पंजाब

अस्थमा-एलर्जी का डबल अटैक, रोजाना 25 बच्चे पहुंच रहे अस्पताल

बढ़ते प्रदूषण और बदलते मौसम से बच्चों की सांस पर असर, डॉक्टरों ने अभिभावकों को किया सतर्क

लुधियाना | शहर में बढ़ते प्रदूषण और बदलते मौसम का सीधा असर अब बच्चों की सेहत पर दिखने लगा है। लुधियाना के सिविल अस्पताल के बाल रोग विभाग में इन दिनों सांस से जुड़ी समस्याओं वाले बच्चों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। आंकड़ों के अनुसार, रोजाना औसतन 5 बच्चे अस्थमा के लक्षणों के साथ और 15 से 20 बच्चे श्वसन संबंधी एलर्जी की शिकायत लेकर ओपीडी पहुंच रहे हैं।

विश्व अस्थमा दिवस के मौके पर बाल रोग विशेषज्ञों ने अभिभावकों को विशेष सतर्कता बरतने की सलाह दी है। विशेषज्ञों के अनुसार लुधियाना का बढ़ता वायु गुणवत्ता सूचकांक बच्चों के कोमल फेफड़ों के लिए गंभीर खतरा बनता जा रहा है। खासकर अप्रैल और मई के महीनों में अस्थमा और एलर्जी के मामलों में अधिक बढ़ोतरी देखी जा रही है।

डॉक्टरों का कहना है कि गेहूं के भूसे और धूल से फैलने वाला प्रदूषण बच्चों में सांस की बीमारियों को बढ़ा रहा है। अस्पताल पहुंच रहे 15 से 20 बच्चों में धूल, धुएं और प्रदूषण से होने वाली एलर्जी पाई जा रही है, जो समय पर इलाज न मिलने पर भविष्य में अस्थमा का रूप ले सकती है।

विशेषज्ञों के अनुसार अप्रैल-मई में गेहूं के भूसे और अक्टूबर-नवंबर में धान की पराली के कारण हवा में प्रदूषण बढ़ जाता है, जिससे सांस के मरीजों की संख्या बढ़ती है। इसके अलावा पालतू कुत्ते और बिल्ली के बाल ही नहीं, बल्कि उनकी त्वचा के मृत कण, लार और पेशाब में मौजूद प्रोटीन भी बच्चों में एलर्जी और अस्थमा को ट्रिगर कर सकते हैं।

डॉक्टरों ने चेतावनी दी है कि कई बार माता-पिता बच्चों की लगातार खांसी को सामान्य संक्रमण समझकर घरेलू इलाज करते रहते हैं, जो खतरनाक हो सकता है। यदि बच्चे को लगातार खांसी, बार-बार जुकाम, सांस लेते समय सीटी जैसी आवाज या खेलते समय जल्दी सांस फूलने की समस्या हो तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए।

बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. जसकरन सिंह के अनुसार लुधियाना जैसे औद्योगिक शहर में प्रदूषण का स्तर अधिक होने के कारण बच्चों को बाहर ले जाते समय मास्क पहनाना चाहिए और धूल वाली जगहों से बचाना चाहिए। उन्होंने कहा कि इनहेलर से डरना नहीं चाहिए, यह फेफड़ों के लिए सुरक्षित और प्रभावी उपचार है।
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