13 एमएम बारिश में ही चोक हुआ सिस्टम
‘पाताल तोड़’ कुएं सालभर में फेल, न जलभराव रुका न भूजल बढ़ा

13 एमएम बारिश में ही चोक हुआ सिस्टम
‘पाताल तोड़’ कुएं फेल, करोड़ों खर्च के बाद भी जलभराव से नहीं मिली राहत
बीकानेर में मानसून आने से पहले ही नगर निगम और बीकानेर विकास प्राधिकरण के जलभराव मुक्ति दावों की पोल खुल गई है। शहर को बारिश में डूबने से बचाने के लिए पिछले साल आनन-फानन में बनाए गए 14 ‘पाताल तोड़’ कुएं पहली ही बड़ी बारिश में फेल साबित हुए हैं। महज 13 एमएम बारिश ने इन कुओं की तकनीक, सफाई व्यवस्था और रखरखाव की हकीकत उजागर कर दी है।
नगर निगम और बीडीए ने दावा किया था कि शहर के जलभराव वाले प्रमुख पॉइंट्स पर ये कुएं बनाकर बारिश के पानी की निकासी तेज की जाएगी और भूजल स्तर भी सुधारा जाएगा। लेकिन हालात इसके उलट नजर आए। कुछ दिन पहले हुई बारिश के 24 घंटे बाद भी मेडिकल कॉलेज सर्किल, पवनपुरी और अन्य इलाकों में पानी जमा रहा। इससे साफ हो गया कि करोड़ों की लागत से बने ये ‘पाताल तोड़’ कुएं फिलहाल शो-पीस बनकर रह गए हैं।
कचरे से चोक हुए फिल्टर, 20 फीसदी क्षमता भी नहीं दिखी
शहर में बनाए गए इन कुओं की सबसे बड़ी कमजोरी उनका चोक फिल्टर सिस्टम बन गया है। बारिश के साथ बहकर आया कचरा, कीचड़ और सिल्ट फिल्टर पर जम गया, जिससे अधिकांश कुएं अपनी क्षमता का 20 फीसदी पानी भी नहीं सोख पाए।
सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि नगर निगम कार्यालय परिसर में बना ‘पाताल तोड़’ कुआं भी खुद जलभराव से जूझता नजर आया। वहीं पवनपुरी में नागणेचीजी मंदिर के पास बने कुएं के आसपास जमीन धंसने लगी है, जिससे किसी बड़े हादसे का खतरा पैदा हो गया है।
तकनीकी जानकारों का कहना है कि बीकानेर की मिट्टी और यहां के कचरा मिश्रित बहाव को देखते हुए इन कुओं में मल्टी-लेयर फिल्टर सिस्टम जरूरी था, लेकिन मौजूदा डिजाइन में यह व्यवस्था कमजोर साबित हुई। नतीजतन ऊपरी फिल्टर परत पूरी तरह बंद हो चुकी है और पानी नीचे नहीं जा पा रहा।
3 साल का मेंटेनेंस ठेका, फिर सफाई क्यों नहीं?
नगर निगम ने अपने 7 ‘पाताल तोड़’ कुओं के रखरखाव के लिए 3 साल का मेंटेनेंस कॉन्ट्रैक्ट दिया था। शर्त यह थी कि बारिश से पहले नियमित डी-सिल्टिंग और सफाई की जाएगी, ताकि बारिश का पानी बिना रुकावट नीचे जा सके।
लेकिन हालिया बारिश के बाद जो तस्वीर सामने आई, उसने इन दावों पर सवाल खड़े कर दिए। कुओं के आसपास जमा कीचड़ और मलबा साफ बता रहा है कि सफाई कागजों में हुई, जमीन पर नहीं। सवाल उठ रहा है कि जब मेंटेनेंस का ठेका पहले से था, तो बारिश से पहले सफाई क्यों नहीं करवाई गई?
ड्रेनेज मास्टर प्लान नहीं, इसलिए ‘शॉर्टकट’ बना पाताल तोड़ मॉडल
बीकानेर में जलभराव की असली समस्या शहर में मजबूत ड्रेनेज सिस्टम का अभाव है। शहर की अधिकांश मुख्य सड़कों के किनारे न तो पक्के नाले हैं और न ही व्यवस्थित नालियां। ऐसे में बारिश का पानी और कचरा सीधे सीवरेज लाइनों में पहुंचता है, जिससे लाइनें चोक हो जाती हैं और गंदा पानी सड़कों पर भरने लगता है।
नया ड्रेनेज सिस्टम बनाना महंगा और लंबी प्रक्रिया वाला काम है। यही कारण है कि प्रशासन ने ‘पाताल तोड़’ कुओं को एक त्वरित समाधान के रूप में अपनाया। लेकिन अब यह प्रयोग ही सवालों के घेरे में है।
पुराने फेल, अब 14 नए कुओं की तैयारी
सबसे हैरानी की बात यह है कि पुराने 14 कुओं की विफलता का तकनीकी विश्लेषण किए बिना अब 14 और नए ‘पाताल तोड़’ कुएं बनाने की तैयारी शुरू हो गई है। इसके लिए फाइल तैयार हो चुकी है और जल्द टेंडर प्रक्रिया शुरू होने की संभावना है।
अब बड़ा सवाल यह है कि जब पहले बने कुएं ही जलभराव रोकने में नाकाम रहे, तो करोड़ों रुपए खर्च कर बनने वाले नए कुएं शहर को राहत देंगे या फिर टैक्सदाताओं का पैसा एक बार फिर ‘पाताल’ में जाएगा।
जवाबदेही तय कब होगी?
अब जनता के बीच कई सवाल खड़े हो रहे हैं। बारिश से पहले डी-सिल्टिंग क्यों नहीं हुई? पवनपुरी में जमीन धंसने का जिम्मेदार कौन है? क्या निर्माण सामग्री और डिजाइन की तकनीकी जांच होगी? क्या नए कुएं बनाने से पहले पुरानी खामियां सुधारी जाएंगी? और सबसे बड़ा सवाल—जनता के टैक्स के पैसे से हुए इस प्रयोग की जवाबदेही आखिर तय कब होगी?
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