नियमित डॉक्टर, दवाइयां, टीकाकरण, सुरक्षित पेयजल, पोषण और समय पर एंबुलेंस जैसी बुनियादी स्वास्थ्य सुविधाओं की उपलब्धता सुनिश्चित करना भी बेहद जरूरी है। फिलहाल विशेषज्ञ जांच और आधिकारिक रिपोर्ट का इंतजार है, जिससे यह स्पष्ट हो सकेगा कि बच्चों में बीमारी का वास्तविक कारण क्या है और क्षेत्र में मौतों के पीछे कौन-कौन से स्वास्थ्य एवं सामाजिक कारण जिम्मेदार हैं।




