झारखंड में MMDR एक्ट के खिलाफ सरकार सुप्रीम कोर्ट जाएगी, महाधिवक्ता ने दी कानूनी राय
खनिज संसाधनों, रॉयल्टी और राजस्व हिस्सेदारी पर केंद्र-राज्य विवाद; संवैधानिक और वित्तीय अधिकारों की रक्षा का दावा

झारखंड सरकार ने माइंस एंड मिनरल्स (डेवलपमेंट एंड रेगुलेशन) एक्ट (MMDR Act) से जुड़े विवाद को लेकर सुप्रीम कोर्ट जाने की तैयारी तेज कर दी है। राज्य सरकार का कहना है कि वह अपने संवैधानिक और वित्तीय अधिकारों की रक्षा के लिए इस मामले को शीर्ष अदालत के सामने रखेगी। सुप्रीम कोर्ट में अपील दाखिल करने से पहले सरकार ने मामले के सभी कानूनी पहलुओं पर महाधिवक्ता से राय मांगी थी, जिसे महाधिवक्ता ने अब सरकार को सौंप दिया है। कानूनी विशेषज्ञों और वरिष्ठ अधिवक्ताओं की टीम ने एक्ट से जुड़े दस्तावेजों और संवैधानिक प्रावधानों का विस्तृत अध्ययन करने के बाद अपनी रिपोर्ट तैयार की है। इसमें खनिज संसाधनों पर राज्यों के अधिकार, खनिजों से मिलने वाली रॉयल्टी, राजस्व में हिस्सेदारी और केंद्र-राज्य के बीच शक्तियों के बंटवारे से जुड़े प्रावधानों की व्याख्या की गई है। सरकार का मुख्य तर्क है कि राज्य की भौगोलिक सीमा के भीतर मौजूद खनिज संपदा से होने वाले राजस्व में राज्य के अधिकारों की अनदेखी नहीं की जा सकती। खनिजों से मिलने वाली रॉयल्टी, कर निर्धारण और खनन पट्टों से जुड़े अधिकारों को लेकर केंद्र और राज्य के बीच विवाद की स्थिति बनी हुई है। झारखंड सरकार का मानना है कि खनिज संपदा राज्य के प्राकृतिक संसाधनों का महत्वपूर्ण हिस्सा है और इससे मिलने वाले आर्थिक लाभ में राज्य की भूमिका और अधिकार सुनिश्चित किए जाने चाहिए। महाधिवक्ता की कानूनी राय मिलने के बाद अब सरकार सुप्रीम कोर्ट में अपना पक्ष मजबूती से रखने की तैयारी कर रही है। इस मामले का सीधा असर राज्य के खनन राजस्व और केंद्र-राज्य वित्तीय संबंधों से जुड़े अधिकारों पर पड़ सकता है। सरकार का कहना है कि शीर्ष अदालत में संवैधानिक प्रावधानों के आधार पर अपना पक्ष रखा जाएगा और राज्य के हितों तथा वित्तीय अधिकारों की रक्षा के लिए कानूनी लड़ाई लड़ी जाएगी।




