गाजे-बाजे के साथ निकली गंगेश्वर पार्श्वनाथ की सवारी, भक्ति गीतों से गूंजा शिवबाड़ी
150 वर्ष पुराने गंगेश्वर पार्श्वनाथ जिनालय में पूजा के बाद निकला वरघोड़ा; प्राचीन तालाब पर हुई शांति सनात्र पूजा, स्वामी विमर्शानंद गिरि ने नारियल भेंट कर निभाई पुरानी परंपरा।

बीकानेर। शिवबाड़ी में शनिवार को धार्मिक आस्था, भक्ति और सद्भाव का अनूठा संगम देखने को मिला। करीब 150 वर्ष पुराने गंगेश्वर पार्श्वनाथ जिनालय में सुबह भक्ति संगीत के बीच भगवान गंगेश्वर पार्श्वनाथ की पूजा-अर्चना की गई। इसके बाद भगवान की सुसज्जित पालकी को गाजे-बाजे के साथ मंदिर से प्राचीन तालाब तक ले जाते हुए वरघोड़ा निकाला गया।
साधु-साध्वियों के सान्निध्य और श्रद्धालुओं की मौजूदगी में निकली सवारी प्राचीन तालाब तक पहुंची, जहां विधि-विधान से शांति सनात्र पूजा की गई। आयोजन सुगनजी महाराज का उपासरा ट्रस्ट के तत्वावधान में सकल श्री संघ के सहयोग से हुआ।
भक्ति भाव से सवारी में शामिल हुए श्रद्धालु
मंदिर से तालाब तक का पूरा मार्ग धार्मिक उल्लास से सराबोर नजर आया। श्रद्धालु भक्ति भाव के साथ सवारी में शामिल हुए। तालाब पर पूजा-अर्चना के बाद भगवान की सवारी वापस जिनालय पहुंची।
आयोजन में साध्वी सुरंजना की शिष्याएं साध्वी मुक्तांजना, सुरक्षाजना, सौम्यजना, चिलेहांजना एवं चितक्खरांजना का सान्निध्य रहा।
स्वामी विमर्शानंद गिरि ने निभाई पुरानी परंपरा
आयोजन के दौरान शिवबाड़ी के लालेश्वर महादेव मंदिर के अधिष्ठाता स्वामी विमर्शानंद गिरि ने पुरानी परंपरा का निर्वहन करते हुए भगवान गंगेश्वर पार्श्वनाथ का वंदन किया और सवारी में नारियल भेंट किया।
जैन धार्मिक आयोजन के दौरान विभिन्न धार्मिक परंपराओं की यह सहभागिता सद्भाव और आपसी सम्मान की खूबसूरत तस्वीर बनी।
भक्ति गीतों से गूंजा मंदिर परिसर
भक्ति संगीत कार्यक्रम में वरिष्ठ गायक सुनील पारख, पप्पू बांठिया और राजेश नाहटा ने भक्ति गीतों की प्रस्तुतियां दीं। भजनों की धुन के बीच श्रद्धालु भगवान पार्श्वनाथ की आराधना में लीन नजर आए।
150 साल पुराना जिनालय, आज भी कायम है परंपरा
गंगेश्वर पार्श्वनाथ जिनालय शिवबाड़ी की प्राचीन धार्मिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा है। करीब डेढ़ सदी पुराने इस जिनालय में पूजा-अर्चना, सवारी और सामूहिक धार्मिक आयोजनों की परंपरा आज भी जारी है।
वरघोड़े के माध्यम से भगवान को मंदिर से प्राचीन तालाब तक ले जाकर शांति सनात्र पूजा करना इस आयोजन की विशेष धार्मिक परंपरा रही है। जैन परंपरा में सनात्र पूजा को तीर्थंकर भगवान के जन्माभिषेक के भाव से जुड़ी पवित्र पूजा माना जाता है।




