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पैरों में दो बार चोट, रात की नौकरी के बाद ट्रेनिंग: जयपुर के सूरज मीणा ने 122 KM की लद्दाख दौड़ 12 घंटे 35 मिनट में पूरी की

जयपुर के सूरज मीणा ने लद्दाख में जीता सिल्वर, 122 KM दौड़ 12 घंटे 35 मिनट में पूरी

जयपुर के अल्ट्रा रनर सूरज मीणा ने लद्दाख में आयोजित 122 किलोमीटर की Silk Route Ultra (SRU) दौड़ में रजत पदक जीतकर अपनी लंबी संघर्षपूर्ण खेल यात्रा में एक और उपलब्धि जोड़ दी। सूरज ने यह दूरी 12 घंटे 35 मिनट में पूरी की और नॉन-लद्दाखी प्रतिभागियों में पहले स्थान पर रहे।

इस प्रदर्शन के लिए उन्हें रजत पदक, ट्रॉफी और ₹3.50 लाख की पुरस्कार राशि मिली।

दो बार चोट लगी, फिर भी ट्रेनिंग जारी रखी

सूरज की इस उपलब्धि के पीछे सिर्फ दौड़ की तैयारी नहीं, बल्कि चोट से वापसी का संघर्ष भी रहा। ट्रेनिंग के दौरान उन्हें दो बार पैर में चोट लगी।

पहली बार उन्हें IT बैंड से जुड़ी परेशानी हुई। फिजियोथेरेपिस्ट ने उन्हें दौड़ कम करने और रिकवरी के लिए ज्यादा समय देने की सलाह दी। सूरज ने ट्रेनिंग पूरी तरह बंद करने के बजाय उसकी तीव्रता कम की और धीरे-धीरे अपनी क्षमता के अनुसार अभ्यास जारी रखा।

इसके बाद उन्हें शिन स्प्लिंट की समस्या हुई। उनका कहना है कि उस समय 2-3 किलोमीटर दौड़ने के बाद इतना दर्द होता था कि पैर उठाना भी मुश्किल हो जाता था।

आखिरकार उन्होंने नौकरी छोड़कर कुछ समय पूरी तरह रिकवरी और ट्रेनिंग पर ध्यान दिया।

रात में बर्गर किंग की नौकरी, सुबह दौड़ की ट्रेनिंग

सूरज की कहानी का एक अहम हिस्सा उनका नौकरी और खेल को साथ लेकर चलना भी है। कोविड के बाद जयपुर आने पर आर्थिक जरूरतों के कारण उन्होंने बर्गर किंग में नाइट शिफ्ट में काम किया।

उनकी ड्यूटी शाम 7 बजे से सुबह 5 बजे तक रहती थी। शिफ्ट खत्म होते ही वह सुबह ट्रेनिंग के लिए निकल जाते थे।

नींद पूरी नहीं होने के कारण कई बार उन्हें परेशानी हुई। सूरज के मुताबिक, एक बार दौड़ते समय उन्हें नींद आ गई और वह एक खंभे से टकराकर गिर गए।

करीब दो साल तक उन्होंने नौकरी और ट्रेनिंग का यह मुश्किल रूटीन जारी रखा।

राजस्थान में नाहरगढ़ की पहाड़ियों पर तैयारी

लद्दाख में दौड़ के दौरान ऊंचाई सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक होती है। राजस्थान के मैदानी और गर्म वातावरण से अलग लद्दाख में ऊंचाई के कारण शरीर पर अलग तरह का दबाव पड़ता है।

सूरज ने इसके लिए जयपुर के नाहरगढ़ में पहाड़ी ट्रेनिंग की। वह सप्ताह में करीब दो दिन वहां जाकर चढ़ाई और दौड़ का अभ्यास करते थे।

उनके मुताबिक, इससे ऊंचाई वाले इलाके में दौड़ने की तैयारी में मदद मिली।

शुरुआत बॉक्सिंग से हुई थी

सूरज को जयपुर में ‘सूरज बॉक्सर’ के नाम से भी जाना जाता है। उन्होंने वर्ष 2014 में बॉक्सिंग शुरू की थी और राज्य स्तर पर दो पदक भी जीते।

कोविड महामारी के दौरान स्टेडियम लंबे समय तक बंद रहे। इसके बाद उनकी बॉक्सिंग की ट्रेनिंग छूट गई और उन्होंने दौड़ना शुरू किया।

गांव में खाली समय के दौरान शुरू हुई रनिंग धीरे-धीरे उनकी दिनचर्या और फिर जुनून बन गई। पहाड़ी इलाके में दौड़ और चढ़ाई ने उनकी endurance बढ़ाने में भी भूमिका निभाई।

2024 में जयपुर से साइकिल चलाकर पहुंचे थे लद्दाख

सूरज की एडवेंचर स्पोर्ट्स से जुड़ी उपलब्धियां सिर्फ रनिंग तक सीमित नहीं हैं। वर्ष 2024 में उन्होंने जयपुर से मनाली होते हुए करीब 2,400 किलोमीटर की साइकिल यात्रा लगभग 12 दिनों में पूरी की और लद्दाख पहुंचे।

इसके बाद उन्होंने लद्दाख से कश्मीर के रास्ते वापस जयपुर तक करीब 1,500 किलोमीटर की साइकिल यात्रा भी लगभग 12 दिनों में पूरी की।

लद्दाख मैराथन में तीसरी बार भागीदारी

सूरज ने बताया कि यह लद्दाख मैराथन में उनकी तीसरी भागीदारी थी।

उन्होंने 2022 में फुल मैराथन में हिस्सा लिया था। इसके बाद पिछले साल Khardung La Challenge रेस में भी दौड़े।

इस बार उन्होंने 122 किलोमीटर की Silk Route Ultra में हिस्सा लिया और 12 घंटे 35 मिनट में रेस पूरी की।

सूरज बोले- मुकाबला दूसरे रनर से नहीं, खुद से था

122 किलोमीटर की दौड़ के दौरान सूरज का मुख्य लक्ष्य किसी एक प्रतिद्वंद्वी को हराना नहीं, बल्कि अपने निर्धारित समय में रेस पूरी करना था।

उनके कोच महेश द्विवेदी ने भी उनकी तैयारी को इसी लक्ष्य के अनुसार आगे बढ़ाया। सूरज का लक्ष्य था कि वह दौड़ को करीब 13 से 14 घंटे के भीतर पूरा करें। उन्होंने इससे भी कम समय में इसे पूरा किया।

परिवार भी अब खेल को देखने लगा अलग नजर से

सूरज के मुताबिक, शुरुआत में परिवार चाहता था कि वह सरकारी नौकरी की तैयारी करें। आसपास के लोग भी खेल में करियर बनाने के उनके फैसले को लेकर सवाल उठाते थे।

उनके अनुसार, उनके क्षेत्र से खेलों में आने वाले वह शुरुआती लोगों में से हैं। रजत पदक और लद्दाख में प्रदर्शन के बाद परिवार का नजरिया बदला है।

सूरज का कहना है कि अब परिवार को भी लगने लगा है कि खेल के जरिए पहचान और करियर बनाया जा सकता है।

उनकी कहानी चोट, आर्थिक संघर्ष, नौकरी, नींद की कमी और लगातार ट्रेनिंग के बीच लक्ष्य पर टिके रहने की मिसाल पेश करती है।


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