सुभाष चंद्रा बोले- ₹22 हजार करोड़ के कर्ज पर भ्रम फैलाया गया
लाइव आकर 3 पन्नों का दस्तावेज दिखाते हुए दावा—मेरी निजी उधारी शून्य, ₹22 हजार करोड़ की रकम पर्सनल गारंटी से जुड़ी; NCLT के ₹6.5 करोड़ वाले निपटारे पर विवाद

जी ग्रुप के फाउंडर सुभाष चंद्रा ने ₹22 हजार करोड़ से जुड़े कर्ज विवाद पर सोशल मीडिया लाइव के जरिए सफाई देते हुए दावा किया कि मामले को लेकर गलतफहमियां और भ्रामक धारणाएं फैलाई जा रही हैं। चंद्रा ने तीन पन्नों का दस्तावेज दिखाते हुए कहा कि उन्होंने व्यक्तिगत रूप से कोई ₹22 हजार करोड़ का कर्ज नहीं लिया था और उनकी निजी उधारी शून्य है, जबकि यह राशि उन कंपनियों के कर्ज के लिए दी गई पर्सनल गारंटी से जुड़ी थी जिनके लिए उन्होंने गारंटर की भूमिका निभाई थी। उनके मुताबिक कुल ₹22 हजार करोड़ की पर्सनल गारंटी में मूल कर्ज लेते समय करीब ₹4,800 करोड़ की गारंटी दी गई थी, जबकि बाकी गारंटी कंपनियों के डिफॉल्ट के बाद सामने आई। चंद्रा की ओर से जारी आंकड़ों के अनुसार करीब ₹4,808 करोड़ के डिस्बर्समेंट में से ₹3,803 करोड़ की रकम वापस की जा चुकी है और लगभग ₹998 करोड़ मूल बकाया बचता है। उन्होंने यह भी दावा किया कि बैंकों की ओर से ₹5,311 करोड़ के दावे में से ₹1,049 करोड़ का निपटारा या भुगतान हो चुका है और करीब ₹4,262 करोड़ का दावा बाकी है, जिसे संबंधित उधारकर्ताओं के साथ खातों का मिलान करने के बाद निपटाने का भरोसा दिया गया है। यह विवाद तब और चर्चा में आया जब कारोबारी विजय माल्या ने NCLT के फैसले पर सवाल उठाते हुए ₹22 हजार करोड़ के कर्ज के मुकाबले बेहद कम राशि में मामले के निपटारे पर आपत्ति जताई। NCLT ने सुभाष चंद्रा के व्यक्तिगत इंसॉल्वेंसी मामले में ₹22,006.57 करोड़ के कुल क्लेम के मुकाबले ₹6.5 करोड़ के रीपेमेंट प्लान को मंजूरी दी है। मामले में कुछ कर्जदाताओं ने इस योजना का विरोध भी किया था, जबकि NCLT के बहुमत के आधार पर योजना को मंजूरी दी गई। चंद्रा की ओर से यह भी स्पष्ट किया गया कि ₹22 हजार करोड़ की रकम को सीधे उनकी व्यक्तिगत उधारी बताना सही नहीं है, क्योंकि इसमें विभिन्न कंपनियों के कर्ज पर दी गई व्यक्तिगत गारंटियों के दावे शामिल हैं। वहीं उनके खिलाफ आपत्ति जताने वाले कुछ लेनदारों ने रिकवरी की कम राशि और योजना की व्यवहारिकता पर सवाल उठाए हैं। पूरे मामले में अहम बात यह है कि व्यक्तिगत गारंटी के निपटारे और मूल कंपनियों के कर्ज की वसूली को अलग-अलग समझना जरूरी है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार मूल कर्जदार कंपनियों के खिलाफ लेनदारों के अधिकार पूरी तरह समाप्त नहीं होते और बैंक उनकी संपत्तियों, सिक्योरिटी और अन्य माध्यमों से वसूली की प्रक्रिया जारी रख सकते हैं। ऐसे में ₹22 हजार करोड़ के आंकड़े और ₹6.5 करोड़ के निपटारे को लेकर चल रहे विवाद में सुभाष चंद्रा का पक्ष यह है कि ₹22 हजार करोड़ उनकी निजी उधारी नहीं थी, जबकि उनके आलोचक और कुछ लेनदार इस प्रक्रिया से बैंकों और वित्तीय संस्थानों की संभावित रिकवरी को लेकर सवाल उठा रहे हैं। मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह कॉरपोरेट गारंटी, व्यक्तिगत दिवालियापन और कर्ज निपटारे की प्रक्रिया से जुड़े बड़े सवालों को सामने लाता है।




