मछली पालन में क्रांति, 80% तक पानी बचाने वाली तकनीक पर जोर
बायोफ्लॉक तकनीक से कम पानी में अधिक उत्पादन, 122 उद्यमियों को दिया गया व्यावहारिक प्रशिक्षण

लुधियाना | मछली पालन के क्षेत्र में जल संरक्षण और आधुनिक तकनीक को बढ़ावा देने के उद्देश्य से गुरु अंगद देव वेटरनरी एंड एनिमल साइंसेज यूनिवर्सिटी (गडवासू), लुधियाना के कॉलेज ऑफ फिशरीज में बायोफ्लॉक आधारित जलीय प्रौद्योगिकियों पर तीन दिवसीय क्षमता निर्माण प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किया गया। इसमें पंजाब के 5 जिलों से 122 संभावित उद्यमियों ने भाग लिया, जिनमें 70 ग्रामीण महिलाएं भी शामिल रहीं।
इस प्रशिक्षण कार्यक्रम का उद्देश्य प्रतिभागियों को बायोफ्लॉक तकनीक के मूल सिद्धांतों से अवगत कराना और व्यावहारिक प्रशिक्षण प्रदान करना था। बायोफ्लॉक एक जल संरक्षण आधारित आधुनिक तकनीक है, जो पारंपरिक मछली पालन की तुलना में प्रति किलोग्राम मछली उत्पादन के लिए केवल 10 से 15 प्रतिशत पानी का उपयोग करती है। इस तकनीक से 75 से 80 प्रतिशत तक पानी की बचत संभव है।
भारत सरकार का मत्स्य पालन विभाग प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना के तहत राज्यों के मत्स्य पालन विभागों के माध्यम से इस तकनीक को प्रोत्साहित कर रहा है, ताकि कम लागत और कम संसाधनों में अधिक उत्पादन सुनिश्चित किया जा सके।
कॉलेज ऑफ फिशरीज की डीन डॉ. मीरा डी. आंसल ने बताया कि कॉलेज में क्षमता निर्माण संसाधन केंद्र स्थापित किया गया है, जिससे पंजाब और उत्तर-पश्चिमी पड़ोसी राज्यों के हितधारकों की प्रशिक्षण आवश्यकताओं को पूरा किया जा सके।
प्रशिक्षण कार्यक्रम का संयोजन डॉ. वनीत इंदर कौर ने किया। उन्होंने बायोफ्लॉक यूनिट की स्थापना, सतत उत्पादन, जैव-सुरक्षा, मछली एवं झींगा उत्पादन, पानी की गुणवत्ता परीक्षण, आहार प्रबंधन और स्वास्थ्य प्रबंधन से जुड़े व्यावहारिक सत्र आयोजित किए।
प्रतिभागियों को दो दिन मत्स्य पालन विभाग, पंजाब के प्रदर्शन फार्म एवं प्रशिक्षण केंद्र ईना खेड़ा (श्री मुक्तसर साहिब) में तथा एक दिन विश्वविद्यालय के क्षमता निर्माण संसाधन केंद्र में प्रशिक्षण दिया गया।
विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. जतिंदर पाल सिंह गिल ने कहा कि यह तकनीक न केवल जल संरक्षण को बढ़ावा देती है, बल्कि पर्यावरण संरक्षण, खाद्य सुरक्षा और वैज्ञानिक मत्स्य पालन के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है।
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